केदारनाथ धाम: आस्था के केंद्र में 'रील संस्कृति' और अति-पर्यटन का खतरा; क्या पिकनिक स्पॉट बनता जा रहा है बाबा का दर?

Kedarnath Dham: The threat of 'Reel culture' and over-tourism at this center of faith; is the abode of Baba turning into a picnic spot?
 
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समुद्र तल से हजारों फीट की ऊंचाई पर एक तरफ बर्फ की सफेद चादर से ढकी चोटियां और दूसरी ओर सीना ताने खड़े विशाल काले पहाड़। इनके बीच से मंदाकिनी नदी के पवित्र उद्गम के पास नागिन की तरह बलखाती पगडंडियों पर जब एक आम श्रद्धालु कदम आगे बढ़ाता है, तो वह दृश्य अलौकिक होता है। यह पावन भूमि है भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक—श्री केदारनाथ धाम की।

लेकिन, हाल के वर्षों में केदारनाथ की इस पावन और दुर्गम यात्रा का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। आज यह यात्रा अपनी सनातन मर्यादा और आध्यात्मिक गहराई खोकर आधुनिक 'सोशल मीडिया रील संस्कृति' की भेंट चढ़ती नजर आ रही है।

तीर्थाटन बनाम पर्यटन: क्या भूल गए हम अंतर?

आज से ढाई-तीन दशक पहले तक हिंदू जनमानस में बद्री-केदार की यात्रा को जीवन की अंतिम और सर्वोच्च साधना माना जाता था। गृहस्थ जीवन के सारे कर्तव्यों को पूरा करने के बाद बुजुर्ग इस विश्वास के साथ पहाड़ों का रुख करते थे कि यदि इस कठिन मार्ग पर मृत्यु भी हो जाए, तो सीधे मोक्ष की प्राप्ति होगी। पूरा गांव उन्हें अश्रुपूर्ण नेत्रों से विदा करता था और लौटकर आने पर प्रसाद की कामना करता था। तब यात्रा के मूल में 'श्रद्धा, विश्वास और आत्म-संयम' था।

इसके विपरीत, आज केदारनाथ की यात्रा महज 'घुमक्कड़ी' (Vlogging) और सोशल मीडिया पर लाइक्स-कमेंट्स बटोरने का जरिया बनकर रह गई है। तीर्थयात्रियों को यह समझना होगा कि केदारनाथ कोई पिकनिक स्पॉट, हॉलीडे डेस्टिनेशन या एडवेंचर पार्क नहीं है, जहां ढोल-नगाड़ों के साथ पहुंचकर मंदिर परिसर में नृत्य किया जाए, अमर्यादित शॉर्ट वीडियो बनाए जाएं या आतिशबाजी की जाए। यह करोड़ों हिंदुओं की अटूट आस्था का केंद्र है, जहां साधक अखंड शांति के लिए ध्यान लगाते हैं।

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शोरशराबा: सांस्कृतिक और पर्यावरणीय अतिक्रमण

पवित्र धाम में होने वाला अत्यधिक शोरशराबा न केवल सनातन परंपराओं पर आघात है, बल्कि यह ध्वनि प्रदूषण पर्यावरण के लिहाज से भी बेहद खतरनाक है। केदारनाथ धाम 'केदारनाथ कस्तूरी मृग अभयारण्य' (Wild Life Sanctuary) के बेहद करीब स्थित है। यहाँ होने वाली अनियंत्रित मानवीय गतिविधियां और शोर वहां के शांत पारिस्थितिक तंत्र को बुरी तरह प्रभावित कर रहे हैं।

मई-जून की भारी भीड़ बनाम सितंबर-अक्टूबर का सुकून

हर साल कपाट खुलते ही मई और जून के महीनों में केदारनाथ में पैर रखने तक की जगह नहीं बचती। यात्रियों के बीच जाने क्यों यह रूढ़िवादी धारणा बैठ गई है कि पहाड़ों की यात्रा केवल गर्मियों में ही संभव है। इसके चलते सारा दबाव दो महीनों में सिमट जाता है, जिससे स्थानीय प्रशासन और व्यवस्थाएं चरमरा जाती हैं।

पहाड़ के स्थानीय निवासियों की विशेष सलाह:

यदि आप वास्तव में बाबा केदार के शांत और दिव्य स्वरूप का दर्शन करना चाहते हैं, तो अपनी यात्रा को सितंबर और अक्टूबर के महीनों तक टाल दें। आम धारणा के उलट, इन महीनों में मौसम बेहद साफ रहता है, अत्यधिक ठंड नहीं होती और सबसे बड़ी बात—यह समय कम खर्चीला, अत्यधिक सुविधाजनक और असीम मानसिक सुकून देने वाला होता है।

क्या हम भूल गए केदारनाथ का असल महात्म्य?

जो लोग मंदिर के सामने कैमरे चमकाकर नाचने-गाने में व्यस्त हैं, शायद उन्हें केदारनाथ के पौराणिक महत्व का भान ही नहीं है। स्कंद पुराण और शिव पुराण में इसे 'केदारेश्वर' कहा गया है। मान्यता है कि महाभारत के युद्ध के बाद जब पांडव गोत्र-वध के पाप से मुक्ति के लिए भगवान शिव की खोज में यहां पहुंचे, तो महादेव ने अंतर्ध्यान होने के लिए महिष (भैंसे) का रूप धारण किया था।

जब पांडवों ने उन्हें पहचानकर पकड़ना चाहा, तो भगवान का महिष रूप पांच भागों में विखंडित हो गया। यह भाग जहां-जहां गिरे, उन्हें 'पंच केदार' कहा गया। केदारनाथ में महिष का पृष्ठ (पीठ का) भाग प्रकट हुआ था, इसीलिए आज भी यहाँ गर्भगृह में किसी पारंपरिक शिवलिंग के बजाय एक त्रिकोणीय टेढ़ी प्राकृतिक चट्टान की पूजा बाबा के स्वरूप में की जाती है।

2013 की आपदा से सबक लेना जरूरी

उच्च हिमालयी क्षेत्र में स्थित केदारनाथ भूकंपीय और भूगर्भीय दृष्टि से बेहद संवेदनशील (Sensitive) क्षेत्र है। हमें साल 2013 की उस भीषण आपदा को कभी नहीं भूलना चाहिए, जिसने मुख्य मंदिर को छोड़कर पूरे परिसर, आदि शंकराचार्य के समाधि स्थल और आसपास के छोटे मंदिरों को मलबे में दफन कर दिया था। प्रकृति समय-समय पर हमें चेतावनी देती है।

इस पावन धाम की गरिमा, पर्यावरण और मर्यादा को अक्षुण्ण रखने के लिए अब समय आ गया है कि सरकार और स्थानीय प्रशासन 'अति-पर्यटन' को रोकने के लिए कड़े नियम बनाएं। प्रतिदिन दर्शन करने वाले पर्यटकों की संख्या को कड़ाई से सीमित किया जाना चाहिए। हालांकि, सरकार से ज्यादा जिम्मेदारी उन श्रद्धालुओं की है जो वहां पहुंचते हैं। याद रखिए, केदारनाथ मौज-मस्ती की जगह नहीं, अंतरात्मा को शुद्ध करने का तपोवन है।

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