भारतीय राजनीति में बढ़ती अभद्र भाषा और मर्यादाहीन आचरण
संदीप सृजन – विनायक फीचर्स)
भारतीय राजनीति का इतिहास हमेशा से विचारों की विविधता, नीतिगत बहस और लोकतांत्रिक मूल्यों से समृद्ध रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में राजनीतिक संवाद का स्वरूप तेजी से बदलता दिख रहा है। नीतियों और विकास की चर्चा की जगह अब व्यक्तिगत हमले, अपशब्द और जातिगत-लैंगिक टिप्पणियाँ सामान्य होते जा रहे हैं। इससे न सिर्फ राजनीति की गरिमा कम हो रही है, बल्कि समाज की एकता भी प्रभावित हो रही है।
हाल ही में बिहार में वोटर अधिकार यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दिवंगत मां पर की गई आपत्तिजनक टिप्पणी ने इस समस्या को और गहरा कर दिया। मंच से वायरल हुए एक वीडियो में अपशब्दों का इस्तेमाल सुनाई दिया। इस घटना को लेकर भाजपा ने तीखी प्रतिक्रिया दी और इसे लोकतंत्र तथा महिलाओं के सम्मान पर सीधा हमला बताया। प्रधानमंत्री मोदी ने भी भावुक होकर कहा कि “मेरी मां का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं था, फिर उन्हें गाली क्यों दी गई? यह हर मां, बहन और बेटी का अपमान है।”
कांग्रेस ने घटना से दूरी बनाते हुए इसे किसी अज्ञात व्यक्ति की करतूत बताया और स्थानीय युवा नेता ने माफी भी मांगी। इसके बावजूद भाजपा ने विपक्ष पर महिला विरोधी मानसिकता फैलाने का आरोप लगाया। यह घटना अकेली नहीं है। सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों ही कई मौकों पर अभद्र भाषा के उपयोग के दोषी रहे हैं।
सोशल मीडिया और मीडिया की भूमिका
सोशल मीडिया और 24 घंटे के न्यूज चैनलों ने इस प्रवृत्ति को और बढ़ा दिया है। वायरल होने की होड़ में नेता अक्सर अपशब्दों का सहारा लेते हैं। नतीजतन, नीतिगत बहस का स्थान व्यक्तिगत हमलों और गाली-गलौज ने ले लिया है। टीवी डिबेट्स भी इस प्रवृत्ति को और हवा देते हैं।
अभद्रता का प्रभाव
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अपशब्द समाज में जातिगत, धार्मिक और लैंगिक तनाव बढ़ाते हैं।
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राजनीति की विश्वसनीयता और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का भरोसा कमजोर होता है।
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महिलाओं और अल्पसंख्यकों को सबसे अधिक नुकसान झेलना पड़ता है।
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जनता नेताओं को आदर्श मानने की बजाय उनसे दूरी बनाने लगती है।
समाधान की जरूरत
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अपशब्दों और अभद्र भाषा पर सख्त कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।
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चुनाव आयोग को ऐसे मामलों में त्वरित दंडात्मक कदम उठाने चाहिए।
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न्यूज चैनल और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को अभद्र कंटेंट को बढ़ावा देने से रोका जाए।
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नेताओं को अपनी भाषा पर संयम रखना होगा और जनता को भी ऐसे नेताओं का समर्थन नहीं करना चाहिए जो अपशब्दों का प्रयोग करते हैं।
जैसा कि पत्रकार रजत शर्मा ने कहा, “लफ्ज़ विचार प्रकट करने का जरिया हैं, गाली देने का नहीं।” राजनीति को सेवा और विचारों का मंच बनाए रखने के लिए नेताओं, मीडिया और नागरिकों – तीनों को जिम्मेदारी निभानी होगी। बिहार की घटना केवल एक राजनीतिक विवाद नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक चेतावनी है। यदि इस प्रवृत्ति पर अंकुश नहीं लगाया गया तो लोकतंत्र की जड़ें कमजोर हो सकती हैं। प्रधानमंत्री की यह बात कि “यह अपमान मैं माफ कर सकता हूं, लेकिन बिहार की धरती नहीं करेगी” इस संकट की गंभीरता को और स्पष्ट कर देती है।

