जनजाति गौरव दिवस: संस्कृति, परंपरा और आस्था की रक्षा करने वाले महान बलिदानियों को नमन
(निखिलेश महेश्वरी – विभूति फीचर्स)
भारत का सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय आंदोलन सदियों लंबी प्रेरणादायी यात्रा रहा है। इस यात्रा में हर क्षेत्र, जाति और आयु वर्ग के लोगों ने “राष्ट्र प्रथम” की भावना के साथ अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्वतंत्रता और स्वाभिमान की इस लड़ाई में भारत की जनजातियाँ भी सदैव अग्रणी रहीं। उन्होंने हर युग में अपने साहस, पराक्रम और अदम्य बलिदान से मातृभूमि की रक्षा की मिसालें कायम कीं।
वीरता की अनगिनत गाथाएँ
प्राचीन काल से लेकर मुग़ल शासन और फिर अंग्रेज़ी राज तक, आदिवासी समुदायों ने अपने अस्तित्व, संस्कृति और स्वतंत्रता के लिए अटूट संघर्ष किया।
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हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा प्रताप के साथ पुंजा भील के नेतृत्व में हजारों भील योद्धाओं ने अद्वितीय शौर्य दिखाया।
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रानी दुर्गावती ने अपने राज्य और सम्मान की रक्षा के लिए मुग़लों से लड़ते हुए वीरगति पाई।
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रानी कमलापति ने अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए प्राण तक न्योछावर कर दिए।
ब्रिटिश काल में भी यह संघर्ष और अधिक प्रखर हो उठा—
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मणिपुर की रानी माँ गाईडिल्यु ने मात्र 13 वर्ष की आयु में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह छेड़ा।
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भीमा नायक, खाज्या नायक, रघुनाथ सिंह भिलाला और सीताराम कँवर ने मध्यभारत में स्वतंत्रता की ज्योति जलाए रखी।
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टंट्या भील, जिन्हें अंग्रेज “भारतीय रॉबिन हुड” कहते थे, ने गरीबों की रक्षा और अन्याय के खिलाफ संघर्ष करते हुए बलिदान दिया।
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गोंड राजा शंकरशाह और रघुनाथ शाह को अंग्रेजों ने तोप से बाँधकर उड़ाया, लेकिन वे अमर हो गए।
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पूर्वी भारत के वीर तिलका माँझी ने गुरिल्ला युद्ध छेड़ा और फाँसी का सामना करते हुए भी अंग्रेजों के आगे झुके नहीं।
बिरसा मुंडा: संस्कृति, स्वाभिमान और धर्मरक्षा के प्रतीक
झारखंड की धरती ने बिरसा मुंडा जैसा महान नायक दिया, जिसने अंग्रेज़ी सत्ता, धर्मांतरण और शोषण के खिलाफ जनजातीय समाज को एकजुट किया।
उनके नेतृत्व ने समाज में नया आत्मविश्वास जगाया। यही कारण है कि वे “धरती आबा” और “बिरसा भगवान” के रूप में आज भी पूजे जाते हैं।
उनका जीवन आज भी वंचित, शोषित और आदिवासी समाज के लिए प्रेरणा और प्रकाशस्तंभ है।
जनजातीय इतिहास को संजोने का संकल्प
आज के युवा इन महान व्यक्तित्वों से अनजान होते जा रहे हैं। यह चिंता का विषय है।
इसी कमी को दूर करने और जनजातीय समुदाय के योगदान को सम्मान देने के लिए भारत सरकार ने 15 नवंबर—बिरसा मुंडा की जयंती—को जनजाति गौरव दिवस घोषित किया है।
यह दिन केवल बिरसा मुंडा को नहीं, बल्कि उन सभी ज्ञात-अज्ञात वीरों को श्रद्धांजलि देने का अवसर है, जिन्होंने राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया।
बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती: नया संकल्प
वर्ष 2025 बिरसा मुंडा के जन्म का 150वाँ वर्ष है। यह अवसर हमें याद दिलाता है कि हमें इन प्रेरक हस्तियों की गाथाओं को पुनः जन-जन तक पहुँचाना चाहिए।
इन वीरों की स्मृति ही हमारी सच्ची श्रद्धांजलि
आज आवश्यकता है कि—
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हम जनजातीय बलिदानियों के आदर्शों को आत्मसात करें,
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उनके संघर्षों से प्रेरणा लें,
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और आने वाली पीढ़ियों को इस गौरवशाली इतिहास से परिचित कराएँ।
जब भारत की युवा शक्ति इन महान क्रांतिवीरों की गाथाओं से प्रेरणा लेगी, तभी “विकसित भारत – समर्थ भारत” के संकल्प को वास्तविकता मिल सकेगी।
(लेखक: विद्या भारती मध्य भारत प्रांत के प्रांत संगठन मंत्री)

