क्या राजनीति में ‘रिटायरमेंट’ एक अनैतिक शब्द है?

Is 'retirement' an unethical word in politics?
 
David Littleproud

(ओंकारेश्वर पांडेय — विनायक फीचर्स)

“बहुत साल पहले एक बुद्धिमान व्यक्ति ने कहा था— लोग यह याद नहीं रखते कि आप घोड़े पर कैसे चढ़े, बल्कि यह याद रखते हैं कि आप कैसे उतरे।”
सत्ता की कुर्सी पर बैठे व्यक्ति को यह याद रखना चाहिए कि वह वहां हमेशा के लिए नहीं है। यदि वह समय रहते उतरना नहीं जानता, तो इतिहास उसे धक्का देकर उतारता है।

हाल ही में ऑस्ट्रेलिया के 49 वर्षीय नेता David Littleproud ने यह कहकर सबको चौंका दिया कि “मैं थक गया हूँ, अब मुझमें वह ऊर्जा नहीं बची कि मैं नेतृत्व कर सकूँ।” यह बयान महज एक इस्तीफा नहीं, बल्कि उन नेताओं के लिए व्यंग्य है जो उम्र और ऊर्जा की सीमाओं को स्वीकार करने के बजाय कुर्सी से चिपके रहते हैं।

वह क्षण जिसने सबको चुप करा दिया

ऑस्ट्रेलिया की संसद में प्रश्नकाल के बाद डेविड लिटिलप्राउड अपनी पत्नी के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस में आए और भावुक स्वर में कहा कि अब उनके भीतर नेतृत्व जारी रखने की ऊर्जा नहीं है। उन्होंने कहा कि वह अपनी पार्टी से प्रेम करते हैं, लेकिन यदि वह यह कहें कि वही पार्टी को आगे ले जाने के लिए सबसे उपयुक्त व्यक्ति हैं, तो यह ईमानदारी नहीं होगी।

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कौन हैं डेविड लिटिलप्राउड

लिटिलप्राउड ऑस्ट्रेलिया की National Party of Australia के प्रमुख नेता रहे हैं, जो Liberal Party of Australia के साथ गठबंधन में काम करती है। 2016 में पहली बार संसद पहुंचे लिटिलप्राउड कृषि और जल संसाधन मंत्री भी रह चुके हैं। मई 2022 में उन्होंने पार्टी की कमान संभाली थी।

भारतीय राजनीति और आत्मचिंतन के उदाहरण

भारतीय राजनीति में भी ऐसे उदाहरण मिलते हैं जब नेताओं ने पद से ऊपर उठकर सोचा।
Jawaharlal Nehru ने 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद गहरी आत्मालोचना की थी। उन्होंने कांग्रेस संसदीय दल के सामने पद छोड़ने की इच्छा भी जताई थी।

इसी तरह 1963 का Kamaraj Plan भारतीय राजनीति में त्याग का बड़ा उदाहरण माना जाता है। उस समय K. Kamaraj के सुझाव पर कई केंद्रीय मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों ने पद छोड़कर संगठन में काम करने का निर्णय लिया था।

नानाजी देशमुख का उदाहरण

Nanaji Deshmukh ने 60 वर्ष की आयु में सक्रिय राजनीति छोड़ने का संकल्प लिया था। उन्होंने सत्ता के बजाय सामाजिक कार्यों को चुना और चित्रकूट में विकास कार्यों में अपना जीवन समर्पित किया।

वैश्विक राजनीति में उम्र की बहस

आज दुनिया में ‘Gerontocracy’ यानी वृद्ध नेतृत्व को लेकर भी चर्चा हो रही है। भारत में Narendra Modi, Sharad Pawar, Nitish Kumar, Mallikarjun Kharge और Sonia Gandhi जैसे वरिष्ठ नेता लंबे समय से सक्रिय राजनीति में हैं।

इसी तरह वैश्विक राजनीति में भी Donald Trump और Benjamin Netanyahu जैसे नेताओं की उम्र और नेतृत्व क्षमता को लेकर बहस होती रही है।

नैतिकता और नेतृत्व का प्रश्न

आज सवाल केवल उम्र का नहीं है, बल्कि नैतिकता और कार्य-क्षमता का भी है। क्या राजनीति में वही व्यक्ति नेतृत्व करता रहे, जो ऊर्जा और दृष्टि के साथ काम कर सके? या फिर सत्ता के मोह में पद से चिपके रहना ही राजनीति की नियति बन जाए?

न्यूजीलैंड की पूर्व प्रधानमंत्री Jacinda Ardern ने 2023 में पद छोड़ते हुए कहा था— “मेरे टैंक में अब और ईंधन नहीं बचा है।” यह स्वीकार करना कि अब कोई और बेहतर नेतृत्व कर सकता है, दरअसल लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है।

डेविड लिटिलप्राउड का इस्तीफा एक महत्वपूर्ण संदेश देता है— राजनीति में सबसे बड़ी शक्ति सत्ता नहीं, बल्कि यह समझ है कि सत्ता छोड़ने का समय कब आ गया है। जब नेता यह स्वीकार कर लेते हैं कि नई पीढ़ी को अवसर देना चाहिए, तभी लोकतंत्र मजबूत होता है। आखिरकार इतिहास यह नहीं देखता कि कोई नेता सत्ता में कितने समय तक रहा, बल्कि यह याद रखता है कि उसने सत्ता से विदाई कैसे ली।

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