साहित्यिक सम्मान और गुणवत्ता: जब लेखनी से बड़ा 'जुगाड़' हो जाए; क्या ट्रॉफियां और शॉल ही लेखक की असली पहचान हैं?
लेखक: विवेक रंजन श्रीवास्तव (विनायक फीचर्स) संपादन: वेब डेस्क | 30 मार्च 2026
आज के सोशल मीडिया युग में साहित्य का परिदृश्य कुछ अजीबोगरीब मोड़ पर खड़ा है। यहाँ लेखक बाद में जन्म लेता है, लेकिन उसके सम्मानों की सूची पहले ही तैयार हो जाती है। हर दूसरा व्यक्ति किसी 'अकादमी' का अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष बना बैठा है और एक-दूसरे को 'शताब्दी रत्न' जैसे भारी-भरकम अलंकरणों से नवाज रहा है। ऐसे में यह यक्ष प्रश्न खड़ा होता है कि क्या ये चमचमाती ट्रॉफियां और शॉल किसी रचना की साहित्यिक गुणवत्ता की गारंटी दे सकती हैं?
गुणवत्ता बनाम जुगाड़: एक कड़वी हकीकत
लेखक विवेक रंजन श्रीवास्तव के अनुसार, वर्तमान में 'साहित्यिक गुणवत्ता' और 'पुरस्कारों' के बीच का रिश्ता वैसा ही हो गया है जैसा राजनीति और नैतिकता का—दोनों साथ दिखते तो हैं, पर असल में एक-दूसरे से कोसों दूर होते हैं।
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लॉबिंग का बोलबाला: आज लेखक की कलम की ताकत से ज्यादा उसकी 'लॉबिंग' या नेटवर्किंग मायने रखने लगी है। गुणवत्ता अक्सर खिड़की से ताकती रह जाती है और 'जुगाड़' दरवाजे से अंदर आकर मुख्य अतिथि की कुर्सी पर काबिज हो जाता है।
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आत्म-मुग्धता का जाल: सम्मान मिलते ही लेखक स्वयं को आलोचना से ऊपर समझने लगता है। यही आत्म-मुग्धता लेखन के स्तर में गिरावट का सबसे बड़ा कारण बनती है।
इतिहास की गवाही: प्रेमचंद बनाम 'पुरस्कार प्राप्त' लेखक
साहित्य का इतिहास इस बात का गवाह है कि मुंशी प्रेमचंद जैसे कालजयी कथाकार को जीते-जी कोई बड़ा सरकारी सम्मान नहीं मिला, लेकिन आज उनके बिना भारतीय साहित्य अधूरा है। इसके विपरीत, ऐसे सैकड़ों 'पुरस्कार प्राप्त' लेखक हैं जिनकी किताबें आज कबाड़ के भाव भी कोई पढ़ना पसंद नहीं करता। सम्मान से रचना की गरिमा नहीं बढ़ती, बल्कि जब किसी योग्य कृति को सम्मानित किया जाता है, तो उस सम्मान की अपनी गरिमा बढ़ जाती है।"
बाजारवाद और सम्मान की होड़
आज साहित्य पर बाजारवाद हावी है। 'सम्मान वापसी' से लेकर 'सम्मान पाने की होड़' तक, सब कुछ एक अभियान की तरह चलाया जा रहा है। लेखक का ध्यान इस बात पर कम है कि पाठक उसकी रचना से कितना जुड़ रहा है, और इस पर ज्यादा है कि उसके ड्राइंग रूम में कितनी निर्जीव ट्राफियां सजी हैं।लेखक बड़ी खूबसूरती से कहते हैं:असली पुरस्कार तो पाठक की वह आंखें हैं, जो आधी रात को आपकी किताब पढ़ते हुए नम हो जाती हैं। बाकी सब तो धूल झाड़ने वाली निर्जीव वस्तुएं मात्र हैं।"
दृष्टि की जरूरत, पदकों की नहीं
पुरस्कार और गुणवत्ता का संबंध तभी तक पवित्र है जब तक चयन प्रक्रिया पारदर्शी और रचना ईमानदार हो। यदि पुरस्कार केवल 'रेवड़ियों' की तरह बांटे जाएंगे, तो वे साहित्य को निखारने के बजाय उसे दफन करने का काम करेंगे। आज समाज को ऐसे पदकों की जरूरत नहीं है जो अलमारी की शोभा बढ़ाएं, बल्कि उस 'दृष्टि' की जरूरत है जो समाज के अंधेरों को चीरकर रोशनी दिखा सके।

