लंकापति दशानन की व्यथा: हर साल जलता हूं, फिर भी बुराइयों का अंत कहां?

विजयदशमी पर रावण के पुतले का दहन और समाज में कायम बुराइयों पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी

 
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लेखक: सुधाकर आशावादी | विनायक फीचर्स

लंकापति रावण विचारमग्न हैं। वे उस पल को कोस रहे हैं, जब उनसे एक स्त्री के अपहरण का अपराध हुआ था। रास्ते में पक्षीराज जटायु से भिड़ंत के बाद भी उनका विवेक नहीं जागा। सदियां बीत गईं, लेकिन वे मानते हैं कि उस अपराध की सजा आज तक भुगत रहे हैं। उनके मन में सवाल है—एक अपहरण की इतनी बड़ी सजा आखिर कब तक?

रावण सोचते हैं कि किसी अपराधी को मृत्युदंड दिया जाता है तो वह एक बार ही दिया जाता है। उसके लिए अपराध के आधार पर सुनवाई होती है, बचाव का अवसर मिलता है और अपील की प्रक्रिया पूरी होने के बाद सजा दी जाती है। सजा पूरी होने के बाद मामला समाप्त हो जाता है। लेकिन उनके साथ तो कुछ अलग ही हो रहा है।

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एक बार मरा रावण, हर साल क्यों जलाया जाता है?

रावण के अनुसार, एक समय उनका वध हुआ था। राम और रावण के बीच हुए युद्ध को सत्य और असत्य के संघर्ष के रूप में प्रस्तुत किया गया। दोनों ओर से सेनाएं लड़ीं, योद्धाओं ने प्राण गंवाए और अंततः राम की विजय हुई। युद्ध समाप्त हो गया, लेकिन रावण की मृत्यु का सिलसिला मानो आज तक जारी है।

गांव-गांव और शहर-शहर रामलीला का मंचन होता है। राम-रावण युद्ध दिखाया जाता है, रावण की नाभि में तीर मारकर उसका वध किया जाता है और फिर उसके विशाल पुतले को आग के हवाले कर दिया जाता है। भीड़ तालियां बजाती है, पुतला धू-धू कर जलता है और लोग उत्सव मनाकर अपने घर लौट जाते हैं।

हर साल यही दृश्य दोहराया जाता है। रावण के मन में सवाल है कि जब उसका वध एक बार हो चुका है, तो हर वर्ष उसके पुतले को जलाने का औचित्य क्या है? क्या यह केवल एक परंपरा निभाने की रस्म बनकर रह गई है?

विजयदशमी पर हलवाई की दुकान में मुलाकात

विजयदशमी की सुबह रावण महोदय मुझे हलवाई की दुकान पर मिल गए। वे नाश्ते का आनंद ले रहे थे। जलेबी-कचौड़ी उन्हें प्रिय है, इसलिए दोने में कचौड़ी और दम-आलू की सब्जी का स्वाद ले रहे थे।

मैंने पूछा, “कैसे हैं?”

वे बोले, “ठीक हूं। अपने अमर होने का कष्ट भोग रहा हूं।”

मैंने हैरानी से पूछा, “आप तो युद्ध में मृत्यु को प्राप्त हो गए थे, फिर अमर कैसे हो गए?”

रावण ने जवाब दिया, “भले ही राम के तीरों से छलनी होकर मेरी देह समाप्त हो गई हो, लेकिन मुझे किसी ने चैन से मरने भी नहीं दिया। संसार की नजर में मैं आज भी जीवित हूं। अगर ऐसा नहीं होता, तो विजयदशमी पर हर साल मेरा वध क्यों किया जाता?”

रावण की तर्कशक्ति देखकर मैं हैरान रह गया। सवाल वाजिब था—जब रावण का वध हो चुका है, तो बार-बार उसकी देह का दहन करने की जरूरत क्यों पड़ती है?

बुराई का प्रतीक हूं, तो बाकी बुराइयों का क्या?

मैंने रावण से कहा, “रावण जी, आपकी बात में दम है। आपने एक स्त्री का हरण किया था और उसके लिए आपको दंड भी मिला। लेकिन सदियां बीत जाने के बाद भी हर साल आपका दहन किया जाता है। यह तो नाइंसाफी हुई।”

रावण बोले, “तुमने मेरा दर्द समझा, मेरे लिए यही बहुत है। आजकल भीड़तंत्र में इंसाफ की बात कौन करता है? अपहरण के अपराध में सजा कुछ वर्षों की भी हो सकती है। मैंने तो किसी तरह का दुराचार भी नहीं किया। जिसे लेकर आया था, उसे सुरक्षा के पहरे में रखा। फिर भी मुझे ऐसी सजा मिली कि लोग मेरी मृत्यु का भी उत्सव मनाते हैं।”

मैंने समझाने की कोशिश की, “रावण जी, यह संचार क्रांति का युग है। आपको बुराई का प्रतीक मानकर आपका पुतला जलाया जाता है। यह बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश है।”

मेरी बात सुनकर रावण ने तुरंत सवाल दागा, “अगर मैं बुराई का प्रतीक हूं, तो पुरुषों को अपमानित करने वाली स्त्रियों का क्या होगा? उन स्त्रियों को किस श्रेणी में रखोगे, जो पुरुषों की हत्या कर उनके शव नीले ड्रम में छिपा देती हैं? और उन लोगों को क्या कहोगे, जो स्त्रियों की हत्या कर उनके शरीर के टुकड़े फ्रिज में रख देते हैं?”

पुतले जलते हैं, लेकिन बुराइयां कायम रहती हैं

रावण के सवाल सुनकर मैं चुप हो गया। उसके तर्क का मेरे पास कोई संतोषजनक उत्तर नहीं था। हर साल रावण का पुतला जलाकर हम बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव मनाते हैं, लेकिन समाज में मौजूद अपराध, हिंसा, छल और अन्याय पर अंकुश लगाने के लिए क्या उतनी ही गंभीरता दिखाई जाती है?

रावण-दहन की परंपरा का संदेश तभी सार्थक हो सकता है, जब हम अपने भीतर मौजूद बुराइयों को पहचानने और उन्हें समाप्त करने का प्रयास भी करें। केवल पुतला जलाने से समाज की बुराइयां समाप्त नहीं होतीं। इसके लिए जरूरी है कि इंसान अपने व्यवहार, सोच और आचरण में भी बदलाव लाए।

रावण की व्यथा का व्यंग्य यही है कि हर साल उसका पुतला तो जल जाता है, लेकिन जिन बुराइयों के अंत का संदेश दिया जाता है, वे किसी न किसी रूप में समाज में बनी रहती हैं। शायद असली विजयदशमी तभी होगी, जब प्रतीकात्मक रावण के साथ-साथ मनुष्य अपने भीतर के अहंकार, अन्याय और हिंसा पर भी विजय प्राप्त करेगा।

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