हिंदी को जनमानस की भाषा मानते थे महात्मा गांधी

Mahatma Gandhi considered Hindi to be the language of the masses
 
हिंदी को जनमानस की भाषा मानते थे महात्मा गांधी

(कुमार कृष्णन – विभूति फीचर्स)  हर वर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है। वर्ष 1949 में इसी दिन संविधान सभा ने लंबी बहस और गहन विमर्श के बाद हिंदी को देवनागरी लिपि में भारत की राजभाषा का दर्जा दिया। संविधान के भाग XVII में अनुच्छेद 343 से 351 तक हिंदी भाषा से जुड़े प्रावधान शामिल हैं। अनुच्छेद 343(1) में साफ कहा गया है कि संघ की राजभाषा हिंदी होगी, किंतु अनुच्छेद 343(2) और आगे के अनुच्छेद इस तथ्य को उजागर करते हैं कि भारत जैसे बहुभाषी राष्ट्र में राजभाषा का प्रश्न अत्यंत जटिल है।

संविधान सभा ने हिंदी को बढ़ावा देने के लिए केवल 15 वर्ष का समय निर्धारित किया था, लेकिन 78 वर्षों बाद भी अंग्रेजी का वर्चस्व सरकारी कार्यों, न्यायालयों और विधायिकाओं में स्पष्ट दिखाई देता है। यही कारण है कि राजभाषा के रूप में हिंदी अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँच सकी।

गांधीजी का दृष्टिकोण

महात्मा गांधी हिंदी को केवल भाषा नहीं, बल्कि स्वदेशी और स्वराज आंदोलन का प्रमुख साधन मानते थे। उनका मानना था कि जनता को स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ने के लिए उनकी अपनी भाषा का उपयोग जरूरी है। दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद 1915 से उन्होंने हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं के अधिकाधिक प्रयोग पर बल दिया।

28 मई 1917 को प्रताप (हिंदी पत्रिका) में लिखे अपने लेख में उन्होंने हिंदी को राष्ट्रीय भाषा बनाने की वकालत की। उसी वर्ष भागलपुर के कटहलबाड़ी में आयोजित छात्रों के सम्मेलन में गांधीजी ने हिंदी में ही अध्यक्षीय भाषण दिया। उन्होंने कहा था कि  सम्मेलन का कार्य हिंदी में करने का निर्णय दूरदर्शी कदम है। यही भाषा इस प्रांत की भी है और वही राष्ट्रभाषा भी।”

यही सम्मेलन आगे चलकर स्वतंत्रता संग्राम का राजनीतिक कैनवास बना और घर-घर तक आज़ादी का संदेश पहुँचाने का माध्यम बना। बाद में गांधीजी ने 1918 में हिंदी साहित्य सम्मेलन में स्पष्ट कहा कि हिंदी ही भारत की राष्ट्रभाषा होनी चाहिए, क्योंकि यह अंग्रेजी की तुलना में जनता के लिए अधिक सहज है।

हिंदी प्रचार और दक्षिण भारत

गांधीजी ने पहली बार दक्षिण भारत में हिंदी मिशनरियों को भेजने का विचार रखा, जिसका परिणाम 1923 में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की स्थापना के रूप में सामने आया।
20 अक्टूबर 1917 को गुजरात शिक्षा सम्मेलन में दिए भाषण में गांधीजी ने स्वामी दयानंद सरस्वती के हिंदी प्रचार प्रयासों की सराहना की। दयानंद सरस्वती ने सत्यार्थ प्रकाश (1875) हिंदी में लिखकर हिंदी को धार्मिक और सामाजिक सुधार आंदोलनों का प्रमुख माध्यम बनाया। गांधीजी ने हिंदी को वहीं से आगे बढ़ाया, जहाँ दयानंद सरस्वती ने इसे छोड़ा था। अंतर केवल इतना था कि दयानंद का उद्देश्य धार्मिक जागरण था, जबकि गांधीजी का मिशन राष्ट्रीय एकता और स्वतंत्रता था।

जी. दुर्गाबाई और दक्षिण भारत में हिंदी

संविधान सभा की सदस्य रहीं जी. दुर्गाबाई (1909-1981) किशोरावस्था में ही बालिका हिंदी पाठशाला चलाती थीं। यहाँ हिंदी सीखने वाली सैकड़ों महिलाओं को देखकर जमनालाल बजाज, सी.आर. दास और कस्तूरबा गांधी जैसे नेता भी प्रभावित हुए थे।हालाँकि, आगे चलकर उन्होंने महसूस किया कि हिंदी प्रचार में अति उत्साह ने कई गैर-हिंदी भाषियों को दूर कर दिया। उन्होंने 14 सितंबर 1949 को कहा – हिंदी को लेकर जो अतिशयोक्ति और अनुचित प्रचार हुआ है, उसने उन लोगों का भी समर्थन खो दिया है जो वास्तव में हिंदी के पक्षधर थे।”

आज की प्रासंगिकता

दुर्गाबाई का यह विचार आज भी उतना ही प्रासंगिक है। हिंदी केवल कानूनी दर्जे से मजबूत नहीं होगी, बल्कि उसे सशक्त बनाने के लिए सांस्कृतिक आदान-प्रदान, स्वैच्छिक प्रयास और अन्य भारतीय भाषाओं के साथ संतुलन ज़रूरी है। महात्मा गांधी के शब्दों में – हिंदी केवल भाषा नहीं, बल्कि जनमानस से संवाद का सेतु है।

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