भगवान परशुराम में शस्त्र और शास्त्र का अद्भुत संगम है: महंत विशाल गौड़
There is a wonderful confluence of weapons and scriptures in Lord Parashurama: Mahant Vishal Gaur
Sun, 19 Apr 2026
लखनऊ। भगवान परशुराम को भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है और वे चिरंजीवी (अमर) हैं। भृगुवंशीय ऋषि महर्षि जमदग्नि और माता माता रेणुका के पुत्र परशुराम का मूल नाम ‘राम’ था, लेकिन भगवान शिव द्वारा प्रदत्त परशु (फरसा) धारण करने के कारण वे परशुराम कहलाए।
चौक स्थित श्री कोतवालेश्वर महादेव मंदिर के महंत विशाल गौड़ के अनुसार, भगवान परशुराम शस्त्र और शास्त्र के अद्भुत संगम, अन्याय के विनाशक और धर्म की पुनः स्थापना के प्रतीक हैं। उनका जन्म वैशाख शुक्ल तृतीया के प्रदोष काल में हुआ था, इसलिए परशुराम जयंती का विशेष महत्व है। इस वर्ष यह पर्व 19 अप्रैल को मनाया जा रहा है।

महंत के अनुसार, इस दिन प्रातः स्नान कर भगवान परशुराम का ध्यान करना चाहिए। तांबे के पात्र में जल, गंगाजल, लाल पुष्प और रोली डालकर सूर्य देव को अर्घ्य देना तथा विधि-विधान से भगवान परशुराम और भगवान विष्णु की पूजा करना शुभ माना जाता है। फल और मिठाई का भोग लगाकर दिन को पुण्यदायी बनाया जा सकता है।
भगवान परशुराम ब्राह्मण कुल में जन्मे, लेकिन युद्धकला में अद्वितीय दक्षता के कारण उन्हें ‘ब्राह्मण-क्षत्रिय’ भी कहा जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, उन्होंने अपने पिता के आदेश पर माता रेणुका का वध किया, जो उनके कठोर अनुशासन और आज्ञाकारिता का प्रतीक माना जाता है।
भगवान परशुराम का पिनाक धनुष से भी गहरा संबंध रहा है। वे भगवान शिव के अनन्य भक्त थे और यह धनुष उन्हें शिव से प्राप्त हुआ था। बाद में उन्होंने इसे जनक वंश को प्रदान किया। रामायण के अनुसार, जब भगवान राम ने इस धनुष को तोड़ा, तो उसकी टंकार से परशुराम की समाधि भंग हुई और वे क्रोधित होकर मिथिला पहुँचे।
कथाओं में वर्णित है कि जब क्षत्रिय राजाओं ने शक्ति का दुरुपयोग कर अत्याचार बढ़ा दिया, तब भगवान परशुराम ने इक्कीस बार उनका संहार कर धर्म की पुनः स्थापना की।
इसके अतिरिक्त, तंगीनाथ धाम में भगवान परशुराम की कुल्हाड़ी आज भी सुरक्षित रखी हुई है। खुले आसमान के नीचे होने के बावजूद इस पर जंग नहीं लगना एक अद्भुत रहस्य माना जाता है।
