बस का रंग नहीं, रूट मायने रखता है

मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा की असली सफलता इस बात से तय होगी कि बसें कितने गांवों और जरूरतमंद यात्रियों तक नियमित रूप से पहुंचती हैं
 
मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा की असली सफलता इस बात से तय होगी कि बसें कितने गांवों और जरूरतमंद यात्रियों तक नियमित रूप से पहुंचती हैं

पवन वर्मा, विनायक फीचर्स

आखिरकार लंबे इंतजार के बाद मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा के रूप में सार्वजनिक बस सेवा की शुरुआत हो गई है। 25 सितंबर को भोपाल में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने सेवा का शुभारंभ किया और शुरुआती चरण में 351 बसों को रवाना किया गया। करीब 21 वर्ष बाद प्रदेश में सार्वजनिक बस परिवहन को नए मॉडल के साथ फिर शुरू किया गया है।

सेवा शुरू होते ही चर्चा बसों के रंग, उनके मॉडल और उम्र को लेकर भी होने लगी है। लेकिन सार्वजनिक परिवहन की असली कहानी बस के रंग से नहीं, बल्कि उसके रूट और उपयोगिता से शुरू होती है। सवाल यह नहीं होना चाहिए कि बस बाहर से कैसी दिखती है, बल्कि यह होना चाहिए कि वह कहां से कहां तक जाती है, कितनी नियमित है और उससे किन लोगों को वास्तविक लाभ मिल रहा है।

निजी बस और सरकारी परिवहन की जरूरत में फर्क

निजी बस ऑपरेटर के लिए कोई रूट तभी व्यावहारिक होता है, जब पर्याप्त यात्री मिलें और किराये से डीजल, चालक, परिचालक, परमिट, रखरखाव और दूसरे खर्च निकालने के बाद कारोबार टिकाऊ रहे। सरकार के लिए सार्वजनिक परिवहन का पैमाना इससे कुछ अलग होता है।

किसी गांव को तहसील से जोड़ना, किसी छात्र को स्कूल-कॉलेज पहुंचाना, किसी मरीज को अस्पताल तक ले जाना या किसान को मंडी तक पहुंचने का साधन उपलब्ध कराना भी सार्वजनिक परिवहन की जिम्मेदारी का हिस्सा है। सामाजिक जीवन में भी बस का महत्व है—त्योहारों पर परिवार के सदस्यों का गांव पहुंचना, राखी पर बेटियों का मायके आना और जरूरी काम के लिए ग्रामीणों का कस्बों और शहरों तक पहुंचना इसी व्यवस्था से जुड़ा है।

इसलिए मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा को समझने का सबसे उपयोगी पैमाना यही होना चाहिए कि बस कहां चल रही है और किस जरूरत को पूरा कर रही है।

21 साल बाद लौटी सार्वजनिक बस सेवा

मध्य प्रदेश में राज्य सड़क परिवहन व्यवस्था के बंद होने के बाद लंबे समय तक यात्री परिवहन में निजी ऑपरेटरों की भूमिका प्रमुख रही। बड़े और व्यस्त रूटों पर निजी बसों की उपलब्धता बनी रही, लेकिन कम यात्री वाले क्षेत्रों में नियमित परिवहन की समस्या बनी रह सकती थी।

नई सेवा इसी अंतर को कम करने के प्रयास के रूप में देखी जा सकती है। सरकार के अनुसार, इसका उद्देश्य शहरों के साथ ग्रामीण क्षेत्रों की कनेक्टिविटी बढ़ाना और सार्वजनिक परिवहन को अधिक सुरक्षित, आधुनिक तथा सुविधाजनक बनाना है।

15 हजार बसों का लक्ष्य, लेकिन असली परीक्षा रूट की

सरकार ने आने वाले वर्षों में सार्वजनिक परिवहन का विस्तार करने का लक्ष्य रखा है। योजना के अनुसार वर्ष 2031 तक बसों की संख्या करीब 15 हजार तक पहुंचाने और लगभग 3,500 रूटों पर सेवा विस्तार की योजना है। साथ ही 75 प्रतिशत ग्राम पंचायतों तक बस सेवा पहुंचाने का लक्ष्य भी बताया गया है।

यह आंकड़ा बड़ा है, लेकिन 15 हजार बसों का बेड़ा तैयार करना और उन बसों को जरूरत वाले रूटों पर नियमित रूप से चलाना दो अलग बातें हैं। योजना की वास्तविक सफलता तब दिखाई देगी, जब महानगरों और बड़े शहरों से आगे बढ़कर सेवा छोटे कस्बों और उन ग्रामीण इलाकों तक पहुंचेगी जहां आज भी सार्वजनिक परिवहन सीमित है।

पुरानी बस का मतलब खराब बस नहीं

बस की उम्र और उसकी तकनीकी स्थिति को एक ही नजर से देखना उचित नहीं है। किसी वाहन की सुरक्षा का निर्धारण उसकी फिटनेस, रखरखाव और निर्धारित सुरक्षा मानकों के पालन से होता है। यात्रियों के लिए बस का रंग या बाहरी रूप उससे कम महत्वपूर्ण है जितना यह कि बस सुरक्षित हो, समय पर आए और अपने निर्धारित रूट पर नियमित चले।

नई सेवा में सुरक्षा और निगरानी के लिए GPS, CCTV और पैनिक बटन जैसी सुविधाओं का प्रावधान किया गया है। सरकारी योजना में ऑनलाइन टिकटिंग और वास्तविक समय में बसों की निगरानी जैसी व्यवस्थाओं पर भी जोर दिया गया है।

25 सितंबर के शुभारंभ कार्यक्रम में नितिन गडकरी ने वाहन फिटनेस को लेकर आरटीओ अधिकारियों पर टिप्पणी करते हुए गलत तरीके से फिटनेस पास करने के खिलाफ कड़ी चेतावनी दी। इस बयान का प्रशासनिक संदेश स्पष्ट है—सड़क पर उतरने वाली बस की सुरक्षा और फिटनेस से समझौता नहीं होना चाहिए।

तकनीक से बढ़ सकती है पारदर्शिता

पुरानी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था से मिली सीख यह भी है कि आज तकनीक के माध्यम से संचालन को पहले की तुलना में अधिक पारदर्शी बनाया जा सकता है। डिजिटल टिकटिंग से प्रत्येक यात्रा का रिकॉर्ड, यात्रियों की संख्या और राजस्व संबंधी आंकड़े उपलब्ध हो सकते हैं। GPS और रियल-टाइम मॉनिटरिंग से बसों के संचालन की निगरानी भी संभव है।

इसी डेटा के आधार पर यह तय किया जा सकता है कि कौन सा रूट अधिक यात्रियों की जरूरत पूरी कर रहा है, कहां अतिरिक्त बस की आवश्यकता है और कहां समय-सारणी में बदलाव किया जाना चाहिए।

सरकार के लिए यह जरूरी है कि सामाजिक जरूरत वाले रूटों को केवल तत्काल लाभ-हानि के आधार पर न देखा जाए। लेकिन साथ ही यात्रियों की संख्या, परिचालन लागत और राजस्व के आंकड़ों का इस्तेमाल व्यवस्था को अधिक कुशल बनाने के लिए भी किया जा सकता है।

जहां निजी बसें पर्याप्त हैं, वहां मॉडल अलग हो सकता है

जहां निजी ऑपरेटर पहले से अच्छी और पर्याप्त सेवा दे रहे हैं, वहां सरकारी बसों की भूमिका को उसी बाजार में सीधी प्रतिस्पर्धा तक सीमित करने के बजाय उन क्षेत्रों पर अधिक ध्यान दिया जा सकता है जहां परिवहन की कमी है।

जहां मांग कम है, वहां समय-सारणी की समीक्षा हो सकती है। जहां यात्रियों की संख्या बढ़ रही है, वहां सेवा का विस्तार किया जा सकता है। इस तरह सार्वजनिक परिवहन को आंकड़ों और वास्तविक जरूरतों के आधार पर अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।

आखिरी यात्री ही सफलता का असली पैमाना

किसी भी सरकारी परिवहन योजना की सफलता का सबसे महत्वपूर्ण पैमाना उसका आखिरी लाभार्थी होता है। मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा के मामले में वह ग्रामीण यात्री है जिसके पास अपना वाहन नहीं है और जो लंबे समय से अपने गांव में नियमित बस का इंतजार कर रहा है।

एक छात्र के लिए बस का मतलब स्कूल या कॉलेज तक पहुंचना है। बुजुर्ग के लिए अस्पताल तक जाना। किसान के लिए मंडी तक पहुंचना। किसी परिवार के लिए जरूरी काम से शहर जाना। इसलिए सरकारी बस सेवा में भरोसा तभी बनेगा, जब यात्री को यह विश्वास हो कि जिस समय-सारणी के अनुसार बस घोषित की गई है, वह वास्तव में उस समय उपलब्ध होगी और निर्धारित रूट पर नियमित चलेगी।

बस का रंग समय के साथ बदला जा सकता है, उस पर लगा फ्लेक्स भी उतर सकता है। लेकिन किसी गांव तक पहुंचने वाली नियमित बस वहां के लोगों के जीवन में वास्तविक बदलाव ला सकती है। इसलिए मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा की पहचान बस के रंग से नहीं, उसके रूट, नियमितता, सुरक्षा और उपयोगिता से होनी चाहिए।

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