कर्मयोगी मुख्यमंत्री: डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में गीता के संदेश और सादगी का संगम
लेखक: अंजनी सक्सेना
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन...” — श्रीमद्भगवद्गीता का यह कालजयी श्लोक कर्म को ही अधिकार मानने और फल की आसक्ति से दूर रहने का मार्ग दिखाता है। जब कोई जननायक इस दर्शन को अपने आचरण में ढाल लेता है, तो सत्ता केवल शासन का माध्यम नहीं, बल्कि सेवा का अनुष्ठान बन जाती है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का व्यक्तित्व इसी 'कर्मयोगी' छवि का प्रतिबिंब है।
उज्जैन की सांस्कृतिक विरासत और संस्कार
डॉ. मोहन यादव की जड़ें उस उज्जैन नगरी में हैं, जहाँ स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने गुरु सांदीपनि से शिक्षा ग्रहण की थी। धर्म, दर्शन और काल-गणना के केंद्र उज्जैन के सांस्कृतिक परिवेश ने उनके भीतर अनुशासन और सामाजिक उत्तरदायित्व के बीज बोए। एक साधारण परिवार में जन्मे डॉ. यादव ने बचपन से ही श्रम और सादगी के महत्व को समझा। माता-पिता से मिले ईमानदारी के संस्कार और फिर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से प्राप्त संगठनात्मक प्रशिक्षण ने उनके व्यक्तित्व को राष्ट्र के प्रति समर्पित बनाया।
पद को 'अधिकार' नहीं, 'दायित्व' समझना
मुख्यमंत्री बनने के बाद डॉ. मोहन यादव ने कई ऐसे उदाहरण पेश किए, जो लोकतांत्रिक मर्यादाओं की गहरी समझ को दर्शाते हैं:
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सादगीपूर्ण निवास: मुख्यमंत्री निवास को लेकर उनका दृष्टिकोण अनूठा है। वे पद की गरिमा को व्यक्ति से ऊपर रखते हैं और सरकारी सुविधाओं के सीमित उपयोग पर जोर देते हैं।
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जनता से सीधा जुड़ाव: प्रोटोकॉल की परवाह किए बिना सड़क किनारे रुककर भुट्टा खाना या चाय की दुकान पर सामान्य नागरिक से हाल-चाल पूछना उनके सहज स्वभाव का हिस्सा है। यही सरलता उन्हें 'जनता का मुख्यमंत्री' बनाती है।
पारिवारिक आयोजनों में सादगी का संदेश
आज के दौर में जहाँ विवाह समारोह प्रदर्शन का माध्यम बन गए हैं, डॉ. यादव ने अपने दोनों बेटों के विवाह बेहद सादगी से संपन्न कराकर समाज को एक बड़ा संदेश दिया। उनके छोटे बेटे का विवाह एक सामूहिक 'विवाह सम्मेलन' के माध्यम से संपन्न होना यह दर्शाता है कि संस्कार की पवित्रता भव्यता में नहीं, बल्कि मर्यादा और संयम में निहित है।
"नेतृत्व केवल नीतियों के निर्माण से नहीं, व्यक्तिगत आचरण से स्थापित होता है।"
मूल्य आधारित राजनीति की नई दिशा
डॉ. मोहन यादव का जीवन यह प्रेरणा देता है कि सार्वजनिक जीवन में शुचिता और पारदर्शिता केवल भाषणों से नहीं, बल्कि व्यवहार से आती है। पद को अस्थायी और सेवा को स्थायी मानना ही उनके राजनीतिक जीवन का मूल मंत्र है। उज्जैन की आध्यात्मिक थाती और आधुनिक प्रशासनिक सूझ-बूझ के समन्वय से वे प्रदेश को एक नई दिशा दे रहे हैं।
डॉ. मोहन यादव का कार्यकाल यह सिद्ध कर रहा है कि सत्ता के शिखर पर रहकर भी एक व्यक्ति अपनी जड़ों और संस्कारों से जुड़ा रह सकता है। गीता के 'निष्काम कर्म' के सिद्धांत को धरातल पर उतारते हुए वे न केवल राज्य का संचालन कर रहे हैं, बल्कि समाज के सामने एक आदर्श नेतृत्व की छवि भी प्रस्तुत कर रहे हैं।
