शुद्ध-अशुद्ध के फेर में जिंदगी
सुधाकर आशावादी — विनायक फीचर्स
संसार में शायद ही कोई देहधारी पूरी तरह शुद्ध हो सकता है। जन्म के साथ ही मनुष्य शरीर, उसकी आवश्यकताओं और प्राकृतिक क्रियाओं के साथ जीवन की उस प्रक्रिया में प्रवेश करता है, जिसे हम शुद्ध-अशुद्ध के नजरिये से देखने लगते हैं।
अब सवाल उठता है कि देहधारी को अशुद्ध कैसे कहा जा सकता है?
जरा सुबह की दिनचर्या पर नजर डालिए। नींद से उठते ही शरीर अपनी प्राकृतिक स्थिति में होता है। पेट में मल जमा होता है, मुंह से दुर्गंध आ सकती है और शरीर में आलस्य भी मौजूद रहता है। लेकिन क्या इससे शरीर अशुद्ध हो गया? देह तो वही है, फिर अशुद्धता का यह बोध कहां से आया?
दरअसल, अशुद्धता का एहसास होते ही देहधारी अपनी दैनिक क्रियाओं की ओर बढ़ता है। मल त्याग करता है, हाथों को साबुन या राख से साफ करता है, स्नान करता है और फिर स्वयं को स्वच्छ महसूस करता है। जीवन को व्यवस्थित रखने के लिए ध्यान अथवा अन्य अनुशासन अपनाता है और इसके बाद स्वच्छ हाथों से भोजन कर अपनी भूख मिटाता है। यही तो सामान्य जीवन-प्रक्रिया है।
गंदगी स्थायी नहीं होती
लेकिन सवाल तब खड़ा होता है, जब कुछ लोग किसी व्यक्ति या उसके अनुयायियों की मौजूदगी को ही किसी स्थान के शुद्ध या अशुद्ध होने से जोड़ने लगते हैं। हाल में एक स्थान पर एक बड़े नेता का भाषण हुआ। उनके अनुयायियों की भीड़ जुटी और उसके बाद वहां मांस-मदिरा के सेवन से लेकर गाली-गलौज तक की बातें सामने आईं। स्वाभाविक है कि भीड़ जुटेगी तो कचरा भी फैलेगा और वातावरण प्रभावित होगा। ऐसे में सफाई होना कोई असामान्य घटना नहीं, बल्कि सामान्य नागरिक प्रक्रिया है।
गांव हो या शहर, स्वच्छता के लिए रोज प्रयास किए जाते हैं। सुबह कचरा उठाने वाली गाड़ियां गलियों और मोहल्लों से कूड़ा एकत्र करती हैं और स्वच्छता की व्यवस्था को बनाए रखने में अपनी भूमिका निभाती हैं। आखिर गंदगी का समर्थन करने का कोई तर्क हो भी तो क्या?
सफाई पर भी सवाल क्यों?
विडंबना यह है कि कुछ लोगों ने गंदगी के बने रहने को भी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है। उनका सवाल है कि जिस स्थान पर कोई व्यक्ति खड़ा होकर बोला या बैठा, उसे बाद में साफ क्यों किया गया? उस जगह को संरक्षित क्यों नहीं रखा गया? सफाई के बाद वहां यज्ञ क्यों किया गया? क्या उस स्थान को अपवित्र मान लिया गया था, जिसे यज्ञ के माध्यम से शुद्ध करना जरूरी समझा गया?
कहने वाले कह सकते हैं—“जाकी रही भावना जैसी, तिन देखी प्रभु मूरत वैसी।”
अर्थात व्यक्ति की सोच ही उसके दृष्टिकोण का निर्माण करती है। यदि सामान्य सफाई की प्रक्रिया में भी किसी को जातीय या सामाजिक अशुद्धता दिखाई देने लगे, तो समस्या सफाई में नहीं, उस सोच में तलाशनी होगी।
भीड़ होगी तो कचरा भी होगा
किसी भी सार्वजनिक स्थान पर बड़ी संख्या में लोग एकत्र होंगे तो वहां कचरा फैलने की संभावना स्वाभाविक है। कचरा फैलेगा तो उसकी सफाई भी होगी। दुर्गंध होगी तो उसे दूर करने के लिए धूप, अगरबत्ती, हवन सामग्री या अन्य उपाय किए जा सकते हैं। इसे सामान्य स्वच्छता प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि किसी व्यक्ति की मौजूदगी से जोड़कर।
फिर भी कुछ लोगों को इस पर आपत्ति होती है।
शुद्ध और अशुद्ध मूलतः मन तथा आचरण से जुड़े विषय हैं। लेकिन विडंबना यह है कि आज इन शब्दों का इस्तेमाल मन की शुचिता और व्यक्तिगत स्वच्छता से कहीं अधिक राजनीतिक और सामाजिक लक्ष्य साधने के लिए किया जाने लगा है।
किसी के लिए स्वच्छता अभियान भी जातीय अशुद्धता का प्रतीक बन सकता है, तो किसी दूसरे के लिए शुद्धता और अशुद्धता केवल दैनिक जीवन और स्वच्छता की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है।असल सवाल यह है कि हम शुद्ध-अशुद्ध की परिभाषा शरीर की स्वाभाविक प्रक्रियाओं से तय करेंगे या अपने मन और आचरण की स्वच्छता से? शायद इस सवाल का जवाब ही हमें उस मानसिकता से बाहर निकाल सकता है, जिसमें सफाई भी विवाद का विषय बन जाती है।
