आज भी प्रासंगिक है लाल बहादुर शास्त्री की सादगी और ईमानदारी
Mon, 29 Sep 2025
लाल बहादुर शास्त्री का नाम भारतीय राजनीति में सादगी, ईमानदारी और आदर्श नेतृत्व के प्रतीक के रूप में लिया जाता है। सार्वजनिक जीवन में जहाँ आज ईमानदारी ढूँढना कठिन होता जा रहा है, वहीं शास्त्री जी का चरित्र हमारे लिए अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करता है।
निजी जीवन में सिद्धांतों का पालन
शास्त्री जी का निजी जीवन उनके आदर्शों का प्रतिबिंब था। वे व्यक्तिगत और सार्वजनिक दोनों ही स्तरों पर ईमानदारी को सर्वोच्च मानते थे। स्वतंत्रता संग्राम के समय जेल में रहते हुए उनकी पत्नी ललिता देवी दो आम छिपाकर उनसे मिलने आईं। नियम का उल्लंघन देखकर शास्त्री जी इतने आहत हुए कि उन्होंने स्वयं अपनी पत्नी के खिलाफ विरोध दर्ज कराया। उनका मानना था कि कानून सबके लिए समान है।
इसी तरह, जब उनकी बेटी के निधन की सूचना पैरोल पर घर आने से पहले मिली, तब भी वे निर्धारित समय से पहले ही स्वयं जेल लौट गए।
विवाह और दहेज प्रथा के खिलाफ उदाहरण
अपने विवाह में शास्त्री जी ने दहेज के रूप में केवल एक चरखा और हाथ से बुना कपड़ा स्वीकार किया। यह उस समय की प्रचलित सामाजिक परंपरा को चुनौती देने वाला साहसिक कदम था।
प्रधानमंत्री पद पर भी सादगी
प्रधानमंत्री बनने के बाद भी शास्त्री जी ने कभी सरकारी संसाधनों का निजी इस्तेमाल नहीं किया। परिवार के आग्रह पर जब उन्होंने कार खरीदने का निश्चय किया, तो उसके लिए पंजाब नेशनल बैंक से पाँच हज़ार रुपये का कर्ज लिया। दुर्भाग्य से उनके जीवनकाल में वह कर्ज चुक नहीं सका। बाद में उनकी पत्नी ने सरकार द्वारा कर्ज माफ़ करने का प्रस्ताव ठुकरा दिया और अपनी पेंशन से धीरे-धीरे राशि चुकाई।
निष्पक्षता और पारदर्शिता
ईमानदारी के मामले में वे अपने परिवार पर भी किसी प्रकार की रियायत नहीं देते थे। बेटे की अनुचित पदोन्नति रद्द करना हो या निजी काम के लिए इस्तेमाल की गई सरकारी कार का खर्च अपने जेब से भरना, हर मौके पर उन्होंने निष्पक्षता का परिचय दिया।
नारा जिसने बदली तस्वीर
1965 के भारत-पाक युद्ध और भयंकर सूखे के समय उन्होंने देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए 'जय जवान, जय किसान' का नारा दिया। इससे सैनिकों और किसानों का मनोबल बढ़ा और देश हरित क्रांति तथा श्वेत क्रांति की ओर आगे बढ़ा। दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए उन्होंने राष्ट्रीय डेयरी विकास संस्थान की स्थापना की, जिससे 'अमूल' जैसी सहकारी समितियाँ फली-फूलीं।
जीवनशैली की मिसाल
खाद्य संकट के दौरान उन्होंने देशवासियों से सप्ताह में एक दिन एक वक्त भोजन छोड़ने की अपील की। इसका पालन उन्होंने अपने घर से ही शुरू किया, जहाँ बच्चों तक को शाम को केवल फल और दूध दिया जाने लगा।
सादगी उनके व्यवहार में भी झलकती थी। एक बार कलकत्ता में जाम के कारण एयरपोर्ट पहुँचने में देर हो रही थी, तो अधिकारियों ने सायरन लगी कार भेजने का सुझाव दिया। शास्त्री जी ने मुस्कुराते हुए कहा—“मैं कोई बड़ा आदमी नहीं हूँ।”
दुकान पर साड़ी खरीदते समय जब दुकानदार ने मुफ्त में कीमती साड़ी देने की कोशिश की, तो उन्होंने इसे अस्वीकार कर सबसे सस्ती साड़ियाँ खरीदीं और पूरा मूल्य चुकाकर चले गए।

