महात्मा गांधी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और पंच परिवर्तन

गांधी के स्वदेशी, ग्राम स्वराज और सामाजिक समरसता के विचारों को आज के संदर्भ में देखने की जरूरत
 
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(अखिलेश श्रीवास्तव—विनायक फीचर्स)

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और महात्मा गांधी देश में लंबे समय से चर्चा के विषय रहे हैं। दोनों को अलग-अलग संदर्भों में भी देखा जाता है और कई बार उनके विचारों तथा सामाजिक सरोकारों की तुलना भी की जाती है। लेखक के अनुसार, गांधी और संघ के बीच संबंधों को केवल राजनीतिक या वैचारिक विरोध के चश्मे से देखना पर्याप्त नहीं होगा। गांधी के जीवनकाल में संघ के कार्यक्रमों से उनके संपर्क और संघ के प्रति उनके दृष्टिकोण से जुड़े कुछ प्रसंग इस संबंध को एक अलग संदर्भ में देखने का अवसर देते हैं।

 

 

लेख के अनुसार, गांधी जी ने 1934 में वर्धा में आरएसएस के शिविर का दौरा किया था। इसके अलावा 16 सितंबर 1947 को दिल्ली में सफाईकर्मियों की बस्ती में आयोजित संघ के कार्यक्रम में उनके संबोधन का भी उल्लेख मिलता है। 28 सितंबर 1947 के हरिजन में प्रकाशित सामग्री में वर्धा शिविर के अनुशासन, सादगी और छुआछूत के अभाव से गांधी जी के प्रभावित होने का उल्लेख किया गया था।

गांधी जी की 157वीं जयंती के अवसर पर इन प्रसंगों को याद करने का उद्देश्य केवल अतीत की चर्चा करना नहीं, बल्कि यह समझना भी है कि उनके विचार आज के भारत में किस रूप में प्रासंगिक हो सकते हैं।

गांधी के सपनों का भारत कैसा था?

गांधी केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक व्यापक विचार-दर्शन का नाम हैं। सत्य, अहिंसा, स्वदेशी, ग्राम स्वराज, आत्मनिर्भरता, सामाजिक समानता और नागरिक जिम्मेदारी उनके चिंतन के महत्वपूर्ण पक्ष रहे। उनका ‘रामराज्य’ किसी धार्मिक शासन की अवधारणा मात्र नहीं, बल्कि लेखक की दृष्टि में नैतिकता, न्याय, जिम्मेदारी और लोककल्याण पर आधारित आदर्श व्यवस्था का प्रतीक था।

आज सवाल यह है कि स्वतंत्रता के बाद भारत ने गांधी के सपनों को किस हद तक अपनाया और उनके विचारों को बदलते समय के अनुरूप किस प्रकार समझा। राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद आत्मनिर्भर और स्वावलंबी समाज का निर्माण गांधी के चिंतन का महत्वपूर्ण हिस्सा था।

इसी संदर्भ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ‘पंच परिवर्तन’ की चर्चा की जा सकती है। संघ ने सामाजिक परिवर्तन के पांच आयामों के रूप में सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी आचरण और नागरिक कर्तव्य को सामने रखा है।

स्वदेशी और ग्राम स्वराज

गांधी के आर्थिक चिंतन में स्वदेशी और ग्राम स्वराज का महत्वपूर्ण स्थान था। उनका मानना था कि भारत की आर्थिक शक्ति गांवों और स्थानीय समुदायों को सक्षम बनाने से मजबूत होगी। स्वदेशी उनके लिए केवल विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार तक सीमित विचार नहीं था, बल्कि स्थानीय उत्पादन, स्थानीय जरूरतों और स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्राथमिकता देने का माध्यम था।

गांधी ने स्वदेशी को अपने निकटतम परिवेश की सेवा और उपयोग से जोड़कर देखा था। ग्राम स्वराज की उनकी कल्पना ऐसे गांव की थी जो अपनी मूलभूत आवश्यकताओं के लिए आत्मनिर्भर हो और साथ ही आवश्यकता पड़ने पर व्यापक समाज के साथ सहयोग करे।

आज संघ भी स्वदेशी को केवल वस्तुओं की खरीद तक सीमित न रखकर स्थानीय उत्पादन, भारतीय उद्यमों और आत्मनिर्भरता से जोड़ता है। संघ के दस्तावेजों में स्वदेशी को ‘स्व’ के बोध और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने से जोड़ा गया है।

इस दृष्टि से गांधी के स्वदेशी और संघ के स्वदेशी आचरण के बीच समानताओं पर चर्चा की जा सकती है, हालांकि दोनों अवधारणाओं के ऐतिहासिक और वैचारिक संदर्भ अलग-अलग हैं।

पर्यावरण संरक्षण और सादगी

गांधी का जीवन सादगी और सीमित उपभोग के विचार से जुड़ा रहा। प्रकृति के साथ संतुलित जीवन उनकी जीवनशैली और चिंतन का महत्वपूर्ण पक्ष था।

पंच परिवर्तन में पर्यावरण संरक्षण को भी प्रमुख स्थान दिया गया है। जल संरक्षण, प्लास्टिक के उपयोग को कम करना, वृक्षारोपण और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार व्यवहार को सामाजिक परिवर्तन का हिस्सा बनाने पर जोर दिया जाता है। RSS ने अपने दस्तावेजों में पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली और जल संरक्षण जैसे कार्यों को इस आयाम से जोड़ा है।

आज जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय संकट के दौर में सादगीपूर्ण जीवन और जिम्मेदार उपभोग की गांधीवादी अवधारणा पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत है।

परिवार को सामाजिक इकाई मानने की सोच

गांधी के चिंतन में परिवार और समुदाय का भी महत्वपूर्ण स्थान था। भारतीय सामाजिक संरचना में परिवार को व्यक्ति के संस्कार और जिम्मेदारी सीखने की पहली संस्था माना जाता रहा है।

पंच परिवर्तन में कुटुंब प्रबोधन के माध्यम से परिवार के भीतर संवाद, आपसी संबंधों, बुजुर्गों के सम्मान और सांस्कृतिक मूल्यों पर जोर दिया जाता है। संघ भी इसे सामाजिक परिवर्तन के पांच प्रमुख आयामों में शामिल करता है।

बदलते सामाजिक और तकनीकी परिवेश में परिवारों के भीतर संवाद और पीढ़ियों के बीच संबंधों को मजबूत रखना एक व्यापक सामाजिक आवश्यकता के रूप में देखा जा सकता है।

सामाजिक समरसता की चुनौती

महात्मा गांधी ने छुआछूत और सामाजिक भेदभाव के खिलाफ लंबे समय तक अभियान चलाया। उनके लिए सामाजिक समानता स्वतंत्र भारत की महत्वपूर्ण आवश्यकताओं में से एक थी।

पंच परिवर्तन का एक अन्य प्रमुख आयाम सामाजिक समरसता है। संघ अपने कार्यक्रमों में जातिगत भेदभाव को कम करने और समाज में आपसी सहयोग बढ़ाने की बात करता है। 2023 में संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने पंच परिवर्तन की चर्चा करते हुए सामाजिक विभेद के खिलाफ विमर्श और सामाजिक समरसता के लिए निरंतर प्रयास को इसके उद्देश्यों में बताया था।

‘एक कुआं, एक मंदिर, एक श्मशान’ जैसे नारों के माध्यम से सामाजिक समानता की बात संघ से जुड़े अभियानों में कही जाती रही है। गांधी का सामाजिक चिंतन और संघ का समरसता अभियान अपने-अपने ऐतिहासिक संदर्भों में अलग हैं, लेकिन दोनों की चर्चा में सामाजिक भेदभाव को समाप्त करने का प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है।

नागरिक कर्तव्य और जिम्मेदारी

गांधी के सार्वजनिक जीवन में अधिकारों के साथ कर्तव्यों और व्यक्तिगत अनुशासन पर भी जोर दिखाई देता है। उनका मानना था कि समाज में परिवर्तन केवल कानून बनाने से नहीं, बल्कि व्यक्ति के व्यवहार में बदलाव से भी आता है।

पंच परिवर्तन में नागरिक कर्तव्य को पांचवां आयाम बनाया गया है। इसमें कानून का पालन, स्वच्छता, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा और समाज के प्रति जिम्मेदार व्यवहार जैसे विषय शामिल हैं। संघ के आधिकारिक दस्तावेजों में भी इसे सामाजिक परिवर्तन के प्रमुख आधारों में गिना गया है।

समाज के व्यवहार से आता है परिवर्तन

गांधी के राजनीतिक और सामाजिक दर्शन का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह था कि परिवर्तन केवल सत्ता या कानून के माध्यम से नहीं, बल्कि व्यक्ति और समाज के आचरण से भी आता है। पंच परिवर्तन भी व्यक्तिगत और सामाजिक व्यवहार में बदलाव पर जोर देता है।

RSS के अनुसार, पंच परिवर्तन का उद्देश्य इन पांच क्षेत्रों को दैनिक जीवन के व्यवहार में शामिल करना है—सामाजिक समरसता, परिवार के मूल्य, पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी और ‘स्व’ का बोध तथा नागरिक एवं संवैधानिक कर्तव्यों का पालन।

यही कारण है कि गांधी के विचारों और पंच परिवर्तन के बीच समानताओं पर चर्चा करते समय यह समझना जरूरी है कि समान विषयों के बावजूद दोनों की वैचारिक यात्राएं और ऐतिहासिक पृष्ठभूमियां अलग रही हैं।

स्वतंत्रता के बाद आत्मनिर्भरता का सवाल

भारत राजनीतिक स्वतंत्रता हासिल कर चुका है, लेकिन आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर आत्मनिर्भरता की बहस लगातार जारी है। स्थानीय उत्पादन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समानता और नागरिक जिम्मेदारी जैसे प्रश्न आज भी प्रासंगिक हैं।

गांधी का ग्राम स्वराज और स्वदेशी एक ऐतिहासिक संदर्भ में सामने आया था, जबकि पंच परिवर्तन 21वीं सदी के भारत में संघ की वर्तमान सामाजिक कार्ययोजना का हिस्सा है। इसलिए दोनों को पूरी तरह समान मानने के बजाय उनके बीच मौजूद विचारगत समानताओं और भिन्नताओं को समझना अधिक उपयोगी होगा।

आज जब देश स्वतंत्रता की शताब्दी की ओर बढ़ रहा है, तब गांधी के विचारों को केवल स्मरण करने के बजाय उन्हें वर्तमान सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों के संदर्भ में समझना जरूरी है। इसी तरह पंच परिवर्तन को भी उसके घोषित पांच आयामों और उनके सामाजिक प्रभावों के आधार पर देखा जाना चाहिए।

गांधी के स्वदेशी, ग्राम स्वराज, सामाजिक समानता, पर्यावरण और नागरिक जिम्मेदारी जैसे विचारों तथा पंच परिवर्तन के पांच आयामों के बीच संवाद की संभावनाएं निश्चित रूप से मौजूद हैं। लेकिन यह संवाद तभी सार्थक होगा जब इसे नारे या राजनीतिक बहस तक सीमित न रखकर समाज के वास्तविक जीवन, स्थानीय अर्थव्यवस्था, परिवार, पर्यावरण और नागरिक आचरण के स्तर पर परखा जाए।

महात्मा गांधी की 157वीं जयंती पर उनके विचारों को याद करने का सबसे सार्थक तरीका शायद यही है कि हम यह विचार करें कि स्वतंत्र भारत किस दिशा में आगे बढ़ रहा है और आत्मनिर्भर, जिम्मेदार तथा समरस समाज के निर्माण में नागरिक की भूमिका क्या होनी चाहिए।

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