Literature Festival: साहित्य समाज की आत्मा है, हावड़ा में 'निखिल बंग साहित्य सम्मेलन' के जरिए गूंजी सांस्कृतिक चेतना

Literature Festival: Literature is the soul of society; cultural consciousness resonated in Howrah through the 'Nikhil Banga Sahitya Sammelan'.
 
हावड़ा में 'निखिल बंग साहित्य सम्मेलन' के जरिए गूंजी सांस्कृतिक चेतना

Nikhil Banga Sahitya Sammelan Howrah: किसी भी प्रगतिशील समाज की वास्तविक पहचान सिर्फ उसके आर्थिक या तकनीकी विकास से नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक चेतना, समृद्ध साहित्यिक परंपरा और बौद्धिक विरासत से होती है। साहित्य ही वह माध्यम है जो समय के थपेड़ों के बीच समाज की स्मर्तियों को संजोता है और युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़े रखता है। इसी व्यापक सोच को धरातल पर उतारते हुए हावड़ा संस्कृत साहित्य समाज द्वारा दो दिवसीय 'निखिल बंग साहित्य सम्मेलन' का भव्य आयोजन किया गया, जो समाज के सांस्कृतिक आत्मविश्वास का एक बड़ा उत्सव बनकर उभरा।

इस प्रतिष्ठित सम्मेलन का आधिकारिक उद्घाटन हरियाणा के राज्यपाल प्रो. असीम कुमार घोष ने अपनी धर्मपत्नी एवं हरियाणा की प्रथम महिला श्रीमती मित्रा घोष की गरिमामयी उपस्थिति में किया। महामहिम की उपस्थिति ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि आज के डिजिटल युग में भी साहित्य, शिक्षा और संस्कृति सार्वजनिक जीवन के महत्वपूर्ण सरोकार हैं, जिन्हें संवैधानिक संस्थाओं का निरंतर संरक्षण प्राप्त है।

'वंदे मातरम्' से शुरुआत और 'साहित्य समाज की आत्मा' का संदेश

समारोह की शुरुआत राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम्' की सामूहिक और ऊर्जावान प्रस्तुति से हुई, जिसने पूरे सभागार को देशभक्ति और सांस्कृतिक गौरव से सराबोर कर दिया।

  • सांस्कृतिक पहचान की सुरक्षा: समारोह की अध्यक्षता कर रहे हावड़ा संस्कृत साहित्य समाज के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. शंकर कुमार सान्याल ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा, "साहित्य समाज की आत्मा है। जब तक हमारी भाषा और साहित्य जीवित रहेंगे, तब तक हमारी सांस्कृतिक पहचान अक्षुण्ण रहेगी।" उन्होंने भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण के लिए संस्था द्वारा किए जा रहे दीर्घकालिक प्रयासों को रेखांकित किया।

  • डिजिटल युग में साहित्य की प्रासंगिकता: संस्था की उपाध्यक्ष प्रो. (डॉ.) रत्ना बसु ने सम्मेलन के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सूचना प्रौद्योगिकी के इस दौर में जहाँ त्वरित संवाद बढ़ा है, वहीं गंभीर अध्ययन और साहित्यिक विमर्श की परंपरा को बचाए रखना और भी आवश्यक हो गया है।

  • नई पीढ़ी में चेतना का संचार: संस्था के सचिव डॉ. देबब्रत मुखोपाध्याय ने सचिवीय प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए संस्था की विभिन्न गतिविधियों, शोध परियोजनाओं और प्रकाशनों का विवरण रखा। उन्होंने बताया कि संस्था नई पीढ़ी में संस्कृत एवं अन्य भारतीय भाषाओं के प्रति रुचि जगाने के लिए निरंतर प्रयासरत है।

आधुनिकता का मतलब अपनी जड़ों से कटना नहीं: राज्यपाल प्रो. असीम कुमार घोष

समारोह के दौरान अधिवक्ता समीर बसु राय चौधरी ने राज्यपाल और प्रथम महिला का पारंपरिक अभिनंदन किया। अपने प्रेरक और ज्ञानवर्धक संबोधन में राज्यपाल प्रो. असीम कुमार घोष ने कहा, "साहित्य समाज को केवल मनोरंजन नहीं देता, बल्कि उसे वैचारिक गहराई, विवेक और मानवीय संवेदना प्रदान करता है। जब समाज में आपसी संवाद कम होने लगता है, तब साहित्य ही मनुष्यता को बचाने का सबसे सशक्त माध्यम बनता है।"

उन्होंने विशेष रूप से युवाओं का आह्वान करते हुए कहा आधुनिक होने का अर्थ अपनी समृद्ध परंपरा और जड़ों से कट जाना बिल्कुल नहीं है, बल्कि बुद्धिमानी परंपरा और नवाचार (Innovation) के बीच सही संतुलन स्थापित करने में है। संस्कृत सहित तमाम भारतीय भाषाओं की ज्ञान विरासत को भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।"

समारोह के दौरान राज्यपाल की सहजता और आत्मीयता ने सभी का दिल जीत लिया। वे केवल मंच तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने कार्यक्रम के बाद वहां मौजूद साहित्यकारों, शोधार्थियों और युवा विद्यार्थियों से सीधा संवाद किया।

संगीत और साहित्य का अनूठा संगम

सम्मेलन के सांस्कृतिक सत्र में 'साजेर बेला' सांस्कृतिक दल ने अपनी सुमधुर संगीतमय प्रस्तुतियों से पूरे सभागार को मंत्रमुग्ध कर दिया। भारतीय परंपरा में संगीत और साहित्य हमेशा से एक-दूसरे के पूरक रहे हैं, और इस मंच पर भी यह अद्भुत समन्वय साफ दिखाई दिया। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान के सामूहिक गायन के साथ हुआ।

एक नई दिशा की ओर कदम: हावड़ा संस्कृत साहित्य समाज की कार्यकारिणी समिति ने देश भर से आए साहित्यकारों और भाषा प्रेमियों के प्रति आभार व्यक्त किया। अंत में समिति ने यह विश्वास जताया कि आने वाले समय में यह सम्मेलन और अधिक व्यापक रूप लेगा। आज के सोशल मीडिया के दौर में, जहाँ गहन अध्ययन का समय सिमटता जा रहा है, ऐसे सम्मेलन हमें याद दिलाते हैं कि पुस्तकें केवल कागज़ का पन्ना नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक चेतना और भविष्य का जीवंत दस्तावेज़ हैं।

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