अंतरराष्ट्रीय आदिवासी दिवस पर विशेष: प्रतीकात्मक सम्मान नहीं, संवैधानिक अधिकार चाहिए
(उमंग सिंघार—विनायक फीचर्स)
विश्व आदिवासी दिवस पर सभी आदिवासी भाई-बहनों और युवाओं को जोहार।
9 अगस्त केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं है। यह दिन आदिवासी समाज की पहचान, उसकी समृद्ध संस्कृति, प्रकृति के साथ उसके गहरे रिश्ते और पीढ़ियों से चले आ रहे संघर्ष को स्मरण करने का अवसर है। आदिवासी समाज ने सदियों से जंगल, पहाड़, नदियों और जमीन के साथ सह-अस्तित्व की जीवन पद्धति विकसित की है। प्रकृति उसके लिए केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन, आस्था और संस्कृति का आधार है।
प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व हमारी पहचान
आदिवासी जीवन-दर्शन में वन, पर्वत और नदियों का विशेष महत्व है। धरती को माता और आकाश को पिता मानने वाली यह परंपरा मनुष्य और प्रकृति के बीच संतुलन का संदेश देती है। आदिवासी समाज का विश्वास रहा है कि जंगल और जलस्रोत सुरक्षित रहेंगे तो मानव जीवन भी सुरक्षित रहेगा।
सामुदायिकता भी आदिवासी समाज की महत्वपूर्ण विशेषता है। यहां व्यक्तिगत हित से ऊपर समुदाय के सामूहिक हित को महत्व दिया जाता है। पारंपरिक जीवन में सहयोग, श्रम, सहभागिता और सामाजिक समानता की भावना दिखाई देती है। महिलाओं की भूमिका भी समाज और परिवार में महत्वपूर्ण रही है।
पारंपरिक पर्वों में मांदल की थाप पर होने वाले लोकनृत्य और लोकगीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं हैं। इनमें प्रकृति, ऋतु, कृषि, वर्षा और सामुदायिक जीवन के प्रति आदिवासी समाज की संवेदनाएं अभिव्यक्त होती हैं। यही सांस्कृतिक विरासत उसकी विशिष्ट पहचान है।
जल, जंगल और जमीन पर अधिकार का सवाल
विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर उत्सव और सम्मान के साथ-साथ उन वास्तविक सवालों पर भी चर्चा जरूरी है, जिनका सामना आदिवासी समुदाय लंबे समय से कर रहा है। मध्यप्रदेश में आदिवासी समाज की बड़ी आबादी निवास करती है। ऐसे में वन अधिकार, ग्रामसभा की भूमिका, जमीन की सुरक्षा, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सम्मान जैसे विषय अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
आदिवासी समुदाय का कहना है कि वन अधिकार कानून का उद्देश्य उन्हें उनके पारंपरिक वन क्षेत्रों पर अधिकार और सुरक्षा देना था, लेकिन अधिकारों के दावों के निरस्त होने और प्रक्रियागत कठिनाइयों को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। जरूरत इस बात की है कि पात्र लोगों के दावों का निष्पक्ष परीक्षण हो और कानून की भावना के अनुरूप उन्हें अधिकार मिलें।
इसी तरह पेसा कानून ग्रामसभाओं को अनुसूचित क्षेत्रों में महत्वपूर्ण अधिकार प्रदान करता है। आदिवासी समाज लंबे समय से मांग करता रहा है कि ग्रामसभा के अधिकारों को वास्तविक रूप से मजबूत किया जाए और स्थानीय समुदायों की सहमति तथा भागीदारी को विकास योजनाओं में उचित महत्व मिले।
सुरक्षा, सम्मान और न्याय भी जरूरी
आदिवासी समाज के सामने जमीन और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े सवालों के साथ सामाजिक सुरक्षा और सम्मान का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। किसी भी समुदाय के साथ अन्याय, हिंसा या भेदभाव लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है।
विकास परियोजनाओं के कारण विस्थापन, भूमि संबंधी विवाद और प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार जैसे मामलों में आदिवासी समुदाय की आवाज को सुना जाना चाहिए। विकास तभी सार्थक माना जा सकता है, जब उसका लाभ स्थानीय लोगों तक पहुंचे और उनकी पहचान तथा आजीविका सुरक्षित रहे।
अलग आदिवासी धर्म कोड की मांग
आदिवासी समाज की एक प्रमुख मांग जनगणना में अलग धर्म कोड से जुड़ी हुई है। समुदाय का तर्क है कि उसकी अपनी विशिष्ट धार्मिक मान्यताएं, प्रकृति-केंद्रित आस्थाएं, परंपराएं और सांस्कृतिक जीवन-पद्धति है। इसलिए जनगणना में उसकी अलग पहचान को दर्ज करने की व्यवस्था होनी चाहिए।
2027 की प्रस्तावित जनगणना को लेकर आदिवासी संगठनों और समुदायों की यह मांग एक बार फिर सामने आ रही है कि आदिवासी धार्मिक पहचान के लिए अलग विकल्प उपलब्ध कराया जाए। इस विषय पर व्यापक संवाद और सभी पक्षों की भागीदारी आवश्यक है।
सम्मान के साथ अधिकार भी चाहिए
आदिवासी समाज को केवल सांस्कृतिक कार्यक्रमों, स्मारकों या प्रतीकात्मक आयोजनों तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। वास्तविक सम्मान तभी होगा, जब आदिवासी नागरिकों को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और अपनी जमीन तथा प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े संवैधानिक एवं कानूनी अधिकार प्रभावी रूप से मिलें।
आदिवासी समाज के नायकों—बिरसा मुंडा, टंट्या मामा और रानी दुर्गावती—का इतिहास संघर्ष, स्वाभिमान और अधिकारों की रक्षा की प्रेरणा देता है। उनकी विरासत को याद करने का सबसे बेहतर तरीका यही है कि आदिवासी समुदाय के वर्तमान सवालों को गंभीरता से सुना जाए।
विश्व आदिवासी दिवस हमें यह संकल्प लेने का अवसर देता है कि आदिवासी समाज की भाषा, संस्कृति, परंपराओं और पहचान का संरक्षण केवल सरकारी घोषणाओं तक सीमित न रहे। जल, जंगल और जमीन से जुड़े अधिकारों की रक्षा, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, युवाओं के लिए रोजगार और महिलाओं की सुरक्षा जैसे विषय नीति-निर्माण के केंद्र में होने चाहिए।
आदिवासी समाज की आवाज लोकतंत्र की आवाज है। इसलिए आवश्यकता प्रतीकात्मक सम्मान से आगे बढ़कर वास्तविक अधिकार, समान अवसर और संवैधानिक संरक्षण सुनिश्चित करने की है।
जय जोहार। जय आदिवासी
