मल्लखंभ: भारत का प्राचीन और कठिनतम खेल, जो अब सरहदों को पार कर दुनिया पर छा रहा है
(कुमार कृष्णन -विनायक फीचर्स) (20 जून 2026): जब बात शारीरिक शक्ति, चरम लचीलेपन, संतुलन और मानसिक एकाग्रता के संगम की आती है, तो भारत का पारंपरिक खेल मल्लखंभ दुनिया के सबसे कठिनतम और विस्मयकारी खेलों में शीर्ष पर खड़ा नजर आता है। हवा में लहराती एक अदद रस्सी या लकड़ी के सीधे खंभे पर गुरुत्वाकर्षण को चुनौती देते हुए योग और जिम्नास्टिक के जटिल आसनों को प्रदर्शित करना ही मल्लखंभ की असल पहचान है। यह खेल केवल शारीरिक कसरत नहीं, बल्कि सांसों के नियंत्रण और मानसिक दृढ़ता की एक कठोर साधना है।
रामायण से लेकर चालुक्य राजवंश तक: एक समृद्ध इतिहास
मल्लखंभ का इतिहास सदियों पुराना है। भारत के इस गौरवशाली पारंपरिक खेल का प्राचीन वर्णन पवित्र ग्रंथ रामायण में भी मिलता है। इसके बाद, 12वीं शताब्दी की शुरुआत में चालुक्य वंश के राजा सोमेश्वर तृतीय द्वारा रचित प्रसिद्ध ग्रंथ 'मानसोलस' में इसका पहला प्रत्यक्ष लिखित विवरण प्राप्त होता है। भारत की यात्रा पर आए बौद्ध चीनी तीर्थयात्रियों ने भी अपने यात्रा वृत्तांतों में इस अनूठी विद्या का विशेष उल्लेख किया है।
पेशवा काल में पुनरुद्धार और रानी लक्ष्मीबाई का संबंध
12वीं सदी के बाद मल्लखंभ की गति कुछ सदियों तक धीमी रही, लेकिन 17वीं से 19वीं सदी के बीच इसे नया जीवन मिला।
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आद्य गुरु बालमभट्ट दादा देवधर: पेशवा बाजीराव द्वितीय के दरबार के जाने-माने कुश्तीगीर और कसरतपटू बालमभट्ट दादा देवधर को मल्लखंभ का आधुनिक जन्मदाता माना जाता है। उन्होंने पेशवा सेना को शारीरिक रूप से वज्र बनाने के लिए इस मार्शल आर्ट कला को पुनर्जीवित किया। किंवदंती है कि उन्होंने जंगल में बंदरों की फुर्ती देखकर भगवान हनुमान की कृपा से इस विद्या को साधा और हैदराबाद के निजाम के दिग्गज पहलवानों (गुलाम और अली) को हराकर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध की।
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झांसी की रानी से नाता: मराठा साम्राज्य की महान वीरांगना झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने भी अपने बचपन में नाना साहब और तात्या टोपे के साथ मिलकर गुरु बालमभट्ट से ही मल्लखंभ की कठिन शिक्षा दीक्षा ली थी।
मल्लखंभ के तीन मुख्य प्रकार
वर्तमान में व्यावसायिक और पारंपरिक स्तर पर मल्लखंभ के मुख्य रूप से तीन प्रकार प्रचलित हैं:
| प्रकार | विशेषता |
| 1. पोल मल्लखंभ (Pole Mallakhamb) | यह सबसे पारंपरिक रूप है, जिसमें जमीन पर गड़े 2.6 मीटर ऊंचे लकड़ी के सीधे खंभे पर करतब दिखाए जाते हैं। |
| 2. रोप मल्लखंभ (Rope Mallakhamb) | इसमें खिलाड़ी हवा में लटकी हुई एक रस्सी के सहारे अपना संतुलन और अद्भुत कलाबाजियां प्रदर्शित करते हैं। |
| 3. हैंगिंग मल्लखंभ (Hanging Mallakhamb) | यह जमीन से थोड़ा ऊपर लटका हुआ झूलता हुआ खंभा होता है, जो चारों तरफ घूम सकता है और इस पर संतुलन बनाना बेहद कठिन होता है। |
बर्लिन ओलंपिक 1936 से 'वर्ल्ड चैंपियनशिप' तक का सफर
वैश्विक मंच पर मल्लखंभ ने पहली बार बर्लिन 1936 के ओलंपिक के दौरान दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा था, जहाँ इसे एक प्रदर्शन खेल के रूप में शामिल किया गया था। तब से लेकर आज तक इस खेल ने लंबा सफर तय किया है:
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प्रथम विश्व चैंपियनशिप (2019): मुंबई में आयोजित पहली मल्लखंभ वर्ल्ड चैंपियनशिप में दुनिया के 17 देशों के एथलीटों ने हिस्सा लिया। इटली, जर्मनी, अमेरिका और जापान जैसे देशों ने भारतीय खिलाड़ियों को कड़ी टक्कर दी।
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वैश्विक विस्तार: आज जर्मनी, अमेरिका, चेक गणराज्य और जापान सहित दुनिया के 26 से अधिक देशों में मल्लखंभ पूरी शिद्दत के साथ खेला जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने 'मन की बात' कार्यक्रम में अमेरिका और जापान को मल्लखंभ उपकरण भेजने में भारत सरकार की मदद की सराहना की थी।
भारत में गढ़: मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार और झारखंड की भूमिका
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मध्य प्रदेश: यह मल्लखंभ का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है। मध्य प्रदेश सरकार ने साल 2013 में इसे अपना 'राज्य खेल' घोषित किया था, और उज्जैन को इस खेल का मुख्य तीर्थ माना जाता है।
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महाराष्ट्र: मुंबई का शिवाजी पार्क, पुणे और अमरावती का हनुमान व्यायाम प्रसारक मंडल इस खेल के ऐतिहासिक स्तंभ हैं।
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बिहार: भागलपुर की 'श्री मारवाड़ी व्यायामशाला' ने इस खेल को सहेजने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। पूर्व में ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी स्तर पर भागलपुर विश्वविद्यालय के पवन कुमार पोद्दार, जगदीश प्रसाद शर्मा और रघुनंदन भिवानीवाला जैसे खिलाड़ियों ने पदक जीतकर राज्य का नाम रोशन किया था, जिसे अब बिहार राज्य खेल प्राधिकरण दोबारा पुनर्जीवित कर रहा है।
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झारखंड: झारखंड राज्य मल्लखंभ एसोसिएशन के महासचिव डॉ. अजय झा हजारीबाग और विनोबा भावे विश्वविद्यालय में 'फिट इंडिया' के तहत युवाओं को बिना किसी फीस के इस कला में पारंगत कर रहे हैं।
"शरीर ही आपका साधन है" — पद्मश्री उदय देशपांडे
वर्ष 2024 में पद्मश्री सम्मान से नवाजे गए मल्लखंभ के प्रख्यात गुरु उदय देशपांडे कहते हैं, "मल्लखंभ में शरीर ही आपका एकमात्र साधन होता है। इसमें खिलाड़ी को गुरुत्वाकर्षण के विपरीत खुद को ऊपर खींचना पड़ता है, जो बेहद दर्दनाक और कठिन है। इसमें शरीर की उन मांसपेशियों (जैसे पैर की उंगलियां, जांघें और कोर) का इस्तेमाल होता है जिनका सामान्यतः उपयोग नहीं होता।" देशपांडे ने हाल ही में अमेरिका में 35 से अधिक वर्कशॉप आयोजित कर इस खेल को अंतरराष्ट्रीय पहचान दी है।
भविष्य की राह: लॉस एंजिल्स ओलंपिक 2028 पर नजरें
साल 2022 में गुजरात में आयोजित 36वें राष्ट्रीय खेलों (National Games) में मल्लखंभ को आधिकारिक तौर पर शामिल किया गया, जहाँ वडोदरा के महज 10 वर्षीय शौर्यजीत ने सबसे कम उम्र के खिलाड़ी के रूप में सुर्खियां बटोरीं। अब मल्लखंभ फेडरेशन और खिलाड़ियों का अगला बड़ा लक्ष्य 2028 के लॉस एंजिल्स ओलंपिक में इसे एक प्रदर्शन खेल (Demonstration Sport) के रूप में स्थापित करना है। भारतीय जड़ों से निकला यह खेल साबित कर रहा है कि इसमें हासिल की गई महारत जीवन के अन्य सभी खेलों और मोर्चों पर सफलता का मार्ग प्रशस्त करती है।

