लोकनायक जयप्रकाश नारायण के आदर्शों से भटकती राजनीति और बाजार बनती व्यवस्था पर मंथन जरूरी

जन्मदिवस कार्यक्रम में शामिल होकर वक्ता ने जताई चिंता, कहा—लोकतंत्र की मर्यादा, शिक्षा के मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारी की रक्षा करना हम सभी का दायित्व

 
हरीश चंद्र श्रीवास्तव वरिष्ठ भाजपा नेता

हरीश चंद्र श्रीवास्तव वरिष्ठ भाजपा नेता  , लखनऊ।लोकनायक जयप्रकाश नारायण के जन्मदिवस पर भातखंडे संगीत नाटक अकादमी के प्रेक्षागृह में श्री के.सी. जैन एडवोकेट द्वारा आयोजित कार्यक्रम में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आयोग के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष एवं पूर्व सांसद श्री बैजनाथ रावत, विधान परिषद सदस्य श्री पवन सिंह और अशोक पांडेय के साथ शामिल होने का अवसर मिला।

कार्यक्रम के बाद अपने विचार साझा करते हुए वक्ता ने आयोजनकर्ता श्री के.सी. जैन को साधुवाद और बधाई दी। उन्होंने कहा कि श्री जैन कई वर्षों से लोकनायक जयप्रकाश नारायण के जन्मदिवस पर कार्यक्रम आयोजित कर उनके विचारों और योगदान को याद करने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं।

 

 

लोकनायक जयप्रकाश नारायण ऐसे महापुरुष थे, जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर संपूर्ण क्रांति आंदोलन तक देश को दिशा देने का प्रयास किया। लोकतंत्र की बहाली और उसकी मजबूती के लिए उन्होंने अपना जीवन, आत्मबल और संपूर्ण ऊर्जा राष्ट्र को समर्पित कर दी। आपातकाल के दौरान उन्होंने संघर्ष किया और जीवन के उत्तरार्ध में भी कठिन यातनाएं झेलीं।

संपूर्ण क्रांति के आदर्शों से कितना दूर चली गई राजनीति?

वक्ता ने कहा कि लोकनायक जयप्रकाश नारायण के जन्मदिवस पर आयोजित कार्यक्रम में बैठकर उनके आंदोलन और आज की राजनीति के बीच के अंतर पर विचार करने का अवसर मिला। आपातकाल के बाद चुनाव हुए, जनता पार्टी की सरकार बनी, लेकिन बाद में राजनीतिक दलों और नेताओं के बीच मतभेद तथा सत्ता की खींचतान बढ़ती चली गई।

उन्होंने चिंता जताई कि संपूर्ण क्रांति आंदोलन से उभरे अनेक नेताओं और राजनीतिक धाराओं पर भी समय के साथ परिवारवाद, जातिवाद और धनबल की राजनीति के प्रभाव दिखाई देने लगे। जिन बुराइयों के विरुद्ध लोकनायक ने संघर्ष किया था, उन्हीं प्रवृत्तियों के राजनीति में बने रहने पर आत्ममंथन की आवश्यकता है। वक्ता के अनुसार, लोकनायक के विचारों को केवल जन्मदिवस पर याद करना पर्याप्त नहीं है। उनके आदर्शों को राजनीतिक आचरण और सार्वजनिक जीवन में अपनाना भी जरूरी है।

लोकतांत्रिक असहमति की भाषा मर्यादित हो

वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य पर टिप्पणी करते हुए वक्ता ने कहा कि लोकतंत्र में असहमति स्वाभाविक है, लेकिन असहमति व्यक्त करने के नाम पर अराजकता, अपशब्दों और अमर्यादित भाषा को उचित नहीं ठहराया जा सकता। राजनीतिक मतभेदों के बावजूद संवाद, शालीनता और संवैधानिक मर्यादाओं का पालन आवश्यक है।

उन्होंने सवाल उठाया कि सार्वजनिक जीवन में इस्तेमाल होने वाली भाषा और व्यवहार क्या वास्तव में हमारी लोकतांत्रिक परंपराओं तथा सांस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप हैं? लोकतंत्र की मजबूती केवल चुनावों से नहीं, बल्कि संस्थाओं के सम्मान, विचारों की स्वतंत्रता और जिम्मेदार आचरण से भी सुनिश्चित होती है।

उन्होंने न्यायपालिका, विशेषकर उच्चतम न्यायालय जैसी संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा बनाए रखने पर भी जोर दिया। उनके विचार में लोकतंत्र के प्रहरी संस्थानों की स्वतंत्रता और प्रतिष्ठा की रक्षा करना समाज और शासन, दोनों की सामूहिक जिम्मेदारी है।

शिक्षा और डिजिटल दुनिया में मूल्यों का संकट

वक्ता ने मौजूदा सामाजिक परिस्थितियों के लिए शिक्षा व्यवस्था और डिजिटल माध्यमों पर उपलब्ध सामग्री को लेकर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि शिक्षा को केवल व्यावसायिक लाभ का साधन बना देना और इंटरनेट की दुनिया में बिना सामाजिक जिम्मेदारी के किसी भी तरह की सामग्री परोसना गंभीर सवाल खड़े करता है।

जब शिक्षा, डिजिटल संवाद और सार्वजनिक जीवन से नैतिकता, संवेदनशीलता तथा सामाजिक उत्तरदायित्व कमजोर होने लगते हैं, तो उसका असर नई पीढ़ी के संस्कारों पर भी पड़ता है। इसलिए यह आवश्यक है कि तकनीकी प्रगति के साथ जीवन-मूल्यों और नागरिक जिम्मेदारियों को भी समान महत्व दिया जाए। उन्होंने सनातन संस्कृति के मूल तत्वों पर आत्ममंथन करने की आवश्यकता बताते हुए कहा कि संस्कृति का वास्तविक अर्थ केवल परंपराओं का उल्लेख करना नहीं, बल्कि उसके मूल्यों को जीवन में उतारना है।

हर क्षेत्र के बढ़ते व्यावसायीकरण पर लगे मर्यादा

अपने विचारों के समापन में वक्ता ने कहा कि जब जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को केवल बाजार और मुनाफे के नजरिये से देखा जाने लगता है, तब समाज के सामने अनेक गंभीर चुनौतियां खड़ी होती हैं। शिक्षा का उद्योग बनना, स्वास्थ्य सेवाओं का अत्यधिक व्यावसायीकरण और धार्मिक संस्थाओं का लाभ-केंद्रित स्वरूप सामाजिक सरोकारों को कमजोर कर सकता है।

उन्होंने कहा कि शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य, धर्म, प्रशासन, राजनीति और न्याय व्यवस्था तक हर क्षेत्र में जनहित तथा नैतिक जिम्मेदारी को सर्वोच्च स्थान मिलना चाहिए। इसके लिए सरकार, राजनीतिक दलों, प्रशासनिक इकाइयों, सामाजिक संगठनों, धार्मिक संस्थाओं और न्यायिक व्यवस्था से जुड़े सभी पक्षों को अपनी भूमिका समझनी होगी।

वक्ता ने कहा कि बाजार की भूमिका और सीमाएं तय करना तथा समाज को मूल्यहीनता की ओर बढ़ने से रोकना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। यदि लोकनायक जयप्रकाश नारायण जैसे महापुरुषों के त्याग, संघर्ष और बलिदान को सार्थक बनाए रखना है, तो उनके आदर्शों को स्मरण करने के साथ-साथ उन्हें अपने आचरण में भी उतारना होगा। लोकनायक की विरासत हमें यही संदेश देती है कि लोकतंत्र केवल एक शासन व्यवस्था नहीं, बल्कि नैतिकता, जवाबदेही, सामाजिक न्याय और जनहित के प्रति प्रतिबद्धता का नाम भी है।

Tags