क्या युवाओं को भविष्य के लिए तैयार कर रही है उच्च शिक्षा व्यवस्था?
(डॉ. शैलेश शुक्ला — विनायक फीचर्स)
भारत में उच्च शिक्षा को लंबे समय से बेहतर भविष्य की सीढ़ी माना जाता रहा है। माता-पिता अपने बच्चों को इसलिए पढ़ाते हैं कि वे अच्छी डिग्री हासिल करें, सम्मानजनक रोजगार पाएं और आत्मनिर्भर बनें। लेकिन बदलते दौर में एक गंभीर सवाल सामने खड़ा है—क्या हमारी उच्च शिक्षा व्यवस्था युवाओं को उस भविष्य के लिए तैयार कर रही है, जिसकी नौकरी की दुनिया आज मांग कर रही है?
आज बड़ी संख्या में युवा स्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद भी ऐसी नौकरी पाने में कठिनाई महसूस कर रहे हैं, जिसका सीधा संबंध उनकी पढ़ाई से हो। यह स्थिति केवल बेरोजगारी की समस्या नहीं है, बल्कि शिक्षा और रोजगार के बीच मौजूद असंतुलन की ओर भी संकेत करती है।
हाल में नीति आयोग की एक रिपोर्ट ने इस अंतर को रेखांकित किया है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में केवल 8.25 प्रतिशत स्नातक ही ऐसे रोजगार में हैं, जो उनकी पढ़ाई से सीधे जुड़े हैं। स्नातकों में बेरोजगारी दर 13 प्रतिशत बताई गई है, जबकि स्नातक महिलाओं के मामले में यह आंकड़ा 20.4 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। ये आंकड़े बताते हैं कि उच्च शिक्षा के विस्तार के बावजूद रोजगार के अनुरूप कौशल विकसित करना अभी भी बड़ी चुनौती है।
डिग्री है, लेकिन नौकरी के लिए जरूरी कौशल?
भारत में बड़ी संख्या में विद्यार्थी बीए, बीएससी और बीकॉम जैसी सामान्य स्नातक डिग्रियां करते हैं। इन विषयों का अपना महत्व है और इन्हें रोजगारहीन या अनुपयोगी मानना उचित नहीं होगा। असली समस्या यह है कि इन पाठ्यक्रमों को आधुनिक रोजगार बाजार की जरूरतों के साथ पर्याप्त रूप से नहीं जोड़ा गया है।
विद्यार्थी कई वर्षों तक कक्षाओं में पढ़ता है, परीक्षाएं देता है और अंततः डिग्री हासिल करता है। लेकिन नौकरी के बाजार में पहुंचने के बाद उसे पता चलता है कि केवल डिग्री उसके लिए पर्याप्त नहीं है। कंपनियां उससे कंप्यूटर ज्ञान, संचार कौशल, समस्या समाधान की क्षमता, तकनीकी समझ, टीम में काम करने की योग्यता और नई तकनीक सीखने की क्षमता भी चाहती हैं।
यहीं से शिक्षा और रोजगार के बीच की खाई दिखाई देने लगती है।
करोड़ों विद्यार्थी, लेकिन रोजगार से कमजोर जुड़ाव
नीति आयोग के आंकड़ों के अनुसार देश में लगभग 3.4 करोड़ विद्यार्थी स्नातक स्तर के कार्यक्रमों में अध्ययन कर रहे हैं। इनमें लगभग 1.13 करोड़ विद्यार्थी बीए में हैं। बीए, बीएससी और बीकॉम जैसे प्रमुख पाठ्यक्रमों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या दो करोड़ से अधिक है।
इतनी बड़ी आबादी यदि ऐसी शिक्षा प्राप्त कर रही है जिसका रोजगार से संबंध कमजोर है, तो इसका प्रभाव केवल विद्यार्थियों और उनके परिवारों तक सीमित नहीं रहेगा। इसका असर देश की उत्पादकता, आय और आर्थिक विकास पर भी पड़ेगा।
इसलिए उच्च शिक्षा की गुणवत्ता का मूल्यांकन केवल यह देखकर नहीं किया जा सकता कि कितने विद्यार्थियों को डिग्री मिली। यह भी देखना होगा कि डिग्री मिलने के बाद कितने युवा रोजगार, उद्यमिता या किसी उत्पादक कार्य से जुड़ सके।
बदल रही है रोजगार की दुनिया
आज रोजगार का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। कंप्यूटर, इंटरनेट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा, डिजिटल सेवाएं, ई-कॉमर्स और ऑटोमेशन ने काम करने के तरीके को काफी बदल दिया है।
नियोक्ताओं को ऐसे युवाओं की आवश्यकता है जो किताबों का ज्ञान रखने के साथ-साथ उसे वास्तविक परिस्थितियों में इस्तेमाल भी कर सकें। उन्हें डिजिटल उपकरणों का इस्तेमाल करना, समस्याओं का समाधान खोजना, प्रभावी संवाद करना, टीम के साथ काम करना और नई तकनीक को तेजी से सीखना आना चाहिए।
लेकिन अनेक कॉलेजों में पढ़ाई अब भी मुख्य रूप से कक्षा, किताब, परीक्षा और अंक के आसपास केंद्रित है। विद्यार्थियों को वास्तविक कार्यस्थल का अनुभव अपेक्षाकृत कम मिलता है। इंटर्नशिप, अप्रेंटिसशिप, उद्योग आधारित परियोजनाओं और व्यावहारिक प्रशिक्षण की कमी इस समस्या को और बढ़ाती है।
विद्यार्थी को डिग्री के बाद फिर से प्रशिक्षण क्यों लेना पड़े?
एक युवा अपने जीवन के कई महत्वपूर्ण वर्ष उच्च शिक्षा प्राप्त करने में लगाता है। परिवार उसकी फीस, रहने और अन्य खर्चों पर पैसा खर्च करता है। स्वाभाविक रूप से उम्मीद होती है कि शिक्षा पूरी होने के बाद वह आत्मनिर्भर हो जाएगा।
लेकिन जब वही युवा नौकरी के लिए पहुंचता है और उससे ऐसे कौशल मांगे जाते हैं, जो उसे कॉलेज में सिखाए ही नहीं गए, तो उसे दोबारा प्रशिक्षण लेना पड़ता है। कंप्यूटर कोर्स, अंग्रेजी और संचार कौशल, तकनीकी प्रमाणपत्र या अन्य व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए उसे अतिरिक्त समय और पैसा खर्च करना पड़ता है।
ऐसे में सवाल उठता है कि उच्च शिक्षा को रोजगार की वास्तविक जरूरतों से पहले ही क्यों नहीं जोड़ा गया?
सरकारी नौकरी की होड़ भी बड़ी चुनौती
भारत में सरकारी नौकरी को लंबे समय से सुरक्षित और सम्मानजनक रोजगार माना जाता है। इसलिए बड़ी संख्या में युवा स्नातक होने के बाद प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लग जाते हैं।
सरकारी नौकरी की इच्छा गलत नहीं है, लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब युवा वर्षों तक केवल एक परीक्षा के भरोसे अपनी दूसरी संभावनाओं को छोड़ देता है। सरकारी पद सीमित हैं, जबकि आवेदकों की संख्या बहुत बड़ी है।
नीति आयोग के अनुसार नवंबर 2024 से जुलाई 2025 के बीच लगभग 1.86 करोड़ आवेदन केवल 55 हजार सरकारी पदों के लिए आए। यह आंकड़ा सरकारी नौकरी के प्रति युवाओं की भारी प्रतिस्पर्धा को दर्शाता है।
यदि उच्च शिक्षा के दौरान विद्यार्थियों को रोजगार, उद्यमिता, कौशल विकास और निजी क्षेत्र के अवसरों की पर्याप्त जानकारी मिले तो वे करियर के कई विकल्प तैयार कर सकते हैं।
कौशल आधारित शिक्षा को सम्मान देना होगा
एक और महत्वपूर्ण समस्या सामाजिक सोच से जुड़ी है। हमारे समाज में सामान्य विश्वविद्यालयी डिग्री को अक्सर कौशल आधारित शिक्षा से अधिक प्रतिष्ठित माना जाता है। कई परिवार तकनीकी या व्यावसायिक प्रशिक्षण को कमतर समझते हैं।
यह सोच बदलने की आवश्यकता है।
एक कुशल तकनीशियन, इलेक्ट्रिशियन, मशीन ऑपरेटर, डिजाइनर, डिजिटल विशेषज्ञ या किसी अन्य तकनीकी क्षेत्र में प्रशिक्षित व्यक्ति भी सम्मानजनक जीवन और अच्छी आय प्राप्त कर सकता है। रोजगार की दुनिया में कौशल का वास्तविक मूल्य डिग्री के नाम से कम नहीं होता।
नीति आयोग की रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, सामान्य स्नातक डिग्री लेने वाले और अतिरिक्त कौशल प्रशिक्षण न पाने वाले युवाओं की औसत शुरुआती आय लगभग 22 हजार रुपये प्रतिमाह थी, जबकि कौशल प्रशिक्षण प्राप्त युवाओं की औसत शुरुआती आय लगभग 29 हजार रुपये प्रतिमाह बताई गई। इससे स्पष्ट होता है कि डिग्री के साथ उपयोगी कौशल रोजगार और आय की संभावनाओं को बेहतर बना सकता है।
डिग्रियां खत्म नहीं, उनका स्वरूप बदलना होगा
समाधान यह नहीं है कि बीए, बीएससी या बीकॉम जैसी डिग्रियों को समाप्त कर दिया जाए। जरूरत है कि इनके पाठ्यक्रमों को बदलती अर्थव्यवस्था की जरूरतों से जोड़ा जाए।
बीए के विद्यार्थियों को डिजिटल कम्युनिकेशन, मीडिया, प्रशासन, पर्यटन और अन्य रोजगारोन्मुख कौशल से जोड़ा जा सकता है। बीएससी के विद्यार्थियों को प्रयोगशाला, डेटा और तकनीकी प्रशिक्षण के अधिक अवसर मिल सकते हैं। वहीं बीकॉम के विद्यार्थियों को डिजिटल वित्त, ई-कॉमर्स, डेटा विश्लेषण और आधुनिक अकाउंटिंग से परिचित कराया जा सकता है।
इस तरह सामान्य डिग्री भी रोजगार के लिए मजबूत आधार बन सकती है।
इंटर्नशिप और अप्रेंटिसशिप को अनिवार्य बनाया जाए
हर विद्यार्थी को पढ़ाई के दौरान वास्तविक कार्य का अनुभव मिलना चाहिए। कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को उद्योग, कंपनियों, सरकारी संस्थानों और स्थानीय व्यवसायों के साथ मजबूत साझेदारी विकसित करनी चाहिए।
इंटर्नशिप, अप्रेंटिसशिप और वास्तविक परियोजनाओं के माध्यम से विद्यार्थी यह समझ सकता है कि कार्यस्थल पर किस तरह की जिम्मेदारियां निभानी होती हैं।
इससे नियोक्ता और विद्यार्थी दोनों को लाभ होगा। कंपनियों को तैयार प्रतिभाएं मिलेंगी और विद्यार्थियों को नौकरी के लिए आवश्यक व्यावहारिक अनुभव।
शिक्षकों का प्रशिक्षण भी जरूरी
शिक्षा व्यवस्था में बदलाव केवल विद्यार्थियों तक सीमित नहीं रह सकता। शिक्षकों को भी नई तकनीकों और बदलते रोजगार बाजार की जानकारी लगातार मिलनी चाहिए।
विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों को नियमित रूप से आमंत्रित किया जा सकता है। इससे विद्यार्थियों को किताबों से आगे निकलकर वास्तविक दुनिया की जानकारी मिलेगी।
करियर काउंसलिंग बने शिक्षा का हिस्सा
करियर संबंधी मार्गदर्शन भी उच्च शिक्षा की बड़ी जरूरत है। विद्यार्थी को केवल यह बताना पर्याप्त नहीं है कि उसे कौन-सा विषय पढ़ना है। उसे यह भी बताया जाना चाहिए कि उस विषय के बाद कौन-कौन से करियर विकल्प उपलब्ध हैं, किन कौशलों की जरूरत होगी और आगे किन क्षेत्रों में अवसर मिल सकते हैं।
यदि किसी विद्यार्थी को 18-19 वर्ष की उम्र में सही करियर जानकारी मिल जाए तो वह 24-25 वर्ष की उम्र में नौकरी की तलाश करते समय कहीं अधिक तैयार हो सकता है।
शिक्षा का लक्ष्य सिर्फ डिग्री नहीं
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें शिक्षा को केवल डिग्री हासिल करने का माध्यम मानने की मानसिकता से बाहर निकलना होगा।
शिक्षा का उद्देश्य परीक्षा पास करना और प्रमाणपत्र हासिल करना भर नहीं है। शिक्षा व्यक्ति में सोचने, समझने, सवाल पूछने, समस्या का समाधान करने, संवाद करने, तकनीक को समझने और बदलती परिस्थितियों के अनुरूप खुद को ढालने की क्षमता विकसित करती है।
भविष्य की नौकरियां आज की नौकरियों जैसी नहीं होंगी। इसलिए युवाओं को केवल वर्तमान रोजगार के लिए नहीं, बल्कि बदलते रोजगार बाजार के लिए तैयार करना होगा।
उच्च शिक्षा की सफलता का वास्तविक पैमाना यह नहीं कि कितने युवाओं के हाथ में डिग्री है, बल्कि यह है कि कितने युवा उस डिग्री के साथ अपने पैरों पर खड़े होने में सक्षम हैं।

