स्वतंत्रता दिवस पर विशेष : अमर शहीद महेंद्र गोप जिनकी घुड़सवारी की गूंज से भी कांपते थे अंग्रेज
Immortal Martyr Mahendra Gop: The British Trembled at the Very Sound of His Horse-Riding
डॉ. रविशंकर कुमार चौधरी — विभूति फीचर्स)
भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित नेताओं और बड़े आंदोलनों तक सीमित नहीं है। इसकी मजबूत नींव उन असंख्य स्थानीय और क्षेत्रीय सेनानियों के त्याग से भी बनी, जिन्होंने अपने गांव, कस्बे और क्षेत्र को अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष का केंद्र बनाया। अंगभूमि भी ऐसे अनेक वीरों की कर्मभूमि रही है। इन्हीं में एक नाम अमर शहीद महेंद्र गोप का है, जिनकी क्रांतिकारी गतिविधियों ने लंबे समय तक ब्रिटिश शासन की नींद हराम किए रखी।
आजादी का आंदोलन एक ओर अहिंसक जनांदोलनों के माध्यम से आगे बढ़ रहा था, वहीं दूसरी ओर क्रांतिकारी संगठन भी औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ सशस्त्र प्रतिरोध कर रहे थे। महेंद्र गोप इसी क्रांतिकारी धारा से जुड़े ऐसे योद्धा थे, जिन्होंने अंग्रेजी शासन को चुनौती देने के लिए युवाओं को संगठित किया।
स्मृति आज भी सीमित दायरे में
विडंबना है कि जिस क्रांतिकारी के नाम से कभी ब्रिटिश प्रशासन चिंतित रहता था, उनकी स्मृति आज मुख्य रूप से बांका जिले के अमरपुर प्रखंड की भरको पंचायत के रामपुर गांव स्थित स्मारक तक सीमित है। चांदन नदी पर बने एक पुल का नाम भी उनके नाम पर रखा गया है, लेकिन उनकी विरासत को व्यापक स्तर पर पहचान दिलाने के लिए अभी काफी प्रयास किए जाने बाकी हैं।
सवाल यह है कि क्या किसी शहीद की स्मृति को केवल एक स्मारक अथवा नामकरण तक सीमित कर देना पर्याप्त है?
बचपन में ही पड़ी विद्रोह की नींव
महेंद्र गोप का जन्म 15 अगस्त 1912 को रामपुर गांव के एक अहीर परिवार में हुआ था। ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े महेंद्र के मन में कम उम्र में ही अंग्रेजी शासन के प्रति विरोध की भावना पैदा हो गई थी।
स्थानीय रूप से प्रचलित एक प्रसंग के अनुसार, अमरपुर जाते समय कुछ ब्रिटिश अधिकारियों और सैनिकों ने उन्हें रोककर सलाम करने को कहा। बात समझ में न आने पर उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया। कम उम्र होने के कारण उन्हें बाद में छोड़ दिया गया, लेकिन इस घटना ने उनके भीतर अंग्रेजी शासन के प्रति विद्रोह की भावना को और प्रबल कर दिया।
बाद में उनका संपर्क क्रांतिकारी गतिविधियों से हुआ। उन्होंने युवाओं को संगठित करना शुरू किया और ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष में सक्रिय हो गए।
घोड़े की टाप बन गई थी खतरे की आहट
महेंद्र गोप घुड़सवारी में बेहद कुशल माने जाते थे। स्थानीय स्मृतियों में उनसे जुड़े कई प्रसंग आज भी सुनने को मिलते हैं। कहा जाता है कि जब वह अपने साथियों के साथ घोड़े पर सवार होकर निकलते थे, तो घोड़े की टाप की आवाज भी अंग्रेज अधिकारियों के लिए खतरे की सूचना बन जाती थी।
उस समय भागलपुर क्षेत्र में कई क्रांतिकारी समूह सक्रिय थे। परशुराम सिंह के नेतृत्व में गठित परशुराम दल में महेंद्र गोप की महत्वपूर्ण भूमिका रही। धीरे-धीरे वह इस दल के प्रभावशाली नेताओं में शामिल हो गए। उनकी विशेषता केवल व्यक्तिगत साहस नहीं थी, बल्कि युवाओं को संगठित करने और उन्हें संघर्ष के लिए प्रेरित करने की क्षमता भी थी।
भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भूमिका
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान दक्षिण भागलपुर का क्षेत्र अंग्रेजी शासन के खिलाफ गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया था। महेंद्र गोप और परशुराम सिंह जैसे क्रांतिकारियों ने औपनिवेशिक प्रशासन को चुनौती दी।
महेंद्र गोप के साथ कई स्थानीय युवा जुड़े। इनमें लाखो शाही, जागो शाही, श्री गोप, श्रीधर, प्रद्युम्न और दयानाथ जैसे नाम बताए जाते हैं। बाद में महेंद्र गोप का अपना स्वतंत्र समूह भी सक्रिय हुआ। उनके संबंध कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी से भी रहे। मई 1943 में उनका समूह सियाराम सिंह के संगठन से जुड़ा, लेकिन कुछ समय बाद अलग होने के पश्चात उन्होंने अपने तरीके से क्रांतिकारी गतिविधियां जारी रखीं।
जंगलों में चलता रहा संघर्ष
दक्षिण भागलपुर और विशेष रूप से बांका क्षेत्र के जंगल महेंद्र गोप और उनके साथियों की गतिविधियों का प्रमुख क्षेत्र बने। जंगल उन्हें सुरक्षित ठिकाना देने के साथ-साथ रणनीति तैयार करने का अवसर भी देते थे।
ब्रिटिश पुलिस लंबे समय से उनकी तलाश में थी। आखिरकार सितंबर 1944 के अंतिम दिनों में बांका उपखंड के जंगलों में चलाए गए अभियान के दौरान महेंद्र गोप और उनके कई साथियों को गिरफ्तार कर लिया गया।
गिरफ्तारी के बाद उनके खिलाफ गंभीर मुकदमा चलाया गया। उन पर अंग्रेज अधिकारियों और उनके समर्थकों की हत्या तथा सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसे आरोप लगाए गए। औपनिवेशिक अदालत ने उन्हें मृत्युदंड की सजा सुनाई।
23 नवंबर 1945 को दी गई फांसी
महेंद्र गोप की सजा कम कराने के लिए राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े नेताओं द्वारा प्रयास किए जाने का उल्लेख मिलता है। डॉ. राजेंद्र प्रसाद सहित कई नेताओं ने उनकी सजा कम कराने की कोशिश की, लेकिन ब्रिटिश शासन ने उनकी दया याचिका स्वीकार नहीं की।
आखिरकार 23 नवंबर 1945 को भागलपुर कैंप जेल में महेंद्र गोप को फांसी दे दी गई। उस समय उनकी उम्र लगभग 33 वर्ष थी।
अंग्रेजी शासन ने उनके जीवन का अंत तो कर दिया, लेकिन उनके साहस, संघर्ष और बलिदान की स्मृति को समाप्त नहीं कर सका।
इतिहास के दस्तावेजों को सामने लाने की जरूरत
महेंद्र गोप के जीवन से जुड़े अनेक प्रसंग ऐसे हैं, जिन पर गंभीर ऐतिहासिक शोध और दस्तावेजी अध्ययन की आवश्यकता है। उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों, विभिन्न संगठनों से संबंध, ब्रिटिश प्रशासन के अभिलेख और मुकदमे से जुड़े दस्तावेज यदि व्यवस्थित रूप से सामने लाए जाएं, तो अंग क्षेत्र के स्वतंत्रता आंदोलन का एक महत्वपूर्ण अध्याय और स्पष्ट हो सकता है।
रामपुर का स्मारक निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन उनकी स्मृति को व्यापक स्तर पर संरक्षित करने के लिए बांका जिला मुख्यालय में उनके नाम पर स्मृति-स्थल, संग्रहालय या शोध केंद्र विकसित किया जा सकता है। उनके जीवन से जुड़े दस्तावेज, तस्वीरें, न्यायिक अभिलेख और स्थानीय मौखिक इतिहास को संकलित किया जाना चाहिए।
विद्यालयों और महाविद्यालयों में उनके जीवन पर व्याख्यान, निबंध और शोध प्रतियोगिताएं आयोजित कर नई पीढ़ी को उनके संघर्ष से परिचित कराया जा सकता है।
स्मारक से आगे बढ़े स्मृति संरक्षण
भागलपुर और बांका की धरती ने स्वतंत्रता आंदोलन में अनेक सेनानियों को जन्म दिया। दुर्भाग्य से राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित नामों के पीछे अनेक क्षेत्रीय नायक धीरे-धीरे विस्मृति में चले गए। महेंद्र गोप भी इसी उपेक्षा के शिकार हुए।
आज स्वतंत्रता संग्राम की विरासत को याद करते समय यह सवाल भी उठना चाहिए कि हमने अपने स्थानीय शहीदों के साथ कितना न्याय किया है। किसी शहीद की प्रतिमा स्थापित करना या किसी पुल का नाम उसके नाम पर रखना स्मृति संरक्षण की शुरुआत हो सकती है, लेकिन उसे अंतिम उपलब्धि नहीं माना जा सकता।
जरूरत है कि रामपुर स्थित स्मारक से निकलकर महेंद्र गोप की कहानी बांका, भागलपुर और पूरे अंगप्रदेश की सामूहिक स्मृति का हिस्सा बने। उनकी जन्मभूमि और कर्मभूमि से जुड़ी घटनाओं का दस्तावेजीकरण हो तथा प्रमाणित ऐतिहासिक सामग्री के साथ उनकी कहानी नई पीढ़ी तक पहुंचाई जाए।
महेंद्र गोप केवल एक गांव के शहीद नहीं थे। वह उस दौर के प्रतिनिधि थे, जब भारत का एक युवा वर्ग गुलामी को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था। उनके संघर्ष के तरीकों पर इतिहास में बहस हो सकती है, लेकिन देश की स्वतंत्रता के लिए उन्होंने जो कीमत चुकाई, उसे भुलाया नहीं जा सकता।
23 नवंबर 1945 को भागलपुर जेल में फांसी का फंदा उनके जीवन का अंत था, उनकी कहानी का नहीं। अब जिम्मेदारी हमारी है कि उस कहानी को स्मारक की चारदीवारी से बाहर निकालकर महेंद्र गोप की कुर्बानी को इतिहास में उसका उचित स्थान दिलाएं।

