हादसे होने दो जेन-जी, पर तुम नाराज मत होना
विवेकानंद-विनायक फीचर्स दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में छात्रों से जुड़े एक हॉस्टल की पांच मंजिला इमारत ढहने से कई परिवारों के सपने मलबे में दब गए। शुरुआती रिपोर्टों में पांच मौतों की बात सामने आई, बाद में मृतकों की संख्या बढ़कर सात हो गई। हादसे के बाद राहत-बचाव, जांच, एफआईआर और प्रशासनिक कार्रवाई का वही सिलसिला शुरू हुआ, जो देश में लगभग हर बड़े हादसे के बाद देखने को मिलता है। सवाल यह है कि हर हादसे के बाद कार्रवाई तो होती है, लेकिन क्या अगला हादसा रोकने के लिए व्यवस्था वास्तव में बदलती है?
हादसा, कार्रवाई और फिर वही पुरानी कहानी
हर बड़े हादसे के बाद सरकारें सक्रिय दिखाई देती हैं। जांच के आदेश होते हैं, जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की बात होती है, मुआवजे की घोषणा होती है और कुछ दिनों तक प्रशासनिक मशीनरी पूरी ताकत से काम करती नजर आती है। लेकिन समय बीतते ही सब कुछ सामान्य हो जाता है।
दिल्ली के सत्य निकेतन हादसे ने एक बार फिर छात्र आवासों, पीजी और पुरानी इमारतों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। रिपोर्टों के मुताबिक हादसे वाली इमारत करीब पांच दशक पुरानी थी और उसमें निर्माण या मरम्मत का काम भी चल रहा था। हादसे के बाद भवन सुरक्षा और अवैध निर्माण को लेकर प्रशासन ने कदम उठाने शुरू किए।लेकिन सवाल केवल एक इमारत का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है जिसमें हादसा होने से पहले खतरे दिखाई नहीं देते और हादसा होने के बाद अचानक हर विभाग जाग जाता है।
क्या कार्रवाई का डर कभी पैदा होगा?
यह तर्क सही है कि हर हादसे के लिए सीधे सरकार को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन यह सवाल भी उतना ही जायज है कि जिन अधिकारियों या संस्थाओं को लापरवाही का जिम्मेदार माना जाता है, उनके खिलाफ ऐसी कार्रवाई कितनी बार होती है जो भविष्य के लिए मिसाल बने?
कई बार निलंबन, जांच या तबादले की कार्रवाई होती है। लेकिन क्या इससे व्यवस्था में स्थायी सुधार आता है? क्या लापरवाह तंत्र को यह डर रहता है कि उसकी गलती से किसी की जान गई तो उसे लंबे समय तक जवाबदेह रहना पड़ेगा?अगर जवाब नहीं है तो फिर हर हादसे के बाद होने वाली कार्रवाई केवल औपचारिकता बनकर रह जाती है।
हॉस्टल सिर्फ चार दीवारें नहीं हैं
दिल्ली का हादसा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देशभर में हजारों छात्र अपने घरों से दूर पीजी और हॉस्टलों में रहते हैं। वे अपने परिवारों की उम्मीद लेकर शहरों में पढ़ने आते हैं।लेकिन इन छात्रों के लिए सुरक्षित आवास की व्यवस्था अक्सर उनकी सबसे बड़ी चिंता बन जाती है।
कहीं साफ पानी की समस्या है, कहीं बिजली और गर्म पानी की, कहीं साफ-सफाई का अभाव है तो कहीं भोजन की गुणवत्ता सवालों के घेरे में रहती है। कई जगह छात्र सुविधाओं के लिए विरोध प्रदर्शन करते हैं। ऐसे मामलों में यह सवाल भी उठता है कि छात्रों की शिकायतों को उनकी सुरक्षा के सवाल के रूप में कब देखा जाएगा?दिल्ली की घटना के बाद सामने आई तस्वीर ने यह स्पष्ट कर दिया है कि छात्र आवासों की निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर पुनर्विचार की जरूरत है।
जेन-जी को भविष्य बताया जाता है, वर्तमान कौन सुधारेगा?
आज की राजनीति में जेन-जी को देश का भविष्य बताया जा रहा है।कहा जाता है कि यही युवा विकसित भारत का सपना पूरा करेंगे। यही युवा देश को नई ऊंचाइयों तक ले जाएंगे। लेकिन इस खूबसूरत भविष्य की बातों के बीच सवाल यह है कि उनके वर्तमान की समस्याओं पर कितनी गंभीरता से काम हो रहा है?
स्कूल बंद हों, परीक्षाओं में गड़बड़ी हो, पेपर लीक हों, परिणाम अटकें, डिग्री समय पर पूरी न हो, रोजगार के अवसर सीमित हों या छात्रों को सुरक्षित हॉस्टल तक न मिले—इन समस्याओं पर युवाओं की नाराजगी स्वाभाविक है।उन्हें यह जरूर कहा जाता है कि वे देश का भविष्य हैं, लेकिन क्या उन्हें अपने वर्तमान के सवाल पूछने का भी उतना ही अधिकार दिया जाता है?
राजनीति को नाराज युवा नहीं चाहिए?
आज छात्र राजनीति और युवा असंतोष दोनों ही राजनीतिक विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। अलग-अलग राजनीतिक दल अपने-अपने तरीके से युवाओं तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जेन-जी और युवाओं पर फोकस बढ़ा है। विपक्ष भी छात्रों और युवाओं से जुड़े सवालों को राजनीतिक मंचों पर उठा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या राजनीति वास्तव में युवाओं की समस्याओं का समाधान चाहती है या केवल उनकी नाराजगी को अपने पक्ष में इस्तेमाल करना चाहती है?
युवाओं को वोट बैंक की तरह देखना आसान है। उन्हें नागरिक के रूप में देखना मुश्किल।नागरिक के रूप में युवा सवाल पूछेगा—स्कूल क्यों बंद हुआ? परीक्षा का परिणाम क्यों रुका? पेपर लीक कैसे हुआ? नौकरी क्यों नहीं है? फीस क्यों बढ़ रही है? हॉस्टल सुरक्षित क्यों नहीं है? और शायद यही सवाल व्यवस्था को सबसे ज्यादा असहज करते हैं।
समाज की खामोशी भी एक सवाल है
सरकारों की जवाबदेही जरूरी है, लेकिन क्या केवल सरकार को दोष देकर समाज अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो सकता है?जब छात्र, किसान या आम नागरिक किसी बुनियादी सुविधा के लिए आवाज उठाते हैं तो क्या समाज का बड़ा हिस्सा उनके साथ खड़ा होता है?
केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की यूडाइस प्लस रिपोर्ट 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार देशभर में एक साल में हजारों सरकारी स्कूल बंद हुए या दूसरे स्कूलों में मर्ज किए गए। ऐसे मुद्दे केवल शिक्षा विभाग की फाइलों तक सीमित नहीं रहने चाहिए। ये समाज के भविष्य से जुड़े सवाल हैं। फिर भी कई बार शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और महंगाई जैसे सवालों से ज्यादा जोर पहचान और भावनात्मक मुद्दों पर दिखाई देता है।
सड़कें विकास की तस्वीर हैं या व्यवस्था का आईना?
कुछ दिन पहले जिन सड़कों को विकास का प्रतीक बताया जा रहा था, उन्हीं सड़कों पर आज गड्ढे हैं, कहीं पुल धंस रहे हैं, कहीं आवारा मवेशियों की समस्या है और कहीं यातायात नियमों की अनदेखी जानलेवा साबित हो रही है।सड़क हादसों में युवाओं की बड़ी संख्या में मौत होना केवल ट्रैफिक पुलिस की समस्या नहीं है। यह सड़क डिजाइन, वाहन सुरक्षा, गति नियंत्रण, कानून के पालन और नागरिक व्यवहार—सभी से जुड़ा सवाल है। अगर युवा देश का भविष्य हैं तो उनकी सड़क सुरक्षा भी राष्ट्रीय प्राथमिकता होनी चाहिए।
महंगाई, रोजगार और परीक्षा—इन सवालों का क्या?
जेन-जी के सामने सवाल केवल हॉस्टल का नहीं है। महंगाई, रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता, पेपर लीक, परिणाम में देरी, उच्च शिक्षा की बढ़ती लागत और डिग्री पूरी करने में लगने वाला समय—ये सभी उनके भविष्य से जुड़े मुद्दे हैं।
जब इन सवालों पर पर्याप्त सार्वजनिक दबाव नहीं बनता, तो राजनीति के लिए यह मान लेना आसान हो जाता है कि जनता दूसरे मुद्दों से अधिक प्रभावित होती है। यहीं से लोकतंत्र में नागरिक दबाव की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
धर्म और राजनीति के बीच बुनियादी सवाल कहां हैं?
धर्म किसी व्यक्ति की आस्था का विषय हो सकता है और राजनीति लोकतांत्रिक विचारों की प्रतिस्पर्धा। लेकिन जब शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सुरक्षा जैसे बुनियादी सवाल पीछे चले जाते हैं और पहचान आधारित मुद्दे केंद्र में आ जाते हैं, तब लोकतंत्र के सामने गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं।
राजनीतिक दल स्वाभाविक रूप से वही मुद्दे उठाते हैं जिनसे उन्हें जनसमर्थन मिलने की उम्मीद होती है। इसलिए केवल राजनीति को दोष देना पर्याप्त नहीं है। समाज को भी तय करना होगा कि वह किस तरह के सवालों को प्राथमिकता देता है।
सेना के सम्मान से लेकर समाज की एकता तक
देशभक्ति और सेना के सम्मान की बात करना जरूरी है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि किसी भी राजनीतिक दल या नेता के बयान पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।सेना के जवान और अधिकारी भी इसी समाज से आते हैं। इसलिए सेना का सम्मान तभी सार्थक है जब राजनीतिक सुविधा के अनुसार उसके सम्मान के मानदंड न बदलें।
इसी तरह धर्म के नाम पर किसी समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाना भी किसी स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान नहीं हो सकता।भारत की विविधता उसकी ताकत है। किसी भी समुदाय को निशाना बनाकर राजनीति करना अंततः समाज को ही कमजोर करता है।
सवाल यह नहीं कि राजनीति समाज को बांट रही है
अक्सर कहा जाता है कि राजनीति समाज को बांट रही है। लेकिन सवाल इससे भी गहरा है। अगर समाज बुनियादी मुद्दों पर एकजुट हो जाए तो किसी भी राजनीतिक दल के लिए उन्हें नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। अगर माता-पिता अपने बच्चों की शिक्षा के सवाल पर एक साथ खड़े हों, मरीज बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए एक साथ आवाज उठाएं, युवा रोजगार और परीक्षा व्यवस्था पर एकजुट हों और नागरिक सड़क, पानी, बिजली तथा सुरक्षा के सवाल पर राजनीतिक पहचान से ऊपर उठकर सवाल पूछें, तो सरकारों को जवाब देना ही पड़ेगा।
समाज की एकजुटता राजनीति को जवाबदेह बनाती है।
जेन-जी से नाराज मत होना, उनके सवाल सुनना
सरकारें वही करती हैं जिसे वे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण समझती हैं। राजनीतिक दल वही मुद्दे उठाते हैं जिनसे उन्हें जनसमर्थन की संभावना दिखाई देती है। इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि जेन-जी नाराज क्यों है।
असली सवाल यह है कि जेन-जी की नाराजगी के कारण क्या हैं? अगर कोई युवा सुरक्षित हॉस्टल चाहता है, बेहतर शिक्षा चाहता है, निष्पक्ष परीक्षा चाहता है, रोजगार चाहता है, महंगाई से राहत चाहता है और भ्रष्टाचार से मुक्त व्यवस्था चाहता है तो उसकी नाराजगी को समस्या नहीं, लोकतंत्र की आवाज समझा जाना चाहिए।
देश को ऐसे युवाओं की जरूरत है जो सवाल पूछें, असहमति जताएं और व्यवस्था को बेहतर बनाने की मांग करें।राजनीतिक समर्थन या विरोध अपनी जगह है, लेकिन देश और समाज की बेहतरी के लिए सही को सही और गलत को गलत कहना जरूरी है। सियासत के लिए शायद किसी की जरूरत से ज्यादा उसके सवाल मायने रखते हैं। लेकिन लोकतंत्र के लिए नागरिक की जरूरत और उसका सवाल—दोनों मायने रखते हैं। आज सरकारों की चिंता शायद इस बात की ज्यादा है कि जेन-जी नाराज न हो। जरूरत इस बात की है कि उसकी नाराजगी के कारणों को समझा जाए।और इस कसौटी पर समाज को भी खुद से पूछना होगा—हम कहां खड़े हैं?

