नेता मंच पर, कार्यकर्ता पंचनामे में… और लोकतंत्र फिर भी जिंदाबाद!
(पवन वर्मा – विनायक फीचर्स)
विधानसभा के बजट सत्र के बीच प्रदेश की व्यापारिक राजधानी और राजनीतिक राजधानी में एक ही दिन लोकतंत्र का एक और “जोशीला अध्याय” लिखा गया। सुबह तक जो माहौल नारेबाज़ी और विरोध प्रदर्शन का था, वह देखते ही देखते धक्का-मुक्की, पथराव और पुलिस कार्रवाई में बदल गया। विचारधारा की बहस कुछ ही पलों में अस्पताल की पर्ची और थाने की एफआईआर तक पहुंच गई।
लोकतंत्र की यह विडंबना देखिए—पहले जोश से भरे नारे, फिर उग्रता, उसके बाद पत्थर, और अंत में मुकदमे। जो कार्यकर्ता सुबह तक पार्टी के “योद्धा” कहलाते थे, शाम तक मेडिकल रिपोर्ट और जमानत के इंतज़ाम में जुटे दिखाई दिए। यह भागीदारी का एक नया व्यावहारिक मॉडल है—पहले उत्साह दिखाइए, फिर परिणाम भुगतिए। भोपाल में पार्टी कार्यालय के बाहर और इंदौर में जो हालात बने, वे किसी फिल्मी दृश्य से कम नहीं थे। फर्क सिर्फ इतना था कि यहां “कट” कहने वाला कोई निर्देशक नहीं था। कैमरे जरूर मौजूद थे, और कैमरों की मौजूदगी अक्सर भावनाओं की तीव्रता बढ़ा देती है।

कार्यकर्ताओं को संदेश मिला कि लोकतंत्र संकट में है, आवाज़ उठानी है, दफ्तर का घेराव करना है। उन्होंने आवाज़ इतनी बुलंद की कि पत्थर भी हवा में तैरने लगे। सामने वाले भी पीछे नहीं रहे—उन्हें भी लगा कि जवाब देना जरूरी है। नतीजा यह हुआ कि दोनों पक्षों ने अपने-अपने तरीके से लोकतंत्र की “रक्षा” कर ली।अब दृश्य बदल चुका है। अस्पतालों के बाहर पट्टियों से लिपटे समर्थक हैं, सोशल मीडिया पर तीखे बयान हैं, और थाने में दर्ज मुकदमे। पुलिस ने संतुलन साधते हुए दोनों पक्षों के खिलाफ कार्रवाई की—कानून सबके लिए समान है। जिसने भी सीमा लांघी, उसे न्यायिक प्रक्रिया का सामना करना होगा।
उधर नेता अपने-अपने मंच से बयान दे रहे हैं। एक पक्ष शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर हमले का आरोप लगा रहा है, तो दूसरा सुनियोजित साजिश की बात कर रहा है। अब शब्दों के पत्थर उछाले जा रहे हैं—बस माध्यम बदल गया है।इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा बोझ किस पर पड़ा? उस जमीनी कार्यकर्ता पर, जो बैनर लगाता है, भीड़ जुटाता है, घर-घर जाकर समर्थन मांगता है। जोश में उसने अपनी निष्ठा दिखाई, और अब अदालत की तारीखें उसकी नई दिनचर्या का हिस्सा बन गई हैं। उसे भरोसा दिलाया जा रहा है—“पार्टी आपके साथ है।” और वह समझता है कि यह साथ बयान और प्रेस कॉन्फ्रेंस तक सीमित भी हो सकता है।
लोकतांत्रिक सहभागिता का यह पाठ बड़ा व्यावहारिक है। नारे लगाना आसान है, लेकिन उसके परिणामों को सहना कठिन। पत्थर कुछ क्षण में जमीन पर गिर जाता है, पर मुकदमे वर्षों तक चलते हैं। हर पेशी पर कार्यकर्ता को याद आता है कि उसने किस विचार के नाम पर उग्रता दिखाई थी—विचार धुंधला पड़ सकता है, पर केस नंबर नहीं।सबसे मार्मिक दृश्य तब होता है जब अस्पताल के गलियारे में विरोधी दलों के घायल कार्यकर्ता आमने-सामने पड़ जाते हैं—एक के सिर पर पट्टी, दूसरे के हाथ में प्लास्टर। दोनों की आंखों में एक ही सवाल तैरता है—“आखिर हासिल क्या हुआ?”
राजनीति में आक्रोश जताना सहज है, पर उसका दुष्परिणाम झेलना कठिन। लोकतंत्र में असहमति का अधिकार है, लेकिन संयम की जिम्मेदारी भी उतनी ही जरूरी है।इसलिए अगली बार जब लोकतंत्र की रक्षा के लिए निकलें, तो जोश के साथ विवेक भी साथ रखें। नारा बुलंद हो, पर संवाद का रास्ता खुला रहे। क्योंकि अंततः लोकतंत्र पत्थरों से नहीं, संवाद और संवैधानिक प्रक्रिया से मजबूत होता है। और विडंबना यही है—नेता मंच पर रहते हैं, कार्यकर्ता पंचनामे में दर्ज हो जाते हैं… फिर भी हम पूरे उत्साह से कहते हैं—लोकतंत्र जिंदाबाद!
