जाँच एजेंसियों का निष्पक्ष होना आवश्यक
(डॉ. चन्दर सोनाने – विनायक फीचर्स)
दिल्ली की विशेष सीबीआई कोर्ट ने हाल ही में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया तथा अन्य आरोपियों को आरोप तय होने से पहले ही आरोपमुक्त कर दिया। दिल्ली सरकार की आबकारी नीति से जुड़े प्रकरण में सीबीआई ने केजरीवाल को 176 दिन और सिसोदिया को 530 दिन जेल में रखा था। जिस मामले में वे इतने समय तक कारावास में रहे, उसे अदालत ने आरोप तय करने योग्य भी नहीं माना।
सीबीआई की विशेष अदालत के न्यायाधीश ने अपने आदेश में कहा कि लोकसेवकों को पर्याप्त और स्वीकार्य साक्ष्यों के बिना आरोपी बनाया गया। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि यदि ठोस सामग्री के अभाव में आपराधिक मुकदमा चलाया जाए, तो यह न्याय प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। साथ ही जाँच अधिकारी की कार्यप्रणाली पर भी प्रश्न उठाए गए।
यह निर्णय केवल एक मामले तक सीमित नहीं है। यह व्यापक बहस को जन्म देता है कि जाँच एजेंसियाँ—चाहे केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) हो या अन्य कोई संस्था—क्या पूरी तरह निष्पक्ष और स्वतंत्र ढंग से कार्य कर रही हैं? लोकतंत्र में जाँच एजेंसियों की विश्वसनीयता अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। यदि उन पर राजनीतिक प्रभाव या दुरुपयोग का आरोप लगता है, तो इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनविश्वास कमजोर पड़ता है।
भारतीय राजनीति के इतिहास में यह आरोप नया नहीं है। अतीत में भी विभिन्न सरकारों पर जाँच एजेंसियों के दुरुपयोग के आरोप लगते रहे हैं। सत्ता किसी भी दल की हो, यदि विपक्ष को कमजोर करने या राजनीतिक लाभ के लिए एजेंसियों का उपयोग होता है, तो यह लोकतांत्रिक संतुलन के लिए घातक सिद्ध हो सकता है।
लोकतंत्र में सशक्त विपक्ष की भूमिका उतनी ही आवश्यक है, जितनी सशक्त सरकार की। सक्षम विपक्ष न केवल सरकार की नीतियों पर निगरानी रखता है, बल्कि गलत निर्णयों पर अंकुश लगाने का कार्य भी करता है। यदि जाँच एजेंसियाँ राजनीतिक विवादों का केंद्र बन जाएँ, तो इससे शासन-प्रणाली में अविश्वास की भावना जन्म लेती है।
दिल्ली की आबकारी नीति प्रकरण में लंबी जाँच, गिरफ्तारियाँ, आरोप-प्रत्यारोप और फिर न्यायालय द्वारा राहत—इन सबने यह प्रश्न पुनः खड़ा कर दिया है कि क्या हमारे राजनीतिक परिदृश्य में आरोप ही दंड का पर्याय बनते जा रहे हैं? न्यायिक प्रक्रिया का मूल सिद्धांत है कि अंतिम सत्य आरोपों से नहीं, बल्कि प्रमाणों और न्यायिक निर्णयों से निर्धारित होता है।
अंततः यह बहस किसी एक दल की जीत या हार की नहीं है। यह उस लोकतांत्रिक संतुलन की बहस है जिसमें—
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जाँच एजेंसियाँ स्वतंत्र और निष्पक्ष रहें,
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राजनीतिक दल जवाबदेह रहें,
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और न्यायिक प्रक्रिया पारदर्शी एवं समयबद्ध हो।
भारत के लोकतंत्र ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं। समय साक्षी है कि अंततः सत्य और न्याय की ही विजय होती है। देशहित में आवश्यक है कि सभी जाँच एजेंसियाँ अपने विधिक दायरे में रहकर, बिना किसी पक्षपात के कार्य करें। तभी लोकतंत्र की जड़ें मजबूत रह सकेंगी और जनता का विश्वास कायम रहेगा।
