सांस्कृतिक चेतना और सभ्यतागत निरंतरता से बनी है भारत की पहचान : हिंदुत्व

India’s identity is forged from cultural consciousness and civilizational continuity: Hindutva
 
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सुरेन्द्र शर्मा | विनायक फीचर्स

भारत केवल भौगोलिक सीमाओं में बंधा एक भूभाग नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से विकसित होती आ रही एक जीवंत सभ्यता है। इसकी पहचान नदियों, पर्वतों, नगरों और सीमाओं के साथ-साथ उन विचारों, संस्कारों और परंपराओं से भी निर्मित हुई है, जिन्होंने पीढ़ियों को एक सूत्र में बांधे रखा है। भारतीय सभ्यता की इसी सांस्कृतिक निरंतरता को समझने का एक दृष्टिकोण हिंदुत्व है। इस संदर्भ में हिंदुत्व का आशय हिंदू सभ्यता से विकसित उस व्यापक सांस्कृतिक चेतना से है, जिसमें जीवन के प्रति श्रद्धा, कर्तव्यबोध, आध्यात्मिक चिंतन और लोककल्याण की भावना समाहित है।

‘भारत की पहचान हिंदुत्व’ का विचार तभी सार्थक बनता है, जब सांस्कृतिक आत्मबोध के साथ प्रत्येक भारतीय की समान गरिमा को भी स्वीकार किया जाए। भारत अनेक धर्मों, भाषाओं और समुदायों का साझा देश है। इसलिए अपनी सांस्कृतिक जड़ों का सम्मान और विविधता का आदर साथ-साथ चलना चाहिए। विरासत पर गर्व का श्रेष्ठ स्वरूप वही है, जो व्यक्ति और समाज को आत्मविश्वासी, उदार तथा उत्तरदायी बनाए और प्रत्येक नागरिक में अपनत्व की भावना विकसित करे।

सत्य की खोज और भारतीय सांस्कृतिक चेतना

भारतीय सभ्यता की प्रमुख विशेषताओं में सत्य की खोज और जीवन के मूल प्रश्नों पर चिंतन शामिल रहा है। मनुष्य कौन है, उसका कर्तव्य क्या है और जीवन का उद्देश्य क्या होना चाहिए—ऐसे प्रश्नों पर वेदों, उपनिषदों, गीता तथा विभिन्न दर्शन-परंपराओं में विस्तार से विचार किया गया है। इन ग्रंथों और परंपराओं में उपलब्ध विचारों की विविधता भारतीय बौद्धिक जीवन की समृद्धि को दर्शाती है। सांस्कृतिक अर्थ में हिंदुत्व की शक्ति इसी जिज्ञासा में देखी जा सकती है, जहां श्रद्धा के साथ प्रश्न करने और सत्य को समझने का भी स्थान है।

हिंदू परंपरा में धर्म का संबंध केवल पूजा-पद्धति से नहीं, बल्कि आचरण और कर्तव्य से भी है। सत्य बोलना, न्याय करना, निर्बल की सहायता करना, माता-पिता की सेवा करना और अपने दायित्वों का ईमानदारी से निर्वहन करना धर्म के व्यावहारिक स्वरूप हैं। इस दृष्टि से हिंदुत्व की पहचान व्यक्ति के व्यवहार में दिखाई देनी चाहिए। मंदिर में प्रार्थना के साथ समाज के दुख-दर्द को समझना और उन्हें दूर करने का प्रयास करना ही सांस्कृतिक चेतना को जीवन में उतारना है।

‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ भारतीय चिंतन की व्यापकता का परिचायक है। संपूर्ण पृथ्वी को परिवार मानने वाली यह दृष्टि हमें अपने हितों के साथ दूसरों की आवश्यकताओं और सम्मान के प्रति भी संवेदनशील बनाती है। परिवार में मतभेद होने के बावजूद आत्मीयता बनी रहती है। इसी प्रकार समाज में विभिन्न विश्वासों और जीवन-पद्धतियों के बीच संवाद और सद्भाव कायम रहना चाहिए। अपनी आस्था के प्रति निष्ठा और दूसरे की आस्था के प्रति सम्मान सामाजिक समरसता को मजबूत करते हैं।

भारत की सांस्कृतिक एकता उसकी विविध अभिव्यक्तियों में दिखाई देती है। अलग-अलग क्षेत्रों के मंदिर, लोकदेवता, उत्सव, कथाएं और भाषाएं अपनी विशिष्ट पहचान रखते हुए भी अनेक साझा सूत्रों से जुड़े हैं। रामायण और महाभारत की कथाओं ने विभिन्न भाषाओं और कलाओं में नए रूप ग्रहण किए हैं। तीर्थयात्राओं ने दूर-दराज के क्षेत्रों के लोगों को एक-दूसरे से मिलने और समझने के अवसर दिए हैं। इस सांस्कृतिक आदान-प्रदान ने भारत की पहचान को समृद्ध किया है।

सामाजिक समरसता, प्रकृति और नारी सम्मान

भारतीय सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण दायित्व सामाजिक समरसता है। यदि प्रत्येक व्यक्ति में ईश्वरीय अंश देखने की भावना स्वीकार की जाती है, तो जन्म और जाति के आधार पर अपमान या भेदभाव का कोई औचित्य नहीं रह जाता। संतों और समाज-सुधारकों की अनेक परंपराओं ने मानव गरिमा, भक्ति और समानता पर बल दिया है। शिक्षा, सम्मान, अवसर और सार्वजनिक जीवन में समान भागीदारी सुनिश्चित करना सांस्कृतिक एकता की वास्तविक कसौटी है। समरस समाज ही सशक्त राष्ट्र का आधार बनता है।

भारतीय संस्कृति में प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का भी विशेष स्थान है। नदियों, वृक्षों, पर्वतों और जीव-जंतुओं के प्रति श्रद्धा मनुष्य को अपने पर्यावरण से जोड़ती है। वर्तमान समय में इस भावना को पर्यावरण संरक्षण के ठोस प्रयासों में बदलना आवश्यक है। नदी को माता मानने का भाव उसकी स्वच्छता की जिम्मेदारी लेने में दिखाई देना चाहिए। वृक्षों के प्रति सम्मान पौधरोपण और उनकी देखभाल से प्रकट हो। जल संरक्षण, प्रदूषण में कमी और संसाधनों का संयमित उपयोग हमारी परंपरा को समकालीन अर्थ प्रदान करते हैं।

नारी सम्मान भी सांस्कृतिक पहचान की महत्वपूर्ण कसौटी है। शक्ति, ज्ञान और समृद्धि के स्त्री स्वरूपों की आराधना करने वाला समाज महिलाओं की शिक्षा, सुरक्षा, स्वतंत्र निर्णय और नेतृत्व के अवसरों के प्रति भी सजग रहे। मातृशक्ति का सम्मान केवल विचारों या प्रतीकों तक सीमित न रहे, बल्कि दैनिक व्यवहार और संस्थागत व्यवस्थाओं में भी दिखाई दे। बेटियों को आगे बढ़ने का अवसर देना, महिलाओं की उपलब्धियों को स्वीकार करना और उनके अधिकारों की रक्षा करना सांस्कृतिक मूल्यों की सार्थक अभिव्यक्ति है।

सेवा की भावना भारतीय जीवन-दृष्टि को व्यावहारिक आधार देती है। भूखे को भोजन, रोगी को उपचार, विद्यार्थी को शिक्षा और संकटग्रस्त व्यक्ति को सहारा देना लोककल्याण के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। सेवा का महत्व तब और बढ़ जाता है, जब सहायता पाने वाले की जाति, धर्म या भाषा के आधार पर कोई भेदभाव न किया जाए। राष्ट्रप्रेम की शुरुआत अपने आसपास के लोगों के प्रति जिम्मेदारी निभाने से होती है। स्वच्छता, ईमानदार श्रम, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा और जरूरतमंदों की सहायता राष्ट्रसेवा के ऐसे मार्ग हैं, जिनमें प्रत्येक नागरिक भागीदारी कर सकता है।

आधुनिक भारत में सांस्कृतिक स्वाभिमान को वैज्ञानिक दृष्टि, लोकतांत्रिक संवाद और संवैधानिक मूल्यों के साथ आगे बढ़ना चाहिए। संविधान सभी नागरिकों की समानता और धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है। इन मूल्यों का सम्मान राष्ट्रीय एकता को मजबूत आधार देता है। परंपरा के प्रति सम्मान हमें अध्ययन, अनुसंधान और नवाचार के लिए भी प्रेरित करे। युवा अपनी भाषाओं, साहित्य और इतिहास से परिचित हों तथा विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में उत्कृष्टता प्राप्त करें। अपनी जड़ों से जुड़ा समाज भविष्य की चुनौतियों का सामना अधिक आत्मविश्वास के साथ कर सकता है।

स्वामी विवेकानंद : हिंदू चेतना, आत्मविश्वास और मानवसेवा

स्वामी विवेकानंद के विचारों में हिंदू धर्म का गौरव, वेदांत की व्यापकता, आत्मविश्वास और मानवसेवा एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। 11 सितंबर 1893 को शिकागो में दिए गए अपने ऐतिहासिक संबोधन में उन्होंने हिंदू धर्म की परंपरा के प्रति गर्व व्यक्त किया और सहिष्णुता तथा सभी धर्मों की स्वीकृति के विचार को सामने रखा। उनके लिए अपनी आस्था के प्रति निष्ठा के साथ अन्य आस्थाओं का सम्मान भी आवश्यक था।

स्वामी विवेकानंद का मानना था कि प्रत्येक मनुष्य के भीतर दिव्यता विद्यमान है। इसी आधार पर वे लोगों को स्वयं को दुर्बल और असमर्थ मानने के बजाय आत्मविश्वास के साथ जीवन जीने की प्रेरणा देते थे। वे चाहते थे कि वेदांत का आदर्श केवल आध्यात्मिक चर्चा तक सीमित न रहे, बल्कि दैनिक जीवन और सामाजिक व्यवहार में भी दिखाई दे।

उन्होंने आध्यात्मिक ज्ञान के नाम पर किसी व्यक्ति या वर्ग द्वारा विशेषाधिकार का दावा किए जाने की आलोचना की। उनका आग्रह था कि एकता का सिद्धांत सामाजिक व्यवहार में भी लागू होना चाहिए। उनके अनुसार, व्यवसाय या सामाजिक स्थिति अलग होने से किसी मनुष्य का आध्यात्मिक मूल्य कम नहीं होता। शिकागो धर्म संसद के अंतिम संबोधन में भी उन्होंने धार्मिक परंपराओं के बीच सहयोग और सामंजस्य की कामना की। उनकी हिंदू चेतना को सांस्कृतिक स्वाभिमान, आध्यात्मिक उदारता, मानव गरिमा और सेवाभाव के समन्वय के रूप में समझा जा सकता है।

महात्मा गांधी : सत्य, अहिंसा और सर्वधर्म सम्मान

महात्मा गांधी स्वयं को सनातनी हिंदू कहते थे। उनके लिए हिंदू धर्म सत्य, अहिंसा, आत्मसंयम और सभी धर्मों के प्रति आदर का मार्ग था। गांधीजी वेदों, उपनिषदों, पुराणों, अवतार और पुनर्जन्म में विश्वास व्यक्त करते थे। हालांकि वे किसी धार्मिक व्याख्या को केवल विद्वानों के समर्थन के कारण स्वीकार करने के पक्ष में नहीं थे, यदि वह विवेक और नैतिकता की कसौटी पर खरी न उतरती हो।

गांधीजी की दृष्टि में धर्म का वास्तविक मूल्य मनुष्य के आचरण से प्रकट होता है। वे अहिंसा को सभी धर्मों में मौजूद मानते थे और हिंदू धर्म में उसकी विशेष अभिव्यक्ति देखते थे। उनका मानना था कि दूसरे धर्मों का श्रद्धापूर्वक अध्ययन करने से अपने धर्म के प्रति आस्था कम नहीं होती। वे दूसरे धर्मों को उनके अनुयायियों के दृष्टिकोण से समझने का आग्रह करते थे।

उन्होंने अस्पृश्यता को हिंदू धर्म पर कलंक माना और जन्म के आधार पर किसी व्यक्ति को अछूत समझने का विरोध किया। गांधीजी स्वयं को सुधारक मानते थे। उनके अनुसार, किसी प्रथा का प्राचीन होना मात्र उसके उचित होने का प्रमाण नहीं है। बालविवाह और अस्पृश्यता जैसी प्रथाओं की आलोचना इसी सुधारवादी दृष्टिकोण का हिस्सा थी।

डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार : संगठन और राष्ट्रनिर्माण

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के विचारों में हिंदुत्व का प्रमुख व्यावहारिक स्वरूप हिंदू समाज का संगठन, सांस्कृतिक स्वाभिमान और राष्ट्र के प्रति समर्पित चरित्र का निर्माण था। उनकी दृष्टि में जाति और अन्य आधारों पर विभाजित हिंदू समाज में सामूहिकता विकसित करना महत्वपूर्ण था। संघ के इतिहास और उसके वैचारिक साहित्य में उनके प्रयासों को साझा सांस्कृतिक पहचान तथा सामाजिक एकता के निर्माण से जोड़कर देखा गया है।

उनके लिए संगठन की नींव ऐसे व्यक्तियों से बनती थी, जिनमें अनुशासन, निःस्वार्थ भाव और मातृभूमि के लिए त्याग की तत्परता हो। संघ द्वारा प्रकाशित उनके जीवन-विवरण में व्यक्ति निर्माण को उनके कार्य का केंद्रीय उद्देश्य बताया गया है। डॉ. हेडगेवार ने हिंदुत्व को संगठित हिंदू समाज और राष्ट्रनिर्माण के लिए समर्पित जीवन के रूप में कार्यान्वित करने का प्रयास किया। उनसे यह कथन भी जोड़ा जाता है—“मैं, केशव बलिराम हेडगेवार, कहता हूं कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है।”

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और सांस्कृतिक विरासत

भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद स्वयं को आस्था और दैनिक आचरण से सनातनी हिंदू मानते थे। उनके विचारों में अपनी धार्मिक विरासत पर गर्व, सभी धर्मों का सम्मान और नागरिक समानता साथ-साथ दिखाई देते हैं। 11 मई 1951 को सोमनाथ मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा के अवसर पर दिया गया उनका भाषण इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है। उन्होंने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण को भारतीय आस्था और संस्कृति की जीवंतता का प्रतीक माना।

विनायक दामोदर सावरकर : हिंदुत्व की सांस्कृतिक और राष्ट्रीय अवधारणा

विनायक दामोदर सावरकर के लिए हिंदुत्व एक सांस्कृतिक और राष्ट्रीय पहचान की अवधारणा थी, जिसका दायरा धार्मिक आस्था और पूजा-पद्धति से व्यापक था। उन्होंने 1923 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘Essentials of Hindutva’ में इस विचार को व्यवस्थित रूप दिया। सावरकर ने हिंदू धर्म को धार्मिक मतों और आध्यात्मिक परंपराओं से संबंधित माना, जबकि हिंदुत्व में हिंदुओं का साझा इतिहास, पूर्वजों से संबंध, संस्कृति और राष्ट्रीय जीवन भी शामिल किया।

सावरकर के अनुसार, हिंदू वह है जो भारत को अपनी पितृभूमि अर्थात पूर्वजों की भूमि और पुण्यभूमि अर्थात अपनी धार्मिक परंपरा की उद्गमभूमि, दोनों माने। इसलिए उनकी अवधारणा में भौगोलिक संबंध के साथ धार्मिक-सांस्कृतिक संबंध भी महत्वपूर्ण था। उन्होंने साझा राष्ट्र, साझा वंशगत संबंध और साझा संस्कृति को हिंदुत्व के प्रमुख आधारों के रूप में प्रस्तुत किया। संस्कृति के अंतर्गत भाषा, साहित्य, कला, इतिहास, संस्कार और उत्सव को स्थान दिया गया।

उनकी परिभाषा में भारत में जन्मी वैदिक, बौद्ध, जैन और सिख परंपराओं को व्यापक हिंदू सांस्कृतिक पहचान के अंतर्गत रखा गया। दूसरी ओर, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारत अनेक मुसलमानों और ईसाइयों की पितृभूमि हो सकता है, लेकिन उनकी धार्मिक परंपराओं की उद्गमभूमि भारत से बाहर होने के कारण वे उनकी हिंदुत्व संबंधी परिभाषा में शामिल नहीं होते। इससे स्पष्ट होता है कि सावरकर की अवधारणा में केवल भारत में जन्म लेना या उससे प्रेम करना पर्याप्त कसौटी नहीं था। उनके हिंदुत्व का केंद्र हिंदुओं को एक साझा ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय समुदाय के रूप में परिभाषित करना था।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय : सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और एकात्म मानववाद

पंडित दीनदयाल उपाध्याय के हिंदुत्व संबंधी विचारों को उनके सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और एकात्म मानववाद के माध्यम से समझा जा सकता है। अप्रैल 1965 में दिए गए चार व्याख्यानों में उन्होंने भारतीय संस्कृति के आधार पर व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और राज्य के संबंधों की व्याख्या की।

दीनदयाल उपाध्याय के अनुसार, राष्ट्र केवल भूभाग या शासन-व्यवस्था से नहीं बनता, बल्कि उसकी एक आंतरिक सांस्कृतिक प्रकृति होती है, जिसे उन्होंने ‘चिति’ कहा। यह राष्ट्र के जीवन और उसकी संस्थाओं को दिशा देने वाला तत्व है। उन्होंने मनुष्य को शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा की एकात्म इकाई माना। इसलिए विकास की अवधारणा में आर्थिक आवश्यकताओं के साथ मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक आवश्यकताओं को भी स्थान मिलना चाहिए। व्यक्ति और समाज के हितों में समन्वय उनकी विचारधारा का महत्वपूर्ण आधार था।

उनके विचार में धर्म केवल पूजा-पद्धति या संप्रदाय का नाम नहीं था, बल्कि वह व्यक्ति और समाज को धारण करने वाले नैतिक सिद्धांतों तथा कर्तव्यों से जुड़ा था। इसी आधार पर उन्होंने ‘धर्मराज्य’ की अवधारणा प्रस्तुत की। उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्मराज्य का अर्थ धार्मिक पुरोहितों का शासन या किसी एक संप्रदाय का राज्य नहीं है। उनकी व्याख्या में उपासना की स्वतंत्रता बनी रहती है और राज्य को किसी धर्म के अनुयायियों के साथ भेदभाव नहीं करना चाहिए। वे भारत की समस्याओं के समाधान में भारतीय अनुभव और संस्कृति को आधार बनाना चाहते थे, साथ ही उपयोगी ज्ञान को ग्रहण कर उसे अपनी परिस्थितियों के अनुकूल बनाने के पक्षधर थे।

हिंदुत्व और सर्वोच्च न्यायालय का दृष्टिकोण

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 1995 में दिए गए एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा था कि हिंदुत्व को प्रत्येक संदर्भ में संकीर्ण धार्मिक अर्थ में नहीं समझा जा सकता। न्यायालय ने कुछ संदर्भों में इसे भारतीय लोगों की जीवन-पद्धति और सांस्कृतिक परिवेश के संकेत के रूप में देखा। इस निर्णय का उल्लेख हिंदुत्व की सांस्कृतिक अवधारणा पर होने वाली चर्चाओं में किया जाता है। हालांकि इस न्यायिक टिप्पणी को उसके मामले और संदर्भ के साथ समझना आवश्यक है।

पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य : आत्मपरिष्कार और समाज सुधार

गायत्री परिवार के संस्थापक पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य के विचारों में हिंदुत्व का संबंध भारतीय संस्कृति, आत्मपरिष्कार और समाज-सुधार से था। गायत्री परिवार की पत्रिका ‘अखण्ड ज्योति’ के अगस्त 1992 के अंक में प्रकाशित ‘हिन्दुत्व क्या है?’ शीर्षक प्रश्नोत्तर में उनके विचार सामने आते हैं। उनका आग्रह था कि अतीत का गुणगान करने के साथ संस्कृति के जीवन-मूल्यों को अपने व्यवहार में भी अपनाया जाना चाहिए। व्यक्तित्व का परिष्कार और सामाजिक जिम्मेदारी इसके आवश्यक अंग हैं।

वे वर्ण का निर्धारण जन्म के बजाय गुण, कर्म और स्वभाव के आधार पर करने की बात करते थे। उनके अनुसार, साधना, संस्कार और पुरुषार्थ से व्यक्ति अपना विकास कर सकता है। यह वर्ण-व्यवस्था की उनकी सुधारवादी व्याख्या थी। उन्होंने महिलाओं को दोयम दर्जा देने और उन्हें जप तथा यज्ञ जैसे धार्मिक कार्यों से वंचित रखने की प्रवृत्ति की आलोचना की। वे नारी-जागरण और सार्वजनिक नेतृत्व में महिलाओं की भागीदारी के समर्थक थे। धर्म और संस्कृति के नाम पर पनपने वाली प्रतिगामी प्रवृत्तियों को दूर करने के लिए उन्होंने शिक्षा, जागरण और संस्कार पर बल दिया।

स्वामी अवधेशानंद गिरि : सनातन संस्कृति और विश्वकल्याण

स्वामी अवधेशानंद गिरि के विचारों में हिंदू पहचान का संबंध सनातन संस्कृति, समस्त सृष्टि के कल्याण, सामाजिक एकता और धार्मिक परंपराओं के संरक्षण से जुड़ा दिखाई देता है। महाकुंभ 2025 से जुड़े एक साक्षात्कार में उन्होंने सनातन धर्म की व्यापकता बताते हुए कहा था कि उसका परिवार केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि पृथ्वी और प्रकृति भी उसमें शामिल हैं। उन्होंने सबके सुख और सम्मान की भावना पर बल दिया।

उन्होंने संगम और कुंभ को ऐसे अवसरों के रूप में भी देखा, जहां विभिन्न जातियों, वर्गों और संप्रदायों के लोग एक साथ आते हैं। इससे धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों की सामाजिक एकता स्थापित करने वाली भूमिका सामने आती है।

अटल बिहारी वाजपेयी : हिंदू पहचान और मानवता का संदेश

पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी ने अपनी कविता ‘हिंदू तन-मन, हिंदू जीवन’ में हिंदू पहचान को मानवता, स्वतंत्रता और उदारता के भाव से जोड़ते हुए लिखा है—

“होकर स्वतंत्र मैंने कब चाहा है, कर लूं जग को गुलाम?
मैंने तो सदा सिखाया करना, अपने मन को गुलाम।
गोपाल-राम के नामों पर, कब मैंने अत्याचार किए?
कब दुनिया को हिंदू करने घर-घर में नरसंहार किए?
कोई बतलाए काबुल में जाकर, कितनी मस्जिद तोड़ीं?
भूभाग नहीं, शत-शत मानव के हृदय जीतने का निश्चय।
हिंदू तन-मन, हिंदू जीवन, रग-रग हिंदू मेरा परिचय!”

अटल जी ने हिंदू पहचान को लेकर संकोच करने वालों के संदर्भ में भी अपनी कविता में तीखे शब्दों का प्रयोग किया है—

“हिंदू कहने में शर्माते, दूध लजाते, लाज न आती?
घोर पतन है, अपनी मां को मां कहने में फटती छाती।”

इन पंक्तियों के माध्यम से उन्होंने अपनी सांस्कृतिक पहचान के प्रति आत्मगौरव का भाव व्यक्त किया। उनकी कविता में हिंदू पहचान को किसी दूसरे पर थोपने के बजाय अपनी परंपरा और विचारों के प्रति आत्मविश्वास के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

हिंदुत्व : लोककल्याण, सद्भाव और मानव गरिमा का भाव

विभिन्न भारतीय विचारकों, संतों, समाज-सुधारकों और राष्ट्रीय नेताओं के विचारों में हिंदुत्व की अलग-अलग व्याख्याएं मिलती हैं। कहीं यह आध्यात्मिक चेतना और मानवसेवा से जुड़ता है, कहीं सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और संगठन से, तो कहीं आत्मपरिष्कार तथा सामाजिक सुधार से। इन विचारों के बीच समानता, करुणा, कर्तव्य और लोककल्याण जैसे सूत्र भी दिखाई देते हैं।

इस दृष्टि से हिंदुत्व को समझने का एक आधार वह भावना है, जिसमें समस्त सृष्टि के कल्याण की कामना की जाती है। ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग् भवेत्।’ अर्थात सभी सुखी हों, सभी रोगमुक्त रहें, सभी का कल्याण हो और किसी को भी दुख का भागी न बनना पड़े।

सबके कल्याण की कामना, प्रत्येक प्राणी के प्रति सद्भाव, प्रकृति के प्रति सम्मान, सेवा और सामाजिक समरसता—ये ऐसे मूल्य हैं, जिन्हें भारतीय सांस्कृतिक परंपरा की महत्वपूर्ण अभिव्यक्तियों के रूप में देखा जाता है। लेखक के मत में हिंदुत्व की सार्थकता इन्हीं मूल्यों को जीवन और समाज में उतारने में निहित है। भारत की सभ्यतागत विरासत का गौरव तभी सार्थक होगा, जब उसके मूल्यों का प्रकाश प्रत्येक नागरिक तक पहुंचे और सभी को सम्मान तथा समान अवसर मिलें।

(लेखक मध्यप्रदेश भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष हैं।)

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