करूर हादसे से सबक : भीड़ नियंत्रण के लिए ठोस रणनीति जरूरी

 
करूर हादसे से सबक : भीड़ नियंत्रण के लिए ठोस रणनीति जरूरी
भारत जैसे विशाल देश में भीड़ प्रबंधन की समस्या कोई नई नहीं है। कुंभ के मेले से लेकर धार्मिक स्थलों, राजनीतिक सभाओं, खेल आयोजनों और फिल्मी सितारों के कार्यक्रमों तक, आए दिन भगदड़ की घटनाएँ सुनने को मिलती रहती हैं। दुर्भाग्य से हर बार सबसे ज्यादा नुकसान आम जनता को ही झेलना पड़ता है। सवाल यह है कि इतने हादसों के बावजूद अब तक कोई ठोस राष्ट्रीय रणनीति क्यों नहीं बनी?

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करूर हादसा और बढ़ता आंकड़ा

तमिलनाडु के करूर में अभिनेता और राजनेता विजय की रैली के दौरान भगदड़ में 40 लोगों की मौत हो गई और करीब 100 लोग घायल हुए। मृतकों में महिलाएँ और बच्चे भी शामिल थे। राज्य सरकार और केंद्र ने मुआवजे की घोषणा की है, लेकिन यह सवाल फिर खड़ा हो गया है कि आखिर कब तक केवल मुआवजे और जांच कमेटियों तक ही सीमित रहा जाएगा?
टीवीके पार्टी ने इस हादसे के पीछे राजनीतिक साज़िश का आरोप लगाते हुए विशेष जांच दल या सीबीआई जांच की मांग की है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर भीड़ नियंत्रण पर गंभीर बहस छेड़ दी है।

हादसों की लंबी फेहरिस्त

साल 2025 को अब तक भगदड़ की घटनाओं का साल कहा जा रहा है। जनवरी में तिरुमाला मंदिर में छह श्रद्धालुओं की मौत, महाकुंभ में 30 लोगों की जान, दिल्ली रेलवे स्टेशन पर 18 मौतें और आईपीएल 2025 की विजय परेड में 11 लोगों की मौत – ये सभी घटनाएँ दर्शाती हैं कि भीड़ प्रबंधन की कमी कितनी घातक हो सकती है।
पिछले दो दशकों में देशभर में करीब 1500 लोग भगदड़ की वजह से अपनी जान गंवा चुके हैं। हाथरस (2024) की घटना जिसमें 121 लोग मारे गए, या फिर 2005 के महाराष्ट्र के मंधारदेवी मंदिर की भगदड़ जिसमें 340 से अधिक श्रद्धालु कुचलकर मारे गए थे – ये सभी घटनाएँ सबक लेने के लिए काफी हैं।

भीड़ नियंत्रण क्यों जरूरी?

हर आयोजन चाहे धार्मिक हो या राजनीतिक, आयोजकों और प्रशासन की साझा जिम्मेदारी बनती है कि भीड़ को व्यवस्थित करने के लिए पर्याप्त सुरक्षा इंतज़ाम हों। लेकिन अक्सर लापरवाही, अपर्याप्त संसाधन और जवाबदेही की कमी से ये हादसे हो जाते हैं।
भीड़ नियंत्रण केवल सुरक्षा बलों की तैनाती तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि—
प्रवेश और निकास द्वारों की वैज्ञानिक योजना
भीड़ का वास्तविक समय में मॉनिटरिंग
भीड़ सीमा (crowd capacity) का सख्त पालन
आयोजकों की जवाबदेही तय करना
— जैसी व्यवस्थाएँ अनिवार्य की जानी चाहिए।

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