मकर संक्रांति और जैन धर्म

Makar Sankranti and Jainism
 
जैन धर्म में मकर संक्रांति  जैन धर्म की मान्यता के अनुसार, मकर संक्रांति के दिन जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ के पुत्र चक्रवर्ती भरत महाराज ने अपने महल से सूर्य के भीतर स्थित जैन मंदिर के दर्शन किए थे। इसी कारण जैन परंपरा में भी मकर संक्रांति का विशेष महत्व है। हालाँकि, जैन धर्म में इस दिन पतंग उड़ाने की परंपरा नहीं है, क्योंकि पतंगबाज़ी में जीव-हिंसा की संभावना रहती है और पतंग काटने की प्रवृत्ति को हिंसात्मक माना जाता है।  पौराणिक और ज्योतिषीय मान्यताएँ  भारतीय पुराणों के अनुसार मकर संक्रांति के दिन सूर्य अपने पुत्र शनि के घर प्रवेश करते हैं, क्योंकि मकर राशि का स्वामी शनि ग्रह है। यद्यपि ज्योतिष में सूर्य और शनि के स्वभाव में सामंजस्य नहीं माना जाता, फिर भी इस अवधि को पिता-पुत्र के संबंधों में निकटता और सौहार्द का प्रतीक माना जाता है।  प्राकृतिक और आध्यात्मिक प्रभाव  सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने से दिन बड़े और रात्रियाँ छोटी होने लगती हैं। इससे प्राणियों में आत्मशुद्धि, संकल्प-शक्ति और चेतना का विकास होता है। किसान अपनी फसलों की कटाई करते हैं और यह पर्व नवचेतना का प्रतीक बन जाता है। मौसम में भी स्पष्ट परिवर्तन दिखाई देता है।  इस दिन सूर्य देव की विशेष उपासना की जाती है। हरिद्वार, काशी, प्रयागराज, गंगासागर जैसे तीर्थों पर श्रद्धालु स्नान-दान कर पुण्य अर्जित करते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार इसी दिन देवी संक्रांति ने राक्षस किंकरासुर का वध किया था।  महाभारत और गंगा अवतरण  महाभारत के अनुसार, भीष्म पितामह को इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त था और उन्होंने देह त्याग के लिए मकर संक्रांति का दिन ही चुना। ऐसी मान्यता है कि इस दिन देह त्याग करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसी दिन माँ गंगा, भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होते हुए बंगाल की खाड़ी में समाहित हुई थीं, जहाँ राजा सगर के साठ हजार पुत्रों की राख का तर्पण किया गया। यह स्थान आज गंगासागर के नाम से प्रसिद्ध है, जहाँ मकर संक्रांति पर विशाल मेला लगता है।  दान-पुण्य और लोक परंपराएँ  मकर संक्रांति को अंधकार के नाश और प्रकाश के आगमन का पर्व माना जाता है। इस दिन दान, पुण्य और धार्मिक अनुष्ठानों का विशेष महत्व है। गुड़, तिल, चावल और खिचड़ी का दान शुभ माना जाता है। हालाँकि जैन परंपरा में पतंगबाज़ी वर्जित है, लेकिन देश के अन्य हिस्सों में यह पर्व पतंगों के रंग-बिरंगे उत्सव के रूप में भी मनाया जाता है।  विभिन्न नाम, एक पर्व  भारत और विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में यह पर्व अलग-अलग नामों से जाना जाता है—  उत्तर प्रदेश व पश्चिम बिहार: खिचड़ी पर्व  तमिलनाडु: पोंगल  बुंदेलखंड (म.प्र.): सकरात  पंजाब: लोहड़ी  कश्मीर: शिशिर संक्रांत  नेपाल: संक्रांति  थाईलैंड: सोंगकर्ण  श्रीलंका: उलावर  निष्कर्ष

(अतिवीर जैन “पराग” — विनायक फीचर्स) जब सूर्य भगवान दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर गमन करते हैं, अर्थात् धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तो उस दिवस को मकर संक्रांति कहा जाता है। जिस प्रकार पृथ्वी पर बारह घंटे का दिन और बारह घंटे की रात होती है, उसी प्रकार देवताओं के लिए छह माह की रात्रि और छह माह का दिन मिलकर एक दिन बनता है। देवताओं की रात्रि के समय सूर्य दक्षिणायन (धनु राशि) में रहते हैं और देवताओं के दिन में सूर्य उत्तरायण (मकर राशि) में प्रवेश करते हैं। इसी कारण इस दिन को मकर संक्रांति कहा जाता है। यह पर्व सूर्य देव की उपासना और आराधना का विशेष दिवस माना जाता है।

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जैन धर्म में मकर संक्रांति

जैन धर्म की मान्यता के अनुसार, मकर संक्रांति के दिन जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ के पुत्र चक्रवर्ती भरत महाराज ने अपने महल से सूर्य के भीतर स्थित जैन मंदिर के दर्शन किए थे। इसी कारण जैन परंपरा में भी मकर संक्रांति का विशेष महत्व है।हालाँकि, जैन धर्म में इस दिन पतंग उड़ाने की परंपरा नहीं है, क्योंकि पतंगबाज़ी में जीव-हिंसा की संभावना रहती है और पतंग काटने की प्रवृत्ति को हिंसात्मक माना जाता है।

पौराणिक और ज्योतिषीय मान्यताएँ

भारतीय पुराणों के अनुसार मकर संक्रांति के दिन सूर्य अपने पुत्र शनि के घर प्रवेश करते हैं, क्योंकि मकर राशि का स्वामी शनि ग्रह है। यद्यपि ज्योतिष में सूर्य और शनि के स्वभाव में सामंजस्य नहीं माना जाता, फिर भी इस अवधि को पिता-पुत्र के संबंधों में निकटता और सौहार्द का प्रतीक माना जाता है।

प्राकृतिक और आध्यात्मिक प्रभाव

सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने से दिन बड़े और रात्रियाँ छोटी होने लगती हैं। इससे प्राणियों में आत्मशुद्धि, संकल्प-शक्ति और चेतना का विकास होता है। किसान अपनी फसलों की कटाई करते हैं और यह पर्व नवचेतना का प्रतीक बन जाता है। मौसम में भी स्पष्ट परिवर्तन दिखाई देता है।

इस दिन सूर्य देव की विशेष उपासना की जाती है। हरिद्वार, काशी, प्रयागराज, गंगासागर जैसे तीर्थों पर श्रद्धालु स्नान-दान कर पुण्य अर्जित करते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार इसी दिन देवी संक्रांति ने राक्षस किंकरासुर का वध किया था।

महाभारत और गंगा अवतरण

महाभारत के अनुसार, भीष्म पितामह को इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त था और उन्होंने देह त्याग के लिए मकर संक्रांति का दिन ही चुना। ऐसी मान्यता है कि इस दिन देह त्याग करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसी दिन माँ गंगा, भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होते हुए बंगाल की खाड़ी में समाहित हुई थीं, जहाँ राजा सगर के साठ हजार पुत्रों की राख का तर्पण किया गया। यह स्थान आज गंगासागर के नाम से प्रसिद्ध है, जहाँ मकर संक्रांति पर विशाल मेला लगता है।

दान-पुण्य और लोक परंपराएँ

मकर संक्रांति को अंधकार के नाश और प्रकाश के आगमन का पर्व माना जाता है। इस दिन दान, पुण्य और धार्मिक अनुष्ठानों का विशेष महत्व है। गुड़, तिल, चावल और खिचड़ी का दान शुभ माना जाता है। हालाँकि जैन परंपरा में पतंगबाज़ी वर्जित है, लेकिन देश के अन्य हिस्सों में यह पर्व पतंगों के रंग-बिरंगे उत्सव के रूप में भी मनाया जाता है।

विभिन्न नाम, एक पर्व

भारत और विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में यह पर्व अलग-अलग नामों से जाना जाता है—

  • उत्तर प्रदेश व पश्चिम बिहार: खिचड़ी पर्व

  • तमिलनाडु: पोंगल

  • बुंदेलखंड (म.प्र.): सकरात

  • पंजाब: लोहड़ी

  • कश्मीर: शिशिर संक्रांत

  • नेपाल: संक्रांति

  • थाईलैंड: सोंगकर्ण

  • श्रीलंका: उलावर

निष्कर्ष

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