ज्येष्ठ-आषाढ़ संधिकाल: वाणी-विनायक वंदना और सामाजिक न्याय की काव्यात्मक पुकार

The Jyeshtha-Ashadha Transition: Invocation of Vani-Vinayak and a Poetic Call for Social Justice
 
ज्येष्ठ-आषाढ़ संधिकाल: वाणी-विनायक वंदना और सामाजिक न्याय की काव्यात्मक पुकार

सनातन संस्कृति में आषाढ़ (जून) मास की पावन चतुर्थ तिथि 'गणेश जयंती' के रूप में विघ्नहर्ता विनायक को समर्पित है। इस मंगलकारी अवसर पर प्रात: स्मरणीय गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज द्वारा रचित 'श्रीरामचरितमानस' का वह अमर मंगलाचरण स्वतः ही स्मरण हो जाता है, जहाँ उन्होंने अपनी लेखनी का प्रारंभ वाणी और बुद्धि के प्रदाताओं की स्तुति से किया था:

वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मंगलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥

इसी दिव्य चेतना को आत्मसात करते हुए, मन ही मन प्रथम पूज्य गणेश जी को नमन कर, माँ जगज्जननी वाग्देवी सरस्वती के पावन चरणों में एक कवि के अंतर्मन से उपजे दो विशेष छंद यहाँ प्रस्तुत हैं। यह काव्य पाठ न केवल प्रज्ञा की याचना है, बल्कि समसामयिक व्यवस्था पर एक गंभीर विमर्श भी है।

प्रथम छंद: प्रज्ञा-चक्षु का जागरण और लोक-कल्याण की कामना

इस छंद में कवि माँ शारदे से बुद्धि, विवेक और पीड़ित मानवता की सेवा के लिए आत्मिक शक्ति की याचना कर रहा है।

हे अक्षरा! अमृतमयी शब्दों को जन्म देने वाली माँ सरस्वती, अपनी दिव्य वीणा के तारों को एक बार फिर झंकृत कर दो। हमारे बुद्धि-विवेक के कपाट खोलकर ज्ञान-विज्ञान के द्वार प्रशस्त करो, मेरे कंठ को सुरों से समृद्ध कर इस जीवन को सार्थकता प्रदान करो।

वेदों और शास्त्रों के उस असीम प्रकाशमय मार्ग का विस्तार, मेरी आंतरिक प्रज्ञा के माध्यम से इस हृदय में स्थापित कर दो। समाज के जो लोग दीन-हीन, दुखी और पूरी तरह निराश्रित हैं, उनके कल्याण और उद्धार के लिए मुझे असीम शक्ति का वरदान दो।

द्वितीय छंद: संसदीय चेतना और योग्यता की रक्षा हेतु गुहार

यह छंद वर्तमान सामाजिक ताने-बाने, राजनीति और व्यवस्था में योग्यता (Merit) की उपेक्षा पर कवि के उद्वेलन और प्रखर व्यंग्य को दर्शाता है।

हे माँ शारदे! हमारे लोकतंत्र के मंदिर (संसद) की चेतना को पवित्र करो, यदि ऐसा न हुआ, तो योग्य लोग अपने न्यूनतम अधिकारों से भी वंचित रह जाएंगे। झूठी शान और अयोग्यता का मुखौटा पहने लोग केवल सत्ताओं की लालसा में, इस गौरवशाली राष्ट्र को अंधकार के गहरे गर्त की ओर धकेल देंगे।

जहाँ नब्बे प्रतिशत अंक लाने वाले मेधावी की जगह नौ अंक वाले को स्थान मिले, वहाँ ऐसा प्रतीत होता है कि पूरी व्यवस्था ही दिशाहीन और तर्कहीन हो चुकी है। आज प्रतिभाओं का स्वर्णिम इतिहास रसातल की ओर जा रहा है, और शीर्ष पर रहने योग्य मेधावी आज हाशिए पर बैठकर मौन रहने को विवश हैं।

वेबसाइट के लिए विशेष संपादकीय टिप्पणी (Editorial Note):

कवि का दृष्टिकोण: यह कविता समाज में 'योग्यता और न्याय' के बीच संतुलन की आवश्यकता को रेखांकित करती है। आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णों (Garib Savarna) के प्रति संवेदनशीलता और मेधावी युवाओं के भविष्य को लेकर कवि की चिंता यह दर्शाती है कि जब तक देश की नीतियां प्रतिभा और न्याय को समान धरातल पर नहीं रखेंगी, तब तक राष्ट्र निर्माण अधूरा रहेगा। माँ वाग्देवी से प्रार्थना है कि वे हमारी संसद और नीति-निर्माताओं को वह 'सदबुद्धि' दें जिससे हर वर्ग के पीड़ित को सच्चा न्याय मिल सके।

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