जीरा वितरण अभियान

Cumin Distribution Campaign
 
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(विवेक रंजन श्रीवास्तव — विभूति फीचर्स)

कहावत है—ऊंट के मुंह में जीरा। न इससे ऊंट का पेट भरता है और न जीरे की कोई खास प्रतिष्ठा बढ़ती है। लेकिन हमारे देश में यह कहावत अब सिर्फ कहावत नहीं रही, बल्कि व्यवस्था की एक स्थायी कार्यप्रणाली बन गई है। जहां बड़ी जरूरत हो, वहां छोटा-सा प्रतीकात्मक समाधान रख दीजिए और फिर घोषणा कर दीजिए कि बहुत बड़ा काम कर दिया गया। ऊंट भी मुस्कुराकर जीरा चबाता रहता है और भूखे रहने की आदत डाल लेता है।

सरकार समय-समय पर महंगाई से राहत की घोषणा करती है। कर्मचारी पूछता है—“कितनी राहत?” जवाब मिलता है—इतनी कि अखबार की सुर्खी बन जाए, मगर महीने के बजट में कोई खास अंतर न पड़े। राहत मिलती जरूर है, लेकिन जेब को उसका पता तक नहीं चलता। यही तो असली जीरा वितरण है।

साहित्य की दुनिया भी इससे अछूती नहीं है। कोई लेखक वर्षों तक लिखता है, पांडुलिपियां लेकर प्रकाशकों के चक्कर काटता है और जोड़-तोड़ के बाद जब पुरस्कार की घोषणा होती है तो भावुक हो जाता है। रकम देखकर खुशी से नहीं, बल्कि यह सोचकर कि पुरस्कार लेने के लिए आने-जाने का खर्च शायद पुरस्कार राशि से ज्यादा हो जाए। ऊपर से विशाल शॉल, स्मृति-चिह्न और फूलों का गुलदस्ता। शॉल इतना बड़ा कि लेखक उसमें पूरा समा जाए और लिफाफा इतना हल्का कि हवा के झोंके से उड़ जाए।

फिर आयोजक बड़े विश्वास से कहते हैं—“सम्मान का कोई मूल्य नहीं होता।”

लेखक मन ही मन सोचता है—“बिल्कुल सही, इसलिए शायद इसका भुगतान भी नहीं होता।”

आजकल संस्थाओं ने भी जीरा वितरण को बाकायदा अभियान का रूप दे दिया है। पांच सौ रुपये का मानदेय देकर पत्र लिखा जाता है—“आपके अमूल्य सहयोग के लिए धन्यवाद।”

अब सवाल यह है कि अगर सहयोग सचमुच अमूल्य था तो उसका मूल्य पांच सौ रुपये कैसे तय हो गया? लगता है महंगाई के दौर में शब्दकोश भी अपने शब्दों का अर्थ बदलने पर मजबूर हो गया है।

कुछ साहित्यप्रेमी आयोजक तो मानदेय को ही ‘पत्रं-पुष्पं’ घोषित कर अपनी प्रतिष्ठा बचा लेते हैं। कोई उसे सुदामा के चावल का नाम दे देता है तो कोई इसे साहित्य सेवा का प्रसाद बताकर पेश करता है। भाव इतना बड़ा कि मानदेय छोटा दिखाई देने लगे—यही प्रबंधन कला है।

डिजिटल युग ने जीरा वितरण को और सुविधाजनक बना दिया है। घंटों वेबिनार चलता है। दर्जनों स्लाइड दिखाई जाती हैं। वक्ता बोलते-बोलते थक जाते हैं और श्रोता सुनते-सुनते। अंत में आयोजक धन्यवाद देते हैं और एक ई-प्रमाणपत्र भेज देते हैं।

प्रमाणपत्र डाउनलोड करने में जितनी बिजली खर्च हो जाए, उससे ज्यादा संतोष आयोजक को इस बात का होता है कि ज्ञान का प्रसार सफलतापूर्वक संपन्न हो गया।

शिक्षा के क्षेत्र में भी ऊंटों की कमी नहीं है। बच्चों से कहा जाता है—“बड़े सपने देखो, आगे बढ़ो।”

बच्चा पुस्तक मांगता है तो स्कूल की लाइब्रेरी में किताबें दिखाई जाती हैं। किताबें मिलती हैं, लेकिन उन पर चार ताले लगे होते हैं। खेल के लिए मैदान चाहिए तो पता चलता है कि मैदान पार्किंग बन चुका है। सुविधाओं के नाम पर घोषणा भर है। यानी सपनों का ऊंट दौड़ना चाहता है और व्यवस्था उसे जीरा चबाने का अभ्यास करा रही है।

महंगाई तो इस अभियान की सबसे अनुभवी विशेषज्ञ है। वेतन में दो प्रतिशत वृद्धि होती है और खर्च बीस प्रतिशत बढ़ जाता है। फिर अर्थशास्त्र की भाषा में बताया जाता है कि आपकी आय बढ़ी है।

बिल्कुल बढ़ी है—कैलकुलेटर पर।

जेब में झांकिए तो वही पुराना ऊंट बैठा जुगाली करता मिलेगा।

सोशल मीडिया ने जीरा वितरण को लोकतांत्रिक बना दिया है। किसी ने एक पौधा लगाया तो सौ तस्वीरें खिंच गईं। दो किताबें दान कीं तो पचास पोस्ट आ गईं। किसी अस्पताल में कुछ फल बांट दिए तो अगले दिन अखबार में तस्वीर के साथ सामाजिक सेवा का पूरा अध्याय प्रकाशित हो गया।

काम कितना हुआ—जीरे जितना।

प्रचार कितना हुआ—ऊंट जितना।

हम स्वयं भी इस व्यवस्था के छोटे-बड़े हिस्सेदार हैं। रिश्तों के लिए समय नहीं है, लेकिन इमोजी की कोई कमी नहीं। पड़ोसी की कुशल-क्षेम पूछने का समय नहीं, मगर ‘टेक केयर’ का संदेश तुरंत पहुंच जाता है। संवेदनाएं भी अब इंस्टेंट जीरे की छोटी-छोटी पुड़िया बन गई हैं।

व्हाट्सऐप पर ज्ञान का फॉरवर्ड हम बिजली की गति से कर देते हैं, लेकिन उसे अपने जीवन में लागू करने की गति कछुए से भी धीमी रहती है।

असल समस्या जीरे की नहीं है। समस्या यह है कि ऊंट की भूख कितनी है, यह जानने की कोशिश कोई नहीं करता। जरूरत बहुत बड़ी हो और समाधान केवल प्रतीकात्मक हो, तो व्यंग्य अपने आप पैदा होता है।

समाज को रोटी चाहिए, हम उसे फीता काटकर आश्वासन परोस देते हैं। लेखक को सम्मान के साथ उसके श्रम का उचित मूल्य चाहिए, हम उसे स्मृति-चिह्न पकड़ा देते हैं। नागरिक को सुविधाएं चाहिए, हम उसे नई योजना की घोषणा थमा देते हैं।

अब तो लगता है कि इस पुरानी कहावत का नया संस्करण लिखने का समय आ गया है—

“ऊंट अब जीरा नहीं मांगता। उसे इतना अनुभव हो गया है कि वह पहले लिफाफे का वजन तौलता है।”

और हमारे समय का सबसे बड़ा व्यंग्य शायद यही है कि जीरा बांटने वाले स्वयं को अन्नदाता समझने लगे हैं।

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