यूपी कांग्रेस में बड़ा फेरबदल: राजेंद्र पाल गौतम के आते ही समाजवादी पार्टी को झटका, हसीब खान और राजेश शुक्ला कांग्रेस में शामिल
उत्तर प्रदेश (2 जुलाई 2026): उत्तर प्रदेश की सियासत में एक बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। कांग्रेस के नवनियुक्त प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम के कार्यभार संभालते ही पार्टी ने पूर्वांचल में अपना राजनीतिक कुनबा मजबूत करना शुरू कर दिया है। इसी कड़ी में समाजवादी पार्टी और फैजाबाद के सांसद अवधेश प्रसाद के बेहद करीबी माने जाने वाले कद्दावर युवा नेता हसीब खान और भावी प्रत्याशी राजेश शुक्ला ने अपने सैकड़ों समर्थकों के साथ कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली है।
इस राजनीतिक घटनाक्रम के बाद सूत्रों का दावा है कि हसीब खान के संपर्क वाले कई अन्य ओबीसी (OBC) और अनुसूचित जाति (SC) समाज के छोटे दल भी जल्द ही कांग्रेस को अपना समर्थन दे सकते हैं, जिससे पूर्वांचल में पार्टी का जनाधार काफी हद तक बढ़ने की उम्मीद है।
संघर्ष से पहचान तक: कौन हैं हसीब खान?
हसीब खान उत्तर प्रदेश की नई राजनीतिक पीढ़ी के उन चुनिंदा चेहरों में शामिल हैं, जिन्होंने बिना किसी राजनीतिक विरासत या बड़े सियासी परिवार के सहारे बेहद कम समय में अपनी एक मजबूत पहचान बनाई है। जनता के बीच लगातार सक्रियता और जमीनी पकड़ ही उनकी सबसे बड़ी ताकत रही है।
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सफर की शुरुआत (2021): हसीब खान ने सक्रिय राजनीति की शुरुआत साल 2021 में जनवादी सोशलिस्ट पार्टी के साथ की थी। उस समय बेहद सीमित दायरे वाली इस पार्टी को उन्होंने अपने मजबूत जनसंपर्क के दम पर पूर्वांचल में एक नई पहचान दिलाई।
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2022 के चुनाव में बड़ी रणनीतिक भूमिका: वर्ष 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी और जनवादी सोशलिस्ट पार्टी के बीच हुए गठबंधन में बलिया की रसड़ा, कुशीनगर की खड्डा और बलरामपुर की उतरौला सीट को गठबंधन के खाते में लाने में हसीब खान की केंद्रीय भूमिका रही। राजनीतिक विशेषज्ञ इसे उनकी बड़ी संगठनात्मक क्षमता के रूप में देखते हैं।
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उतरौला में रचा इतिहास: 2022 के चुनाव में उतरौला विधानसभा सीट से गठबंधन के प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ते हुए हसीब खान को लगभग 65,000 वोट मिले। भले ही वह चुनाव नहीं जीत सके, लेकिन समाजवादी पार्टी के इतिहास में इस सीट पर 65 हजार वोट पाने वाले वे पहले उम्मीदवार बने। चुनाव हारने के बाद भी उन्होंने क्षेत्र नहीं छोड़ा और लगातार जनता के बीच बने रहे।
चुनावी गणित: क्यों 2027 में मजबूत हुई हसीब खान की दावेदारी?
वर्ष 2027 के आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गलियारों में अभी से गुणा-भाग शुरू हो गया है। जानकारों का मानना है कि यदि भविष्य में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का गठबंधन (PDA) बरकरार रहता है या उतरौला सीट कांग्रेस के खाते में आती है, तो हसीब खान यहाँ से सबसे मजबूत और अजेय उम्मीदवार बनकर उभर सकते हैं।
इसके पीछे का गणित बेहद दिलचस्प है:
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2022 में हसीब खान (सपा गठबंधन) को मिले वोट: ~65,000
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2022 में धीरेंद्र प्रताप सिंह (कांग्रेस) को मिले वोट: ~12,944
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संभावित कुल वोट बैंक: यदि इन दोनों वोटों को जोड़ दिया जाए, तो यह आंकड़ा 78,000 के पार पहुंच जाता है, जो उतरौला सीट पर किसी भी विरोधी दल के समीकरण को बिगाड़ने और जीत सुनिश्चित करने के लिए काफी है।
सामाजिक और धार्मिक क्षेत्र में गहरी पैठ
हसीब खान की राजनीतिक पकड़ के अलावा सामाजिक और इस्लामिक धार्मिक गुरुओं के बीच भी उनकी अच्छी साख मानी जाती है। वह किछौछा शरीफ के सज्जादानशीन मोईन मियां (मोईन-ए-मिल्लत), हाशमी मियां, नूरानी मियां के साथ-साथ बिलग्राम शरीफ के सिबली मियां, सैय्यद रिजवान मियां, सुहैल मियां, अजमेर शरीफ के खादिमों और उतरौला के मौलाना मसीहुद्दीन साहब जैसी प्रतिष्ठित हस्तियों के बेहद करीबी माने जाते हैं। इसी वजह से कई सामाजिक संगठन और मुस्लिम समाज का एक बड़ा वर्ग उनके साथ सीधे जुड़ा हुआ है।
वर्तमान में उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष अजय राय और प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम से उनके बेहतरीन संबंधों को देखते हुए कयास लगाए जा रहे हैं कि कांग्रेस आलाकमान जल्द ही उन्हें संगठन में कोई बड़ी और महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंप सकता है।
"देश की शिक्षा व्यवस्था आईसीयू में है" – हसीब खान
कांग्रेस में शामिल होते ही हसीब खान ने केंद्र की मोदी सरकार पर तीखा हमला बोला। देश में लगातार हो रही पेपर लीक की घटनाओं पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहाआज देश की शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह आईसीयू (ICU) में चली गई है। मोदी सरकार के कार्यकाल में अब तक 80 से ज्यादा पेपर लीक की घटनाएं हो चुकी हैं, जिन्होंने देश के करोड़ों होनहार छात्रों का भविष्य अंधकार में धकेल दिया है। इस मानसिक तनाव के कारण कई युवा आत्महत्या करने को मजबूर हुए, लेकिन देश के प्रधानमंत्री ने पीड़ित परिवारों को सांत्वना देना तक जरूरी नहीं समझा। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) पूरी तरह कॉम्प्रोमाइज हो चुकी है, जिससे हमारा पूरा एजुकेशनल स्ट्रक्चर ढह गया है। यह सिर्फ पेपर का लीक होना नहीं, बल्कि इस देश के युवाओं के भविष्य का लीक होना है।"



