साहित्य और सत्ता : एक अविभाज्य संबंध
Literature and power: an inseparable relationship
Sat, 15 Nov 2025
(विवेक रंजन श्रीवास्तव – विनायक फीचर्स)
आदर्श रूप से साहित्य को राजनीति से दूर माना जाता है, लेकिन व्यवहार में यह दूरी बनाए रखना आसान नहीं है। साहित्य समाज का दर्पण है, और जब समाज का हर पक्ष राजनीति से प्रभावित हो, तो साहित्य का उससे अछूता रहना लगभग असंभव हो जाता है। रसोई से लेकर संसद तक, भाषा, व्यवहार और सोच की धारणाएँ राजनीति से ही आकार लेती हैं। साहित्यकार चाहे जितना तटस्थ होने की कोशिश करे, अंततः वही परिवेश उसकी रचनात्मकता की आधारभूमि बन जाता है।

साहित्यकार का असली धर्म सत्ता से दूरी बनाकर समाज की चेतना को जगाए रखना है। लेकिन वास्तविकता यह है कि आज साहित्य और राजनीति के बीच की रेखाएँ धुंधली पड़ गई हैं। सत्ता प्रतिष्ठान पुरस्कारों और पदों के जरिए साहित्य को प्रभावित करना चाहते हैं, और कुछ रचनाकार इन कृपाओं को उपलब्धि समझ बैठते हैं। इस विनिमय में साहित्य अपनी नैतिक शक्ति खो देता है और रचनाकार समाज की आत्मा बनने के बजाय सत्ता की शक्ति के रूप में देखा जाने लगता है।
साहित्य में राजनीति का प्रवेश सीधा नहीं होना चाहिए। वह तभी सार्थक है जब उसका उद्देश्य मानवता, समानता और न्याय के पक्ष में हो। चुनौती तब उत्पन्न होती है जब विचारधारा रचना पर हावी हो जाती है, और लेखक किसी विशेष खेमे का प्रवक्ता माना जाने लगता है। हालांकि यह भी सच है कि बिना किसी दृष्टिकोण के साहित्य संभव नहीं—फर्क बस इतना है कि दृष्टिकोण स्वतंत्र हो या सत्ता-प्रेरित।
साहित्यिक परिदृश्य में आज एक नया संतुलन बन रहा है। वर्षों तक वामपंथी विचारधाराओं का प्रभाव रहा, अब सत्ता परिवर्तन के साथ दक्षिणपंथी विमर्श प्रमुख हो रहा है। यानी साहित्य लगातार सत्ता के प्रभाव में घूमता रहता है। पुरस्कारों की राजनीति, संस्थाओं में अनुशंसाओं की दौड़, आयोजनों में नेताओं की उपस्थिति को गौरव मानना—ये प्रवृत्तियाँ साहित्य की आत्मा के लिए घातक हैं। यह रचनाकार को विचारशील व्यक्तित्व से हटाकर दरबारी प्रवृत्ति की ओर ले जाती हैं।
समाधान सत्ता से पूरी तरह कट जाना नहीं है। साहित्य को सत्ता से भयभीत नहीं होना चाहिए, बल्कि उसे सच कहने का साहस होना चाहिए। सच्चा साहित्य सरकार या विपक्ष का समर्थक नहीं होता—वह केवल मनुष्य के पक्ष में खड़ा होता है। व्यंग्यकार हों या कवि, उनका धर्म सत्ता का विरोध भर नहीं, बल्कि सत्य का समर्थन है।
वही साहित्य कालजयी बनता है जो अपने समय से टकराने का हौसला रखता है और शाश्वत सत्य को सामने लाने का साहस करता है। जब सत्ता अपने अनुकूल नैरेटिव गढ़ने लगती है, तब रचनाकार का दायित्व और बढ़ जाता है। भाषा की सुंदरता गढ़ना ही लेखक का वास्तविक कार्य नहीं; विवेक और संवेदना को जीवित रखना उससे भी बड़ा कर्तव्य है। यदि साहित्य सत्ता के निर्देशों पर चलने लगे, तो वह प्रचार बन जाता है; लेकिन यदि वह समाज की पीड़ा और सच से प्रेरित हो, तो वह इतिहास रचता है।
सत्ता हमेशा साहित्य का उपयोग अपने हिसाब से इतिहास लिखवाने के लिए करना चाहती है—कवि उसकी जीतों के गीत लिखें और आलोचक उसकी नीतियों को दर्शन घोषित कर दें। ऐसे समय में स्वतंत्र और निर्भीक साहित्य बेहद जरूरी हो जाता है। उसे सत्ता की प्रशंसा नहीं, बल्कि उसका सच दिखाना चाहिए, ताकि विचार की स्वतंत्रता बनी रहे।
साहित्य और सत्ता का यह रिश्ता कभी पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकता, लेकिन यह ज़रूरी है कि साहित्य सत्ता का प्रतिरूप नहीं, बल्कि उसका दर्पण बने। रचनाकार की निष्ठा दल, विचारधारा या सत्ता से नहीं, बल्कि सत्य और संवेदना से होनी चाहिए। साहित्य तभी समाज का विवेक कहलाएगा। यदि साहित्य अपनी स्वतंत्रता खो देगा, तो समाज भी सोचने की अपनी अंतिम शक्ति खो बैठेगा।
