परवरिश की जंग में हार मानती ज़िंदगी

Life Surrendering in the Battle of Upbringing
 
बच्चों के पालन-पोषण की तस्वीर बदल दी

(मनोज कुमार अग्रवाल – विनायक फीचर्स)

आज के दौर में तेजी से बढ़ते एकल परिवारों ने बच्चों के पालन-पोषण की तस्वीर बदल दी है। छोटे परिवार, सीमित सदस्य और बड़ी अपेक्षाएं—इन सबके बीच कई अभिभावक अपने बच्चों से जरूरत से ज्यादा उम्मीदें पाल लेते हैं। बेहतर भविष्य की चाह में बचपन से ही अनुशासन के नाम पर कठोरता थोप दी जाती है, जो कई बार बच्चों के मन को गहराई से आहत कर देती है। इसका परिणाम यह होता है कि बच्चे मानसिक दबाव में आकर अपना स्वाभाविक विकास खो देते हैं। कुछ विद्रोही बन जाते हैं, तो कुछ भीतर ही भीतर टूटकर अवसाद का शिकार हो जाते हैं।

ऐसी ही एक दर्दनाक घटना कानपुर से सामने आई, जिसने पूरे समाज को झकझोर दिया। युवा अधिवक्ता प्रियांशु श्रीवास्तव ने कथित मानसिक प्रताड़ना से परेशान होकर अदालत की इमारत से छलांग लगाकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। इस कदम से पहले उन्होंने सोशल मीडिया पर एक सुसाइड नोट साझा किया, जिसमें बचपन से लेकर वर्तमान तक झेली गई पीड़ा का उल्लेख था।

प्रियांशु, जिन्होंने हाल ही में कानून की पढ़ाई पूरी कर वकालत शुरू की थी, अपने पिता के साथ ही पेशे में थे। लेकिन उनके अनुसार, बचपन से ही उन्हें कठोर व्यवहार, अपमान और मारपीट का सामना करना पड़ा। सुसाइड नोट में उन्होंने लिखा कि लगातार निगरानी, अपमान और दबाव ने उनके जीवन को असहनीय बना दिया था। छोटी-छोटी बातों पर सख्ती, सार्वजनिक रूप से अपमान और हर पल नियंत्रण ने उन्हें मानसिक रूप से तोड़ दिया।

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यह घटना केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि उस सोच पर सवाल खड़ा करती है, जिसमें बच्चों की सफलता के लिए उनकी भावनाओं की अनदेखी कर दी जाती है। अनुशासन जरूरी है, लेकिन जब वह संवेदनहीनता में बदल जाए, तो उसका परिणाम विनाशकारी हो सकता है।

आज के किशोर और युवा पहले से अधिक संवेदनशील हैं। उन्हें मार्गदर्शन की जरूरत है, न कि भय और अपमान की। माता-पिता का कर्तव्य केवल भविष्य गढ़ना नहीं, बल्कि बच्चों को भावनात्मक रूप से सुरक्षित वातावरण देना भी है। संवाद, समझ और सहानुभूति—यही स्वस्थ परवरिश के आधार हैं।

यह दुखद घटना उन सभी अभिभावकों के लिए चेतावनी है, जो अपने अधूरे सपनों को बच्चों पर थोपते हैं। सही परवरिश वह है, जहां अनुशासन और प्रेम के बीच संतुलन हो। वरना सफलता की दौड़ में हम कहीं अपने बच्चों की जिंदगी ही न हार बैठें।

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