मध्यप्रदेश: जहां सौर ऊर्जा अब विकल्प नहीं, विकास की मुख्य धारा बन रही है
(अंजनी सक्सेना – विभूति फीचर्स) आज ऊर्जा पर होने वाली वैश्विक चर्चा केवल उत्पादन क्षमता या आपूर्ति के आंकड़ों तक सीमित नहीं रह गई है। अब सबसे अहम सवाल यह है कि ऊर्जा किन स्रोतों से प्राप्त की जा रही है और उसका पर्यावरण, अर्थव्यवस्था तथा समाज पर दीर्घकालिक प्रभाव क्या होगा। जलवायु परिवर्तन, बढ़ते कार्बन उत्सर्जन और सीमित जीवाश्म संसाधनों की चुनौतियों के बीच पूरी दुनिया स्वच्छ और टिकाऊ ऊर्जा विकल्पों की ओर बढ़ रही है। इसी परिप्रेक्ष्य में मध्यप्रदेश का सौर एवं नवकरणीय ऊर्जा की दिशा में बढ़ता कदम एक तकनीकी बदलाव से कहीं अधिक, विकास की सोच में आया एक निर्णायक परिवर्तन है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का यह कथन कि सौर ऊर्जा के विस्तार से पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों पर निर्भरता लगातार कम हो रही है, केवल एक प्रशासनिक वक्तव्य नहीं है, बल्कि राज्य की ऊर्जा नीति की स्पष्ट दिशा को दर्शाता है। यह संकेत देता है कि मध्यप्रदेश ऊर्जा सुरक्षा को अब सिर्फ बिजली आपूर्ति के रूप में नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन और भावी पीढ़ियों के प्रति जिम्मेदारी के रूप में देख रहा है। वैश्विक स्तर पर जब ऊर्जा संसाधनों को लेकर प्रतिस्पर्धा तेज हो रही है, तब स्वच्छ और नवीकरणीय स्रोतों की ओर समय रहते बढ़ना किसी भी राज्य के लिए रणनीतिक आवश्यकता बन चुका है।
प्रधानमंत्री द्वारा वर्ष 2070 तक ‘नेट ज़ीरो कार्बन उत्सर्जन’ और 2030 तक 500 गीगावाट अक्षय ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य इसी वैश्विक यथार्थ की स्वीकारोक्ति है। इन राष्ट्रीय लक्ष्यों की पूर्ति में राज्यों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। मध्यप्रदेश ने इस जिम्मेदारी को केवल स्वीकार ही नहीं किया, बल्कि नीति निर्माण, निवेश प्रोत्साहन और जमीनी क्रियान्वयन के माध्यम से उसे आगे बढ़ाने का ठोस प्रयास भी किया है। राज्य की ऊर्जा संरचना में हरित ऊर्जा की लगातार बढ़ती हिस्सेदारी यह दर्शाती है कि ऊर्जा संक्रमण अब योजनाओं से निकलकर वास्तविकता का रूप ले चुका है।
रीवा सोलर पार्क और ओंकारेश्वर फ्लोटिंग सोलर प्रोजेक्ट जैसे उदाहरण इस बात के प्रमाण हैं कि मध्यप्रदेश न केवल बड़े पैमाने पर सौर परियोजनाओं को अपनाने की क्षमता रखता है, बल्कि उन्हें प्रभावी ढंग से संचालित करने में भी सक्षम है। इन परियोजनाओं का महत्व केवल उनकी मेगावाट क्षमता में नहीं, बल्कि उस सोच में है, जो राज्य को पारंपरिक ऊर्जा ढांचे से बाहर निकालकर नवाचार और आधुनिक तकनीक की ओर ले जा रही है। सौर ऊर्जा अब धीरे-धीरे एक विकल्प नहीं, बल्कि ऊर्जा उत्पादन की मुख्यधारा बनती जा रही है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में लागू की गई टेक्नोलॉजी एग्नोस्टिक रिन्यूएबल एनर्जी पॉलिसी इस बदलाव की मजबूत आधारशिला है। यह नीति किसी एक तकनीक तक सीमित न रहकर सभी संभावित नवकरणीय ऊर्जा स्रोतों को समान अवसर प्रदान करती है। इससे राज्य भविष्य की तकनीकी अनिश्चितताओं के प्रति लचीला बना रहता है। यही लचीलापन निवेशकों के लिए विश्वास का आधार बनता है और ऊर्जा क्षेत्र में दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करता है।
मध्यप्रदेश की भौगोलिक परिस्थितियाँ इस ऊर्जा परिवर्तन में स्वाभाविक सहयोगी की भूमिका निभाती हैं। भरपूर धूप, विस्तृत भू-भाग और संसाधनों की उपलब्धता सौर ऊर्जा के विस्तार के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करती है। लेकिन केवल प्राकृतिक संसाधन ही किसी राज्य को आगे नहीं ले जाते। इसके लिए स्पष्ट नीति, प्रशासनिक इच्छाशक्ति और दीर्घकालिक दृष्टिकोण भी आवश्यक होता है। वर्तमान ऊर्जा नीति में इन तीनों का संतुलित समावेश स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
सौर और नवकरणीय ऊर्जा का विस्तार पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राज्य की आर्थिक रणनीति का भी अहम हिस्सा बन चुका है। बड़े निवेश, स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर और सहायक उद्योगों का विकास—ये सभी हरित ऊर्जा से जुड़े प्रत्यक्ष लाभ हैं। यह मॉडल न केवल मध्यप्रदेश को ऊर्जा सरप्लस राज्य बनाने की दिशा में ले जाता है, बल्कि औद्योगिक प्रतिस्पर्धा में भी उसे मजबूत करता है। जब बिजली स्वच्छ, स्थिर और किफायती होती है, तब उद्योगों के लिए लागत घटती है और निवेश के लिए अनुकूल वातावरण बनता है।
ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों के लिए भी यह बदलाव विशेष महत्व रखता है। सौर परियोजनाएँ केवल बड़े शहरों या औद्योगिक क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि स्थानीय रोजगार, भूमि उपयोग और बुनियादी ढांचे को नया स्वरूप देती हैं। इससे विकास का लाभ समाज के व्यापक वर्ग तक पहुंचता है और समावेशी विकास की अवधारणा को बल मिलता है।
सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह ऊर्जा परिवर्तन भविष्य की पीढ़ियों के प्रति जिम्मेदारी की भावना से जुड़ा हुआ है। पारंपरिक ऊर्जा स्रोत सीमित हैं और उनके पर्यावरणीय दुष्परिणाम अब स्पष्ट हो चुके हैं। ऐसे में सौर ऊर्जा पर बढ़ता जोर केवल वर्तमान की जरूरत नहीं, बल्कि आने वाले समय की अनिवार्यता है। मध्यप्रदेश इस अनिवार्यता को समझते हुए अपनी ऊर्जा नीति को अल्पकालिक आवश्यकताओं तक सीमित न रखकर दीर्घकालिक चुनौतियों को ध्यान में रखकर गढ़ रहा है।
मध्यप्रदेश का सौर ऊर्जा की ओर यह बढ़ता कदम यह संदेश देता है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। सही नीति, स्पष्ट दृष्टि और मजबूत क्रियान्वयन के साथ दोनों को साथ लेकर चला जा सकता है। यदि यही दिशा बनी रही, तो मध्यप्रदेश न केवल ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनेगा, बल्कि हरित विकास का ऐसा उदाहरण भी प्रस्तुत करेगा, जिसे अन्य राज्य अपनाने की प्रेरणा लेंगे।
सौर ऊर्जा की यह यात्रा केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है। यह मध्यप्रदेश के विकास दर्शन का विस्तार है—एक ऐसा दर्शन, जिसमें संतुलन, जिम्मेदारी और भविष्य की चिंता को केंद्रीय स्थान दिया गया है। यही सोच राज्य को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर ही नहीं, बल्कि पर्यावरण के प्रति उत्तरदायी भी बनाती है।
