प्रेम, स्नेह और सद्भाव के रंगों से सराबोर भारत की समावेशी सनातनी संस्कृति

आपका लेख “प्रेम, स्नेह और सद्भाव के रंगों से सराबोर भारत की समावेशी सनातनी संस्कृति” एक भावनात्मक, सांस्कृतिक और वैचारिक दृष्टि से समृद्ध आलेख है। इसमें वैश्विक अशांति की पृष्ठभूमि में भारत की शांति, सहिष्णुता और सांस्कृतिक विविधता को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
 
प्रेम, स्नेह और सद्भाव के रंगों से सराबोर भारत की समावेशी सनातनी संस्कृति

(डॉ. राघवेंद्र शर्मा – विनायक फीचर्स)   आज जब हम वैश्विक परिदृश्य पर दृष्टि डालते हैं, तो मन व्याकुल हो उठता है। विश्व का बड़ा हिस्सा अशांति, हिंसा और संघर्षों से जूझ रहा है। पश्चिमी देशों से लेकर मध्य-पूर्व तक बारूद की गंध वातावरण में घुली हुई है। मानवता कराह रही है और शांति की खोज में भटक रही है। भारत के पड़ोसी देश भी आतंकवाद और आंतरिक कलह की आग में झुलस रहे हैं।

ऐसी विषम परिस्थितियों में यदि कोई देश आशा की किरण के रूप में दिखाई देता है, तो वह भारत है। भारत आज शांति का एक ऐसा द्वीप है जहाँ नफरत का धुआं नहीं, बल्कि प्रेम, सौहार्द और भाईचारे के रंग वातावरण में घुले हुए हैं। इस स्थिरता और शांति का मूल आधार भारत की समावेशी संस्कृति है, जो ‘सनातन संस्कारों’ और उदार जीवनदृष्टि पर आधारित है।

यहाँ ‘हिंदू’ शब्द किसी एक उपासना पद्धति तक सीमित नहीं, बल्कि एक व्यापक और सहिष्णु दृष्टिकोण का प्रतीक है, जो सभी मतों और पंथों का सम्मान करना सिखाता है। यही कारण है कि भारत विविधताओं के बावजूद एकता का जीवंत उदाहरण बना हुआ है।

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होली का पर्व इस सांस्कृतिक समन्वय का सशक्त प्रतीक है। यह केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि विविधता में एकता की उस भावना का उत्सव है जो भारतीय संस्कृति की आत्मा है। जब हम एक-दूसरे को रंग लगाते हैं, तो वह रंग किसी जाति, वर्ग या धर्म का भेद नहीं करता—वह केवल मनुष्यता के चेहरे को आलोकित करता है।

आज विश्व के अनेक हिस्सों में संघर्ष की स्थितियाँ हैं—चाहे रूस-यूक्रेन विवाद हो या मध्य-पूर्व में तनाव। ऐसे समय में भारत की संतुलित और संवाद-आधारित नीति विश्व समुदाय में सम्मान अर्जित कर रही है। भारत ने सदैव आतंकवाद और हिंसा का विरोध किया है तथा शांति, सह-अस्तित्व और संवाद को प्राथमिकता दी है।

होली का संदेश भी यही है—असत्य और अहंकार चाहे कितने भी प्रबल हों, अंततः विजय सत्य, प्रेम और सद्भाव की ही होती है। होलिका दहन हमें अपने भीतर की संकीर्णताओं और विद्वेष को त्यागने की प्रेरणा देता है, जबकि धुलेंडी के रंग नई शुरुआत का संकेत देते हैं।

भारत की सांस्कृतिक विरासत ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ के सिद्धांत पर आधारित है—समस्त विश्व एक परिवार है। यही विचार आज की वैश्विक परिस्थितियों में और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है।आइए, इस होली पर हम केवल रंग न खेलें, बल्कि यह संकल्प लें कि हम प्रेम, सहिष्णुता और एकता के इन रंगों को अपने जीवन में स्थायी रूप से स्थान देंगे। भारत की विविधता ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है, और इस शक्ति को संजोकर रखना हम सबकी साझा जिम्मेदारी है। आप सभी को होली के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ।

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