तीनों लोक में नहीं मिली शरण, प्रभु राम ने किया जयंत का उद्धार
कार्यक्रम का शुभारंभ सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से हुआ। इसके बाद रामायणी प्रमोद पाठक ने मानस के दोहों के माध्यम से कथा प्रारंभ कराई। चित्रकूट पर्वत पर प्रभु श्रीराम माता सीता का श्रृंगार कर रहे थे। उसी समय आकाश से गुजरते हुए इंद्रपुत्र जयंत के मन में संशय उत्पन्न हुआ। उन्होंने सोचा कि श्रीराम ब्रह्मचारी कैसे हो सकते हैं? यह परीक्षा लेने के लिए वह कौवे का रूप धरकर माता सीता के चरणों पर प्रहार करते हैं।
इस पर प्रभु श्रीराम ने एक कुश को अभिमंत्रित कर जयंत पर प्रहार किया। भयभीत जयंत तीनों लोकों में भागते हुए ब्रह्मा, विष्णु और महेश से शरण मांगते हैं, लेकिन किसी ने शरण नहीं दी। अंततः नारद मुनि की प्रेरणा से वह पुनः श्रीराम की शरण में लौटते हैं।

श्रीराम ने कहा कि अभिमंत्रित शक्ति को टाला नहीं जा सकता, पर उसका प्रभाव कम किया जा सकता है। इसी क्रम में उन्होंने जयंत की एक आंख फोड़ दी और उसे क्षमा प्रदान कर दिया। इसके बाद भगवान श्रीराम का आगमन ऋषि अत्रि और माता अनसूया के आश्रम में हुआ, जहां माता अनसूया ने सीता जी को पातिव्रत्य धर्म की शिक्षा दी –
“एकई धर्म, एक व्रत नेमा, काम, वचन, मन, पतिपद प्रेमा।”
आगे मार्ग में विराध राक्षस मिला, जिसे श्रीराम ने युद्ध में परास्त कर उसका उद्धार किया। उनके हाथ से मृत्यु पाकर विराध ने दिव्य रूप प्राप्त किया और प्रभु ने उसे परमधाम भेज दिया। रामलीला मंचन के बीच सरोही जागरण ग्रुप ने आकर्षक सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं। लीला का आनंद लेने बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। इस अवसर पर प्रमोद पाठक, समिति प्रबंधक रामलखन श्रीवास्तव, शिवकुमार वर्मा, अध्यक्ष अनिल अग्रवाल, विनय सिंह, शैलेन्द्र सिंह, अंकित गुप्ता गोलू, राजू पटेल, राजेश गुप्ता कृष्णा, राकेश वर्मा, अक्षत सहित अन्य लोग मौजूद रहे।
