सोशल मीडिया पर ब्लॉकिंग का बढ़ता दायरा, अभिव्यक्ति की आजादी पर उठते सवाल
(विवेकानंद-विनायक फीचर्स)
आपातकाल का दौर भारतीय लोकतंत्र और मीडिया के इतिहास का ऐसा अध्याय है, जिसे आज भी प्रेस की स्वतंत्रता के संदर्भ में याद किया जाता है। उस समय मीडिया पर सेंसरशिप लागू की गई थी और सरकार की आलोचना करने वाली खबरों तथा लेखों पर रोक लगाई गई। कई पत्रकारों को गिरफ्तार किया गया, अखबारों पर दबाव बनाया गया और विरोध के प्रतीक के रूप में कुछ समाचार पत्रों ने अपने संपादकीय पृष्ठ तक खाली छोड़ दिए थे।
आज परिस्थितियां निश्चित रूप से अलग हैं, लेकिन सोशल मीडिया पर बढ़ते ब्लॉकिंग आदेश और मीडिया से जुड़े कुछ हालिया फैसलों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा सरकारी पारदर्शिता को लेकर नई बहस जरूर खड़ी कर दी है।
टीआरपी पर रोक से शुरू हुई चर्चा
टेलीविजन समाचार चैनलों के लिए टीआरपी यानी टेलीविजन रेटिंग एक महत्वपूर्ण आर्थिक आधार है। विज्ञापनदाता अक्सर किसी चैनल या कार्यक्रम की दर्शक संख्या और रेटिंग को ध्यान में रखकर विज्ञापन का फैसला करते हैं। ऐसे में रेटिंग उपलब्ध नहीं होने पर विज्ञापन बाजार में अनिश्चितता बढ़ सकती है और इसका असर चैनलों की आय पर पड़ सकता है।
रेटिंग व्यवस्था में पारदर्शिता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए उठाए गए कदमों को सरकार सुधार की पहल के तौर पर देखती है। हालांकि, ऐसे फैसलों के समय और उनके व्यापक प्रभाव को लेकर सवाल उठाना भी लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा है।
सोशल मीडिया ब्लॉकिंग के आंकड़ों ने बढ़ाई चिंता
इसी बीच सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को भेजे गए ब्लॉकिंग आदेशों की संख्या को लेकर भी चर्चा तेज हुई है। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में सरकारी आंकड़ों के हवाले से पिछले पांच महीनों में बड़ी संख्या में ब्लॉकिंग आदेश जारी किए जाने की बात सामने आई थी। रिपोर्ट के अनुसार, इस अवधि में लगभग 1.95 लाख आदेश सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को भेजे गए।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि इन आदेशों का बड़ा हिस्सा सोशल मीडिया पर सक्रिय प्लेटफॉर्म्स से संबंधित था और इंस्टाग्राम को प्राप्त आदेशों की संख्या विशेष रूप से अधिक रही। यदि ये आंकड़े सही हैं तो यह सवाल स्वाभाविक है कि इतनी बड़ी संख्या में सामग्री को हटाने या ब्लॉक करने के आदेश किन परिस्थितियों में जारी किए गए और उनकी निगरानी की व्यवस्था क्या है।
विरोध प्रदर्शनों के दौरान ब्लॉकिंग पर सवाल
ब्लॉकिंग आदेशों की टाइमिंग भी इस बहस को महत्वपूर्ण बनाती है। पेपर लीक, परीक्षाओं से जुड़े विवादों और छात्र आंदोलनों जैसे मुद्दों के दौरान सोशल मीडिया पर बड़ी मात्रा में सामग्री प्रसारित होती है। ऐसे समय में यदि किसी सामग्री पर रोक लगाई जाती है तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि कार्रवाई फेक न्यूज, हिंसा भड़काने वाली सामग्री या किसी अन्य कानूनी आधार पर की गई है।
साथ ही यह भी जरूरी है कि वैध आलोचना, विरोध और असहमति को केवल इसलिए प्रतिबंधित न किया जाए क्योंकि वह सरकार या किसी प्रभावशाली संस्था के खिलाफ है।
मीडिया की भूमिका पर भी बहस
मीडिया की स्वतंत्रता का सवाल केवल सरकार की कार्रवाई तक सीमित नहीं है। समाचार माध्यमों की अपनी संपादकीय जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। पिछले कुछ वर्षों में टीवी डिबेट और समाचारों की प्रस्तुति को लेकर यह आरोप लगातार लगते रहे हैं कि कुछ चैनल निष्पक्ष रिपोर्टिंग के बजाय राजनीतिक विमर्श को एक विशेष दिशा देने का प्रयास करते हैं।
कई बार महत्वपूर्ण जनहित के मुद्दे लंबे समय तक चर्चा से बाहर रह जाते हैं, जबकि अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण विषयों को लगातार प्रमुखता मिलती है। इससे मीडिया की विश्वसनीयता और पत्रकारिता की भूमिका पर सवाल उठते हैं।
लोकतंत्र में सवाल पूछना जरूरी
लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करना और सरकार से सवाल पूछना किसी भी स्वतंत्र समाज की बुनियादी आवश्यकता है। इसी तरह फेक न्यूज, हिंसा भड़काने वाली सामग्री और डिजिटल माध्यमों के दुरुपयोग पर नियंत्रण भी जरूरी है। चुनौती यह है कि नियमन और सेंसरशिप के बीच की सीमा स्पष्ट और पारदर्शी बनी रहे।
ब्लॉकिंग आदेशों की संख्या बढ़ना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला हो रहा है। इसके लिए यह देखना जरूरी है कि किन पोस्ट या खातों पर कार्रवाई हुई, किस कानूनी आधार पर हुई, कितने आदेशों की समीक्षा हुई और प्रभावित पक्षों को क्या अपील का अवसर मिला।
इसलिए आज की सबसे बड़ी जरूरत किसी दौर की सीधी तुलना करने के बजाय तथ्यों, आदेशों और सरकारी फैसलों की स्वतंत्र एवं पारदर्शी जांच की है। लोकतंत्र मजबूत तभी होगा जब सरकार जवाबदेह रहे, मीडिया स्वतंत्र रहे और नागरिकों को असहमति व्यक्त करने का अधिकार सुरक्षित मिले।

