वैश्विक संकट के बीच भारत की 'नेशन फर्स्ट' नीति: बड़बोले राष्ट्राध्यक्षों पर भारी पीएम मोदी का संयम
वैश्विक महाशक्तियों का बड़बोलापन और खोती साख
आज दुनिया भर में अशांति का माहौल है। अमेरिका और ईरान के बीच का तनाव हो, इजरायल-यूक्रेन-रूस के मोर्चे हों, या खाड़ी देशों में जारी आपसी बमबारी—स्थितियां लगातार बिगड़ रही हैं। लेकिन इस युद्धकाल में सबसे दिलचस्प बात यह रही कि कई वैश्विक नेताओं ने युद्ध से पहले और युद्ध के दौरान जो बड़ी-बड़ी बातें कीं, उन्होंने उनकी ही छवि को हास्यास्पद बना दिया।
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खोखले दावे: ईरान को पूरी तरह नेस्तनाबूद करने की धमकियां दी गईं, लेकिन जमीनी हकीकत में वे देश और आक्रामक हो गए।
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पीछे हटते संगठन: यूरोपीय देशों की एकजुटता का दम भरने वाला नाटो (NATO) संकट के समय किनारा करता नजर आया। वहीं फ्रांस जैसे देशों ने दो टूक कह दिया कि वे अपनी जमीन का इस्तेमाल युद्ध के लिए नहीं होने देंगे।
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अविश्वास का माहौल: जो देश एक तरफ शांति समझौते की टेबल पर बैठने की बात करते हैं, वही दूसरी तरफ मंच से एक-दूसरे को मिटाने की धमकी भी देते हैं।
नतीजा यह है कि आज वैश्विक मंच पर इन नेताओं की विश्वसनीयता खत्म हो चुकी है। हालात इतने अपमानजनक हैं कि जब एक राष्ट्राध्यक्ष दूसरे देश के दौरे पर जाता है, तो मेजबान देश प्रोटोकॉल के तहत उनका स्वागत करने तक नहीं आता। साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस करने तक की हिम्मत ये तथाकथित वैश्विक मध्यस्थ नहीं जुटा पा रहे हैं।
संकट के दौर में मध्यस्थ बना पाकिस्तान?
हद तो तब हो गई जब वैश्विक अशांति और हॉर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) के संकट को सुलझाने के लिए मध्यस्थता का जिम्मा पाकिस्तान जैसे देश को सौंपने की कोशिश की गई। वह पाकिस्तान जो खुद आतंकवाद की नर्सरी चलाकर आर्थिक और राजनीतिक रूप से बर्बादी की कगार पर खड़ा है, और जिसके खुद के वजूद की दुनिया में कोई गारंटी नहीं है, वह भला दुनिया में शांति क्या स्थापित करेगा।
भारतीय प्रधानमंत्री की मौन कूटनीति का लोहा
कुछ समय पहले तक भारत के भीतर भी कई विपक्षी दल इस बात पर हंगामा कर रहे थे कि दुनिया में इतनी बड़ी उथल-पुथल मची है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस पर चुप क्यों हैं? वे बोलते भी हैं तो बहुत नाप-तौल कर और सीमित क्यों बोलते हैं?
आज का वैश्विक परिदृश्य ऐसे सभी आलोचकों को जवाब देने के लिए काफी है। अकारण और असमय बयानबाजी करने वाले देशों के सामने आज ईंधन और आर्थिक मंदी का अभूतपूर्व संकट है। कई देश बर्बादी की कगार पर हैं, जहाँ तेल और गैस के दाम आसमान छू रहे हैं। इसके विपरीत, चारों तरफ जारी भीषण युद्ध और हिंसा के बीच भी भारत 'शांति का टापू' बना हुआ है। भारत में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस का पर्याप्त भंडार सुरक्षित है। इसका एकमात्र कारण यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिना वजह दूसरों के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देते और न ही भारत के मामलों में किसी और की दखलअंदाजी स्वीकार करते हैं।
'नेशन फर्स्ट' और बढ़ता वैश्विक प्रभाव
भारत की विदेश नीति पूरी तरह संतुलित और 'नेशन फर्स्ट' (राष्ट्र प्रथम) के सिद्धांत पर आधारित है। पीएम मोदी अगर अमेरिका और इजरायल के नेतृत्व से संवाद कायम रखते हैं, तो ईरान और खाड़ी देशों के साथ भी भारत के संबंध उतने ही मजबूत और सम्मानजनक बने रहते हैं।
इसी कूटनीतिक परिपक्वता का परिणाम है कि हाल ही में जब प्रधानमंत्री मोदी 5 देशों की ऐतिहासिक यात्रा पर गए, तो वहां के राष्ट्रप्रमुखों ने उनका अभूतपूर्व स्वागत किया। भारत के प्रधानमंत्री को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से नवाजे जाने का सिलसिला लगातार बढ़ रहा है। इस यात्रा के दौरान विदेशी सरकारों ने भारत के साथ ऊर्जा, सुरक्षा, आर्थिक और अत्याधुनिक तकनीक के क्षेत्रों में बेहद उत्साह के साथ कई बड़े समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं।
यह पूरी स्थिति साफ करती है कि आज वैश्विक मंच पर भारत का दबदबा और कूटनीतिक वजन किसी भी अन्य विकासशील या विकसित देश की तुलना में कहीं अधिक तेजी से बढ़ रहा है। आज की दुनिया नई दिल्ली की आवाज और भारत की अपेक्षाओं को पूरी गंभीरता से सुनती और मानती है। वैश्विक स्थिरता के इस दौर में पीएम मोदी का यह संयम और मौन कूटनीति बड़बोलेपन पर सबसे बड़ी जीत है।

