अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस विशेष: 'टैग' टाइगर स्टेट का, लेकिन क्या सुरक्षित हैं जंगल? पढ़ें नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार का विशेष आलेख

International Tiger Day Special: The 'Tiger State' tag—but are the forests safe? Read a special article by Leader of the Opposition Umang Singhar.
 
 VB

International Tiger Day 2026 Special: हर साल 29 जुलाई को पूरी दुनिया अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस (International Tiger Day) मनाती है। मध्य प्रदेश खुद को 'टाइगर स्टेट' कहकर गौरवान्वित महसूस करता है। सरकार बाघों की बढ़ती संख्या के आंकड़े प्रस्तुत कर अपनी पीठ थपथपाती है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है।

एक गंभीर प्रश्न जो आज हर नागरिक को पूछना चाहिए—क्या केवल बाघों की संख्या बढ़ा देना ही संरक्षण है, या उनके प्राकृतिक जंगल, आवास और कॉरिडोर (गलियारे) बचाना भी उतना ही आवश्यक है? जंगल और उनके आवास को उजाड़कर बाघों का संरक्षण कभी संभव नहीं हो सकता।

🏗️ विकास परियोजनाओं और भ्रष्टाचार का गठजोड़

आज मध्य प्रदेश में विकास परियोजनाओं और निजी स्वार्थों के गठजोड़ के कारण बाघों के प्राकृतिक आवासों पर संकट मंडरा रहा है। केन-बेतवा लिंक परियोजना, भोपाल का पश्चिमी बाईपास, विभिन्न सड़क-रेल परियोजनाएं और वन क्षेत्रों के पास तेजी से बढ़ता रियल एस्टेट कारोबार यह संकेत देते हैं कि प्रदेश की विकास नीतियों पर गंभीर पुनर्विचार की आवश्यकता है।

1. केन-बेतवा लिंक परियोजना

पन्ना टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा डूब क्षेत्र में आने की आशंका है। लाखों पेड़ों की कटाई और हजारों हेक्टेयर वन भूमि के नुकसान से बाघों, घड़ियालों और गिद्धों के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय की समिति और स्वतंत्र विशेषज्ञों द्वारा उठाए गए सवालों का पारदर्शी उत्तर देने के बजाय इसे औपचारिकताओं तक सीमित कर दिया गया है।

2. भोपाल का पश्चिमी बाईपास

यह परियोजना उस प्राकृतिक गलियारे से गुजरती है, जो 'शहरी बाघों' की आवाजाही के लिए अत्यंत संवेदनशील माना जाता है। इस मार्ग के आसपास भूमि खरीद-बिक्री में अनियमितताओं के आरोप भी उठे हैं। ऐसे गंभीर मामलों में निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच के बजाय सरकार का मौन धारण करना प्रशासनिक विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करता है।

🛣️ खतरे में वन्यजीव गलियारे (Tiger Corridors)

प्रदेश की कई प्रमुख इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं बाघों की सुरक्षा के लिए चुनौती बन चुकी हैं:

  • राष्ट्रीय राजमार्ग 45 (हिरन-सिंदूर खंड): नौरादेही अभ्यारण्य और वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व से गुजरने वाले इस मार्ग पर पिछले दो वर्षों में 237 वाहन-वन्यजीव टक्करों में 94 जीवों की मौत दर्ज की जा चुकी है।

  • कटनी-सिंगरौली रेलवे लाइन: संजय-दुबरी टाइगर रिजर्व से गुजरने वाले इस रेलमार्ग पर 2010 से अब तक 39 से अधिक वन्यजीवों की जान जा चुकी है। विशेषज्ञ इस रेल लाइन के पुनर्संरेखण (Realignment) की लगातार मांग कर रहे हैं।

  • कान्हा-पेंच-बांधवगढ़-पन्ना कॉरिडोर सड़क: वैज्ञानिक डिजाइन के अभाव में चार प्रमुख टाइगर रिजर्वों को जोड़ने वाले इस मार्ग से बाघों का प्राकृतिक आवागमन बाधित होने की आशंका है।

  • दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे (पश्चिमी कॉरिडोर): पर्याप्त अंडरपास व ओवरपास जैसी संरचनाओं के बिना बाघों की आवाजाही जोखिम भरी साबित हो रही है।

🏛️ जवाबदेही और पारदर्शिता की मांग

बाघ संरक्षण केवल वन विभाग का विषय नहीं है। सड़क, रेल, सिंचाई और नगरीय विकास विभागों को भी पर्यावरण संतुलन का ध्यान रखना होगा। लोकतंत्र में पारदर्शिता कोई विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता है।

विपक्ष के रूप में हमारी मांगें स्पष्ट हैं:

  1. केन-बेतवा और भोपाल पश्चिमी बाईपास जैसी संवेदनशील परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभाव और भूमि सौदों की समयबद्ध स्वतंत्र जांच कराई जाए।

  2. बाघ गलियारों से जुड़ी सभी वैज्ञानिक रिपोर्टों, नक्शों और निर्णयों को सार्वजनिक (Public Domain) किया जाए।

  3. गड़बड़ी में लिप्त अधिकारियों या प्रभावशाली व्यक्तियों पर सख्त कानूनी कार्रवाई हो।

बाघ केवल जंगलों की शान नहीं, बल्कि हमारे समूचे पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem) और जल स्रोतों की जीवनरेखा हैं। यदि जंगल सुरक्षित नहीं रहेंगे, तो नदियों और हमारी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी खतरे में पड़ जाएगा। अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस पर हमें केवल आंकड़ों की गिनती नहीं करनी चाहिए, बल्कि विकास और प्रकृति के बीच सही संतुलन बनाने का ईमानदार संकल्प लेना चाहिए।

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