लॉन्जेविटी पैराडॉक्स: उम्र तो बढ़ गई पर क्या सुरक्षित है बुढ़ापा? जानें 1 करोड़ का भ्रम और इसका सही वित्तीय समाधान
बिजनेस डेस्क। चिकित्सा विज्ञान में प्रगति, बेहतर सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों और स्वच्छता के प्रति बढ़ती जागरूकता ने मानव जीवन को एक अनमोल तोहफा दिया है—'दीर्घायु'। आज न सिर्फ वैश्विक स्तर पर बल्कि भारत में भी औसत आयु में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। निश्चित रूप से यह आधुनिक सभ्यता की एक बड़ी कामयाबी है।
लेकिन इस लंबी जिंदगी के सिक्के का एक दूसरा और बेहद चिंताजनक पहलू भी है, जिसे अर्थशास्त्री और वित्तीय योजनाकार 'दीर्घायु का विरोधाभास' (Longevity Paradox) कहते हैं। सरल शब्दों में कहें तो—हमने विज्ञान के दम पर अपनी उम्र तो बढ़ा ली है, लेकिन अब हमारे सामने यह वास्तविक खतरा खड़ा हो गया है कि कहीं रिटायरमेंट के बाद हमारी जिंदगी बची रहे और हमारी जमा-पूंजी पहले ही खत्म न हो जाए।
IRIS 5.0 सर्वे: भारत की आधी आबादी भी रिटायरमेंट के लिए तैयार नहीं
इस वित्तीय संकट की गंभीरता को हाल ही में जारी एक्सिस मैक्स लाइफ इंडिया रिटायरमेंट इंडेक्स स्टडी (IRIS 5.0) के पांचवें संस्करण ने उजागर किया है। कांतार (Kantar) के सहयोग से किए गए इस राष्ट्रव्यापी अध्ययन के अनुसार: भारत का राष्ट्रीय रिटायरमेंट रेडीनेस स्कोर 100 में से महज 48 है। हालांकि यह पिछले वर्षों से थोड़ा बेहतर है, लेकिन यह दर्शाता है कि शहरी भारतीयों का एक बड़ा हिस्सा अपने आर्थिक भविष्य को लेकर गहरे असमंजस और चिंता में है।
बिखरता सामाजिक सुरक्षा कवच
पारंपरिक भारतीय समाज में बुढ़ापे की लाठी संयुक्त परिवार और बच्चे हुआ करते थे। लेकिन तीव्र शहरीकरण और नौकरियों के लिए पलायन ने संयुक्त परिवारों को एकल परिवारों (Nuclear Families) में तब्दील कर दिया है। माता-पिता के बुढ़ापे की जिम्मेदारी बच्चों पर होने का पुराना अनकहा सामाजिक समझौता अब टूट रहा है, जिससे बुजुर्ग आबादी आर्थिक और भावनात्मक दोनों मोर्चों पर खुद को असुरक्षित महसूस कर रही है।
'एम्प्टी नेस्टर्स' और 'सैंडविच जनरेशन' का दोहरा संकट
सर्वेक्षण में समाज के दो अलग-अलग वर्गों की अनूठी और चिंताजनक मानसिक स्थिति सामने आई है:
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एम्प्टी नेस्टर्स (वे माता-पिता जिनके बच्चे बाहर जा चुके हैं): इस वर्ग के 86 प्रतिशत लोगों को यह भली-भांति पता है कि रिटायरमेंट के बाद अपनी वर्तमान जीवनशैली बनाए रखने के लिए उन्हें हर महीने कितने पैसों की आवश्यकता होगी। लेकिन विरोधाभास यह है कि इनमें से केवल 33 प्रतिशत लोगों को ही यह भरोसा है कि उनकी कुल बचत रिटायरमेंट के बाद अगले 10 साल भी चल पाएगी।
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सैंडविच जनरेशन (बुजुर्ग माता-पिता और बच्चों के बीच पिसे मध्यम आयु वर्ग के लोग): इन पर दोहरी जिम्मेदारी का बोझ है—एक तरफ बूढ़े माता-पिता की देखरेख और मेडिकल खर्च, तो दूसरी तरफ बच्चों की उच्च शिक्षा और परवरिश। इस चक्रव्यूह में वे अपने स्वयं के भविष्य के लिए बचत नहीं कर पाते। इस वर्ग के मात्र 38 प्रतिशत लोगों को विश्वास है कि उनका रिटायरमेंट फंड 10 साल से अधिक टिक पाएगा।
'1 करोड़ रुपये का रिटायरमेंट भ्रम' (The 1 Crore Illusion)
सर्वे में एक और चौंकाने वाला मनोवैज्ञानिक तथ्य सामने आया है। भारत के लगभग 77 प्रतिशत शहरी लोगों को लगता है कि यदि उनके पास रिटायरमेंट के समय 1 करोड़ रुपये या उससे थोड़ी कम राशि का फंड हो, तो उनका बुढ़ापा शांति से कट जाएगा।
वित्तीय विशेषज्ञों के अनुसार, यह एक बहुत बड़ा भ्रम है। लोग भविष्य में बढ़ने वाली महंगाई (Inflation) और विशेष रूप से चिकित्सा क्षेत्र की महंगाई (Medical Inflation), जो अक्सर दहाई अंकों (10% से अधिक) में बढ़ती है, के प्रभाव को बेहद कम करके आंकते हैं। आज जो 1 करोड़ रुपये की रकम बहुत बड़ी और सुरक्षित लग रही है, वही अगले 20 या 30 साल बाद महज एक साधारण इमरजेंसी फंड बनकर रह जाएगी क्योंकि उसकी क्रय शक्ति (Buying Power) बेहद कम हो चुकी होगी।
विरोधाभास का समाधान: शॉर्ट-टर्म सोच से बाहर निकलने का समय
लॉन्जेविटी पैराडॉक्स से निपटने के लिए पारंपरिक वित्तीय व्यवहार में बदलाव करना और सही साधनों (Financial Instruments) का चयन करना अनिवार्य है:
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पारंपरिक साधनों की सीमा: वर्तमान में 61% एम्प्टी नेस्टर्स आज भी फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) और रेकरिंग डिपॉजिट (RD) पर निर्भर हैं। ये साधन पूंजी की सुरक्षा तो देते हैं, लेकिन टैक्स कटने और महंगाई दर को जोड़ने के बाद इनसे मिलने वाला वास्तविक रिटर्न (Real Rate of Return) नगण्य या नकारात्मक हो जाता है।
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म्यूचुअल फंड और एसआईपी (SIP): एक सकारात्मक बदलाव यह है कि 44% शहरी भारतीय अब इक्विटी-आधारित विकास का लाभ उठाने के लिए म्यूचुअल फंड और एसआईपी का रुख कर रहे हैं, जो लंबी अवधि में महंगाई को पछाड़ने का सबसे बेहतरीन जरिया है।
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नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS): टैक्स लाभ और अनुशासित, व्यवस्थित योजना (Structured Planning) के कारण एनपीएस युवाओं और नौकरीपेशा लोगों के बीच एक मजबूत विकल्प बनकर उभरा है।
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वैरिएबल एन्युटी (Variable Annuity): बाजार आधारित निवेश से जुटाए गए फंड को रिटायरमेंट के बाद नियमित आय में बदलना एक चुनौती होती है। ऐसे में 'वैरिएबल एन्युटी' एक बेहतरीन लचीला माध्यम साबित हो सकती है, जो समय के साथ बढ़ती है और बढ़ती उम्र में महंगाई के खिलाफ एक सुरक्षा कवच प्रदान करती है।
