लखनऊ: गुरुद्वारा नाका हिंडोला में श्रद्धा के साथ मनाया गया श्री गुरु हरिगोबिन्द साहिब जी का प्रकाश पर्व
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विशेष अरदास: मुख्य ग्रंथि ज्ञानी विनोद सिंह ने समूह मानवता के कल्याण के लिए की अरदास।
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इतिहास पर प्रकाश: मीरी-पीरी और 'बन्दी छोड़ दाता' के गौरवमयी इतिहास से संगतों को कराया रूबरू।
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अटूट लंगर: बिना किसी भेदभाव के सुबह से रात तक वितरित हुआ मिस्से प्रसादे और लस्सी का लंगर।
लखनऊ (30 जून 2026)। 'मीरी पीरी के मालिक' और 'बन्दी छोड़ दाता' सिखों के छठे गुरु, साहिब श्री गुरु हरिगोबिन्द साहिब जी का पावन प्रकाश पर्व (जन्मोत्सव) मंगलवार को श्री गुरु सिंह सभा गुरुद्वारा नाका हिंडोला में अत्यंत श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाया गया।
इस पवित्र अवसर पर मुख्य ग्रंथि ज्ञानी विनोद सिंह जी द्वारा श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के चरणों में समूह मानवता के भले और विश्व कल्याण के लिए विशेष अरदास की गई। इसके उपरांत, हजूरी रागी भाई गुरमुख सिंह जी ने अपनी मधुर वाणी में शबद कीर्तन का गायन कर उपस्थित संगतों को निहाल किया।
मीरी-पीरी और 'बन्दी छोड़ दाता' का गौरवशाली इतिहास
ज्ञानी विनोद सिंह जी ने गुरु साहिब के जीवन और उनके सिद्धांतों पर प्रकाश डालते हुए संगतों को बताया कि आपका जन्म श्री गुरु अरजन देव जी व माता गंगा जी के गृह (अमृतसर, पंजाब) में हुआ था।
गुरु जी के जीवन से जुड़े प्रमुख प्रसंग:
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मीरी और पीरी की दो तलवारें: श्री गुरु अरजन देव जी की शहीदी के बाद जब गुरु हरिगोबिन्द साहिब जी गद्दी पर बैठे, तो उन्होंने दो तलवारें धारण कीं। 'मीरी' की तलवार संसार में जुल्म और अत्याचार को रोकने (शक्ति) का प्रतीक थी, और 'पीरी' की तलवार अधर्म व पाप का नाश कर सच्चे धर्मार्थियों की रक्षा (भक्ति) का प्रतीक थी।
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अकाल तख्त की सर्जना: जहाँ श्री गुरु अरजन देव जी ने अमृतसर में भक्ति के प्रतीक 'हरिमंदिर साहिब' की सर्जना की, वहीं श्री गुरु हरिगोबिन्द साहिब जी ने ठीक उसके सामने शक्ति के प्रतीक 'श्री अकाल तख्त साहिब' की स्थापना की।
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सामाजिक सुधार: गुरु जी ने लोक-कल्याण के लिए पानी की कमी को देखते हुए जगह-जगह कुएं खुदवाए और समाज से ऊंच-नीच के भेदभाव को पूरी तरह समाप्त किया।
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'बन्दी छोड़ दाता' क्यों कहा जाता है?: गुरु जी की बढ़ती शक्ति से ईर्ष्या वश उन्हें ग्वालियर के किले में कैद कर दिया गया, जहाँ पहले से ही जहांगीर द्वारा सताए गए 52 हिंदू राजा भी बंदी थे। जब जहांगीर ने गुरु जी की रिहाई का आदेश दिया, तो गुरु जी ने शर्त रखी कि वे अकेले बाहर नहीं जाएंगे बल्कि सभी 52 राजाओं को भी मुक्त करना होगा। जहांगीर को झुकना पड़ा और गुरु जी उन सभी राजाओं को अपने चोले की कलियों से छूकर सुरक्षित बाहर ले आए और उनका राजपाट वापस दिलवाया। तभी से उन्हें 'बन्दी छोड़ दाता' कहा जाता है।
सेवा और प्रबंधन: संगतों का उमड़ा जनसैलाब
कार्यक्रम का कुशल संचालन सरदार कृपाल सिंह ऐवट और सरबजीत सिंह द्वारा किया गया। गुरुद्वारा साहिब के अध्यक्ष सरदार अमरजोत सिंह एवं कार्यालय सचिव दलजीत सिंह जी ने दूर-दराज से आईं संगतों का आभार प्रकट करते हुए देशवासियों को प्रकाश पर्व की बधाई दी।
अटूट लंगर की व्यवस्था
महामंत्री सरदार मनमीत सिंह जी की देखरेख में संगतों के लिए विशेष रूप से मिस्से प्रसादे एवं लस्सी के लंगर की उत्तम व्यवस्था की गई। सरदार हरमिंदर सिंह टीटू एवं सरदार गुरदीप सिंह भाटिया के सहयोग से सभी संगतों को बिना किसी भेदभाव के नाम-सिमरन कराते हुए प्रातः 6:30 बजे से लेकर रात्रि की समाप्ति तक निरंतर लंगर वितरित किया गया।
विशेष सेवादार: लंगर सेवा को सुचारू रूप से संचालित करने में सरदार कुलदीप सिंह सलूजा, सरदार इंद्रजीत सिंह, सेवादार रंजित सिंह, गुरविंदर सिंह, शैलेंद्र सिंह, नरेंद्र सिंह एवं सुरजीत सिंह का विशेष और सराहनीय योगदान रहा।




