नेपाल और फ्रांस से सबक: सत्ता को जनता से जुड़ना होगा

Lessons from Nepal and France: Power must connect with the people
 
नेपाल और फ्रांस से सबक: सत्ता को जनता से जुड़ना होगा

(मनोज कुमार अग्रवाल – विनायक फीचर्स)

पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक राजनीति में एक जैसी प्रवृत्ति देखने को मिल रही है। जिन देशों में जनता अपनी सरकार से असंतुष्ट हुई है, वहां लोग सड़कों पर उतर आए हैं और कई बार यह आंदोलन इतना उग्र हो गया कि सरकारों को सत्ता छोड़नी पड़ी। श्रीलंका और बांग्लादेश के बाद अब नेपाल और फ्रांस में भी जनता का गुस्सा सत्ताधारियों की नींव हिला रहा है। दोनों देशों का भूगोल और संस्कृति अलग है, लेकिन संदेश एक ही है—जनता खासकर युवाशक्ति अब उपेक्षा बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है।

नेपाल: सोशल मीडिया से शुरू हुआ आंदोलन, सरकार गिरी

नेपाल में जेन जेड पीढ़ी ने सोशल मीडिया बैन का विरोध करते हुए आंदोलन की शुरुआत की, लेकिन यह केवल चिंगारी थी। असली कारण दशकों से जमा गुस्सा, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और नेताओं का अवसरवाद था। देखते-देखते आंदोलन ने हिंसक रूप ले लिया। संसद, सुप्रीम कोर्ट, मंत्रियों के आवास और मीडिया हाउस तक भीड़ के निशाने पर आ गए।

70 से अधिक युवाओं की मौत और बढ़ते जनाक्रोश के बीच प्रधानमंत्री के.पी. ओली समेत कई मंत्रियों को इस्तीफा देना पड़ा। विडंबना यह है कि पिछले 17 सालों में नेपाल में 14 सरकारें बदल चुकी हैं। स्थायित्व और विकास के अभाव ने युवाओं में निराशा को और गहरा किया।

2008 में राजशाही खत्म होने के बाद जनता ने लोकतंत्र से उम्मीदें लगाई थीं, लेकिन भ्रष्टाचार और महंगाई ने इन उम्मीदों को तोड़ दिया। यही कारण है कि अब नेपाल में राजशाही की वापसी की मांग जोर पकड़ रही है। हजारों लोग सड़कों पर ‘राजा वापस आओ’ के नारे लगा रहे हैं और पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह एक बार फिर सुर्खियों में हैं।

विश्व बैंक के अनुसार नेपाल दक्षिण एशिया का दूसरा सबसे गरीब देश है। 2024 में यहां की प्रति व्यक्ति आय सिर्फ 1,381 डॉलर थी, जो भारत की तुलना में आधी से भी कम है। सेना की दखल और सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज सुशीला कार्की को अंतरिम प्रधानमंत्री बनाए जाने के बाद हालात संभलते दिख रहे हैं।

फ्रांस: ‘ब्लॉक एवरीथिंग’ आंदोलन से सरकार हिली

नेपाल की तरह फ्रांस भी इन दिनों जनाक्रोश की गिरफ्त में है। ‘ब्लॉक एवरीथिंग’ नाम से चल रहे आंदोलन ने राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की चिंता बढ़ा दी है। शुरुआत सोशल मीडिया और एन्क्रिप्टेड चैट्स से हुई थी, लेकिन अब यह देशभर में हिंसक प्रदर्शनों का रूप ले चुका है।

लोग बजट कटौती, बढ़ती असमानता और सरकार की नीतियों के खिलाफ सड़कों पर हैं। पेरिस से लेकर छोटे शहरों तक जगह-जगह जाम, आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाएं हो रही हैं। शुरुआती घंटों में ही 200 से अधिक प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया गया। ट्रेनों की सेवाएं बाधित हुईं, बसों को आग के हवाले कर दिया गया। यह सब दिखाता है कि फ्रांस में असमानताओं के खिलाफ गुस्सा अब विस्फोटक रूप ले चुका है।

दोनों देशों से सबक

नेपाल और फ्रांस की परिस्थितियां भले ही अलग हों, लेकिन सीख एक ही है—जब जनता को लगता है कि सरकार उसकी समस्याओं और आकांक्षाओं की अनदेखी कर रही है, तब गुस्सा सड़कों पर फूट पड़ता है। इस आक्रोश का केंद्र युवा हैं, जो न केवल भविष्य की नींव हैं बल्कि वर्तमान की सबसे बड़ी चुनौती भी।

अगर सरकारें समय रहते जनता की भावनाओं को समझने में विफल रहीं तो यह असंतोष सत्ता के लिए घातक साबित हो सकता है। श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल और फ्रांस के हालात यही चेतावनी दे रहे हैं कि सत्ता को अहंकार त्यागकर जनता से जुड़ना ही होगा।

Tags