राजाओं को राजनीति सिखाने के लिए अवतरित हुए थे प्रभु श्रीराम
Lord Shri Ram was incarnated to teach politics to the kings.
Thu, 26 Mar 2026
(मुकेश "कबीर" — विभूति फीचर्स)
दुनिया में ईश्वर के अनेक अवतार हुए हैं। वैष्णव परंपरा में अब तक तेईस अवतारों का उल्लेख मिलता है, लेकिन केवल श्रीराम को ही “राजा राम” कहा गया। आज भी उन्हें आदर्श राजा के रूप में स्मरण किया जाता है और किसी भी उत्तम शासन व्यवस्था को “रामराज्य” कहा जाता है। वास्तव में श्रीराम का अवतार ही राजाओं को राजनीति और आदर्श शासन की शिक्षा देने के लिए हुआ था।
एक आदर्श राजा कैसा होना चाहिए, यह श्रीराम ने अपने विचारों और जीवन दोनों से सिद्ध किया। उन्होंने अपने जीवनकाल में सामान्य व्यक्ति के अपराध को भले ही क्षमा कर दिया हो, लेकिन राजाओं के अपराध को कभी क्षमा नहीं किया। वे भली-भांति जानते थे कि यदि राजा और राजपरिवार मर्यादा में नहीं रहेंगे, तो प्रजा भी अनुशासित नहीं रह सकेगी। यही कारण था कि उन्होंने अपनी पत्नी सीता और प्रिय भाई लक्ष्मण तक का त्याग करने में भी संकोच नहीं किया।
सीता त्याग को लेकर अक्सर आलोचना होती है, लेकिन श्रीराम के लिए प्रजा का विश्वास सर्वोपरि था। उनका मानना था कि यदि प्रजा का एक व्यक्ति भी असंतुष्ट है, तो राजा को अपने पद पर बने रहने का नैतिक अधिकार नहीं है। जब गुप्तचर ने बताया कि अधिकांश प्रजा सीता जी की वापसी के पक्ष में है, पर कुछ लोग असहमत हैं, तब श्रीराम ने स्पष्ट कहा कि जब तक अंतिम व्यक्ति की सहमति नहीं मिलती, तब तक यह पूर्ण जनसमर्थन नहीं माना जा सकता।
इतना कठोर आदर्श शायद ही किसी अन्य राजा ने अपनाया हो। श्रीराम के जीवन से यह शिक्षा मिलती है कि प्रजा को केवल दंड से नहीं, बल्कि आदर्श आचरण से प्रभावित किया जा सकता है।
चित्रकूट में जब भरत जी ने उनसे अयोध्या लौटने का आग्रह किया, तब श्रीराम ने कहा कि यदि वे स्वयं पिता के वचनों का पालन नहीं करेंगे, तो प्रजा पर उसका क्या प्रभाव पड़ेगा? उन्होंने भरत से यह भी पूछा कि क्या राज्य की प्रजा संतुष्ट है, क्या पड़ोसी राज्य भयभीत रहते हैं, और क्या कर्मचारियों को नियमित वेतन मिलता है। उनके अनुसार राजा का प्रथम कर्तव्य प्रजा को संतुष्ट रखना, दूसरा राज्य की सुरक्षा सुनिश्चित करना और तीसरा प्रशासन को भ्रष्टाचार से मुक्त रखना है।
बालि वध के प्रसंग में भी श्रीराम ने स्पष्ट किया कि राजा का दायित्व है कि वह अधर्म करने वाले को दंड दे। उन्होंने कहा कि जो राजा होकर भी अन्याय और अनाचार करता है, उसे राजपद पर रहने का अधिकार नहीं है।
श्रीराम के जीवन की सबसे बड़ी विशेषता यही रही कि उन्होंने कभी नीति-विरुद्ध आचरण नहीं किया और न ही किसी अन्य को करने दिया। उन्होंने केवल उन्हीं राज्यों में हस्तक्षेप किया, जहाँ की प्रजा अपने शासक से पीड़ित थी। किष्किंधा जैसे राज्यों में उन्होंने न्याय स्थापित कर योग्य शासकों को स्थापित किया।
महाराज दशरथ द्वारा चारों पुत्रों में कार्य-विभाजन के अनुसार श्रीराम को कानून व्यवस्था का दायित्व सौंपा गया था। इसी कारण उनका जनता से सीधा संवाद था। उन्होंने जनहित में ऐसे नियम बनाए, जिनका प्रभाव आगे चलकर शासन व्यवस्थाओं में दिखाई देता है।
