इतिहास के आईने में ‘जन गण मन’ और ‘वंदे मातरम्’

‘Jana Gana Mana’ and ‘Vande Mataram’ in the Mirror of History
 
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डॉ. रविशंकर कुमार चौधरी | विनायक फीचर्स

अभिनेता मुकेश खन्ना के हालिया बयान के बाद एक बार फिर भारत के राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत को लेकर पुरानी बहस चर्चा में आ गई है। उन्होंने कहा कि भारत का राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के स्थान पर ‘वंदे मातरम्’ होना चाहिए। उनके अनुसार ‘जन गण मन’ ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम के सम्मान में लिखा गया था, जबकि ‘वंदे मातरम्’ भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष और राष्ट्रभक्ति का अधिक प्रामाणिक प्रतीक है।

बयान सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर इसके समर्थन और विरोध में प्रतिक्रियाएं आने लगीं। हालांकि भावनात्मक बहस से अलग यदि इस विषय को इतिहास के दस्तावेजों, घटनाओं और संबंधित व्यक्तियों के वक्तव्यों के आधार पर देखा जाए तो तस्वीर कहीं अधिक जटिल दिखाई देती है।

1911 में शुरू हुआ विवाद

इस विवाद की प्रमुख कड़ी वर्ष 1911 से जुड़ी है। दिसंबर 1911 में ब्रिटेन के सम्राट जॉर्ज पंचम भारत आए थे। इसी दौरान कलकत्ता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। 27 दिसंबर 1911 को वहां रवींद्रनाथ टैगोर की रचना ‘भारोतो भाग्य बिधाता’ का सार्वजनिक गायन हुआ। आगे चलकर इसी रचना का पहला अंतरा भारत के राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के रूप में स्वीकार किया गया।

जॉर्ज पंचम की भारत यात्रा और इस गीत के सार्वजनिक गायन का समय लगभग एक ही होने के कारण उस दौर में कुछ समाचार माध्यमों ने यह धारणा प्रस्तुत की कि यह गीत ब्रिटिश सम्राट के स्वागत के लिए लिखा गया था। यही धारणा बाद में ‘जन गण मन’ को लेकर विवाद का प्रमुख आधार बन गई।

लेकिन किसी गीत के सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत किए जाने और किसी राजनीतिक घटना के एक ही समय पर होने को उसके कारण का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता। इस विवाद को समझने के लिए स्वयं रवींद्रनाथ टैगोर के स्पष्टीकरणों पर ध्यान देना जरूरी है।

टैगोर ने आरोपों पर क्या कहा?

टैगोर ने 1937 में अपने मित्र पुलिन बिहारी सेन को लिखे पत्र में इस आरोप का स्पष्ट खंडन किया था कि उन्होंने ब्रिटिश सम्राट की प्रशंसा में ‘जन गण मन’ लिखा था। उन्होंने ऐसी धारणा पर असहमति जताई और स्पष्ट किया कि उनकी रचना का ‘भाग्य विधाता’ किसी ब्रिटिश शासक को संबोधित नहीं करता।

1939 में भी टैगोर ने इस विषय पर अपना पक्ष स्पष्ट किया। उन्होंने इस बात पर असंतोष व्यक्त किया कि कोई उन्हें ब्रिटिश सम्राट की प्रशंसा में गीत लिखने वाला कवि समझ सकता है।

इसलिए ‘जन गण मन’ को जॉर्ज पंचम की स्तुति के रूप में प्रस्तुत करने से पहले टैगोर के इन स्पष्ट स्पष्टीकरणों को भी ऐतिहासिक संदर्भ में रखना आवश्यक है।

‘वंदे मातरम्’ का गौरवशाली इतिहास

इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि ‘वंदे मातरम्’ का स्वतंत्रता आंदोलन में महत्व कम था। वास्तव में यह भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन के सबसे प्रभावशाली गीतों और प्रतीकों में से एक रहा है।

बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने ‘वंदे मातरम्’ की रचना की थी और बाद में इसे अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया। 1905 के बंग-भंग विरोधी आंदोलन के दौरान यह गीत राष्ट्रीय स्वाभिमान और ब्रिटिश शासन के विरोध का शक्तिशाली घोष बन गया। राजनीतिक सभाओं, राष्ट्रवादी आंदोलनों और स्वतंत्रता सेनानियों के बीच इसकी व्यापक लोकप्रियता रही।

हालांकि गीत के बाद के अंतरों में भारतभूमि को दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसे देवी स्वरूपों के प्रतीकों से जोड़ा गया है। इसी कारण मुस्लिम समुदाय के एक वर्ग ने इसके कुछ अंशों पर आपत्ति जताई। कांग्रेस के भीतर भी इस बात पर विचार हुआ कि राष्ट्रीय कार्यक्रमों के लिए ऐसा गीत या प्रतीक अपनाया जाए, जिसे विभिन्न धार्मिक समुदाय व्यापक रूप से स्वीकार कर सकें।

यहीं से ‘वंदे मातरम्’ और ‘जन गण मन’ को लेकर बहस केवल साहित्य और संगीत की पसंद का प्रश्न नहीं रही, बल्कि वह भारत की बहुधार्मिक एवं बहुसांस्कृतिक सामाजिक संरचना से भी जुड़ गई।

स्वतंत्रता आंदोलन में दोनों की अलग-अलग भूमिका

1937 के प्रांतीय चुनावों के बाद कई प्रांतों में कांग्रेस की सरकारें बनीं। सरकारी और सार्वजनिक कार्यक्रमों में किस गीत को प्रमुखता दी जाए, यह सवाल भी सामने आया। ‘वंदे मातरम्’ के ऐतिहासिक योगदान को नकारना संभव नहीं था, लेकिन इसके कुछ अंशों को लेकर उठी आपत्तियों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था।

दूसरी ओर ‘जन गण मन’ को अपेक्षाकृत अधिक सर्वसमावेशी राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में देखा गया। इसलिए दोनों गीतों के बीच चयन का सवाल उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों, सामाजिक विविधता और स्वतंत्र भारत के लिए साझा राष्ट्रीय प्रतीक की तलाश से भी जुड़ा था।

संविधान सभा ने दिया दोनों को सम्मान

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद राष्ट्रगान का प्रश्न संविधान सभा के सामने भी आया। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि ‘जन गण मन’ भारत का राष्ट्रगान होगा। साथ ही ‘वंदे मातरम्’ को स्वतंत्रता आंदोलन में उसके ऐतिहासिक योगदान और राष्ट्रीय महत्व के कारण सम्मानित स्थान देने की बात कही गई।

इस प्रकार स्वतंत्र भारत ने किसी एक गीत को इतिहास से बाहर नहीं किया। ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान और ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत के रूप में सम्मान मिला। दोनों की अपनी ऐतिहासिक भूमिका और भावनात्मक महत्ता है।

टैगोर और ब्रिटिश सत्ता का संबंध

‘जन गण मन’ को लेकर विवाद समझते समय रवींद्रनाथ टैगोर के पूरे राजनीतिक और नैतिक जीवन को देखना भी जरूरी है। 1919 के जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद टैगोर ने ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रदान की गई ‘नाइटहुड’ की उपाधि वापस कर दी थी।

वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड को लिखे अपने पत्र में उन्होंने इस त्रासदी के बाद ब्रिटिश सरकार से मिले सम्मान को धारण करने की नैतिक असंगति व्यक्त की थी। यह घटना बताती है कि टैगोर औपनिवेशिक सत्ता के अंध समर्थक नहीं थे।

इसलिए ‘जन गण मन’ की रचना को केवल 1911 की परिस्थितियों से जोड़कर देखना और टैगोर के व्यापक राजनीतिक एवं नैतिक दृष्टिकोण को नजरअंदाज करना इतिहास की जटिलता को अत्यधिक सरल बना देगा।

टैगोर का राष्ट्रवाद संकीर्ण राजनीतिक राष्ट्रवाद तक सीमित नहीं था। वे भारतीय राष्ट्रीय चेतना को मानवतावाद, स्वतंत्र चिंतन और सांस्कृतिक विविधता से जोड़कर देखते थे। महात्मा गांधी उन्हें ‘गुरुदेव’ कहते थे। साहित्य के क्षेत्र में उनकी विश्वव्यापी प्रतिष्ठा रही और ‘गीतांजलि’ के लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला।

नेताजी और टैगोर के संबंध

रवींद्रनाथ टैगोर और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के संबंध भी इस बहस के संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं। सुभाष चंद्र बोस टैगोर के व्यक्तित्व और विचारों से प्रभावित थे। 1939 में कांग्रेस अध्यक्ष पद से उनके इस्तीफे और राजनीतिक संघर्ष के दौर में टैगोर ने उन्हें ‘देशनायक’ कहकर संबोधित किया था।

टैगोर के निधन के बाद नेताजी ने उन्हें राष्ट्र की महान विभूतियों में शामिल करते हुए श्रद्धांजलि दी। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन के एक अत्यंत संघर्षशील नेता के लिए भी टैगोर भारतीय राष्ट्रीय चेतना के महत्वपूर्ण प्रतिनिधि थे।

आजाद हिंद फौज से जुड़ा ‘शुभ सुख चैन’ भी इस संदर्भ में उल्लेखनीय है। इसकी धुन रवींद्रनाथ टैगोर की ‘भारोतो भाग्य बिधाता’ से प्रेरित थी। यह तथ्य कम से कम इतना संकेत जरूर देता है कि टैगोर की रचना को भारतीय राष्ट्रवादी परंपरा में केवल औपनिवेशिक सत्ता की प्रशंसा के प्रतीक के रूप में नहीं देखा गया था।

बहस हो, लेकिन इतिहास के साथ

राष्ट्रगान को लेकर बहस लोकतंत्र में अस्वाभाविक नहीं है। किसी नागरिक को यह विचार रखने का अधिकार है कि किसी अन्य गीत को राष्ट्रगान के रूप में अधिक उपयुक्त माना जाना चाहिए। राष्ट्रीय प्रतीकों पर विमर्श भी लोकतांत्रिक समाज का हिस्सा है।

लेकिन विचार और ऐतिहासिक तथ्य अलग-अलग चीजें हैं।

यदि यह दावा किया जाता है कि ‘जन गण मन’ जॉर्ज पंचम की स्तुति में लिखा गया था, तो उसके समर्थन में ठोस ऐतिहासिक प्रमाण भी प्रस्तुत किए जाने चाहिए। केवल इतना तथ्य कि जॉर्ज पंचम की भारत यात्रा और गीत का सार्वजनिक गायन लगभग एक ही समय में हुआ था, अपने आप में लेखक की मंशा का निर्णायक प्रमाण नहीं बन जाता।

इसी तरह ‘वंदे मातरम्’ के ऐतिहासिक महत्व को कम करके देखना भी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के साथ न्याय नहीं होगा। वह स्वतंत्रता संघर्ष की राष्ट्रीय चेतना का शक्तिशाली प्रतीक रहा है।

दोनों गीत भारतीय इतिहास के अलग-अलग लेकिन महत्वपूर्ण अध्यायों का प्रतिनिधित्व करते हैं। एक ओर ‘वंदे मातरम्’ स्वतंत्रता संघर्ष की उग्र राष्ट्रवादी चेतना की स्मृति से जुड़ा है, तो दूसरी ओर ‘जन गण मन’ स्वतंत्र भारत के संवैधानिक राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में स्थापित है।

राष्ट्रगान किसी देश के लिए केवल संगीत या शब्दों का संयोजन नहीं होता। वह सामूहिक स्मृति, पहचान और राष्ट्रीय अनुभव का प्रतीक होता है। इसलिए ‘जन गण मन’ और ‘वंदे मातरम्’ पर बहस होनी चाहिए, लेकिन ऐसी बहस इतिहास के प्रमाणों, दस्तावेजों और व्यापक संदर्भों के आधार पर होनी चाहिए—राजनीतिक आरोपों और भावनात्मक धारणाओं के आधार पर नहीं।

(डॉ. रविशंकर कुमार चौधरी | विनायक फीचर्स)

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