बालाघाट की बैगा बस्तियों में कुपोषण का संकट, योजनाओं की जमीनी पहुंच पर उठे सवाल
अगस्त 2026 में बिरसा विकासखंड के कोण्डेकसा, बोंदारी, मछुल्दा, कोरका और आसपास के बैगा बहुल गांवों में बुखार तथा अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के बाद बच्चों की मौत की खबर सामने आई। सरकारी स्तर पर मृत बच्चों की संख्या आठ बताई गई है, जबकि नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंगार ने 19 बच्चों की मौत का दावा किया है। ऐसे में वास्तविक संख्या और मौतों के कारणों की पुष्टि के लिए स्वतंत्र चिकित्सकीय जांच बेहद जरूरी हो जाती है।
कुछ रिपोर्टों में बुखार, शरीर पर चकत्ते और कुछ मामलों में किडनी संबंधी गंभीर लक्षणों का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि, इन मौतों को केवल किसी एक बीमारी अथवा संभावित संक्रमण से जोड़कर देखना पर्याप्त नहीं होगा। यदि बच्चों की पोषण स्थिति पहले से कमजोर हो, एनीमिया हो या रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो तो सामान्य संक्रमण भी गंभीर रूप ले सकता है।
बैगा बच्चों में कुपोषण की पुरानी समस्या
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (2019-21) के अनुसार मध्यप्रदेश में पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों में बौनापन, दुर्बलता और कम वजन की समस्या उल्लेखनीय स्तर पर मौजूद है। अनुसूचित जनजाति के बच्चों में भी पोषण संबंधी चुनौतियां गंभीर हैं। राष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि आदिवासी बच्चों में कुपोषण की स्थिति सामान्य आबादी की तुलना में अधिक चिंताजनक हो सकती है।
बालाघाट के बैगा समुदाय पर किए गए अध्ययनों ने भी इस समस्या की गंभीरता की ओर संकेत किया है। बैरहर क्षेत्र में बैगा समुदाय के परिवारों पर किए गए एक सामुदायिक अध्ययन में पूर्व-स्कूली बच्चों में दुर्बलता का स्तर काफी अधिक पाया गया था। वयस्कों में भी दीर्घकालिक ऊर्जा की कमी और भोजन में पोषक विविधता की कमी सामने आई थी।
इससे संकेत मिलता है कि बैगा समुदाय में कुपोषण अचानक पैदा हुई समस्या नहीं है। इसके पीछे गरीबी, सीमित रोजगार, खाद्य विविधता की कमी, स्वास्थ्य सेवाओं तक कठिन पहुंच और सरकारी योजनाओं के सीमित उपयोग जैसे कई कारण जुड़े हुए हैं।
सिर्फ अनाज से दूर नहीं होगा कुपोषण
कुपोषण को केवल भोजन की मात्रा से जोड़कर देखना समस्या को अधूरा समझना होगा। किसी परिवार को पर्याप्त चावल, मक्का या अन्य अनाज मिल जाए, फिर भी यदि उसके भोजन में दाल, दूध, अंडा, फल, हरी सब्जियां, तेल और पर्याप्त प्रोटीन की कमी है तो शरीर को जरूरी आयरन, विटामिन और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल पाते।
यही कारण है कि बैगा समुदाय में पोषण सुधार के लिए केवल राशन या आर्थिक सहायता पर्याप्त नहीं मानी जा सकती। बच्चे की पोषण स्थिति का संबंध परिवार की आय, मातृ स्वास्थ्य, स्वच्छ पानी, स्वच्छता, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और स्थानीय खाद्य उपलब्धता से भी जुड़ा है।
योजनाओं की कमी नहीं, क्रियान्वयन बड़ी चुनौती
मध्यप्रदेश में बैगा, भारिया और सहरिया जैसे विशेष पिछड़ी जनजातीय समुदायों के लिए आहार अनुदान योजना संचालित है। इसके अलावा आंगनवाड़ी और आईसीडीएस, पोषण अभियान, पोषण पुनर्वास केंद्र, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, टीकाकरण, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाएं तथा आयरन-फोलिक एसिड जैसी व्यवस्थाएं भी मौजूद हैं।
पीएम-जनमन को भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण पहल माना जाता है। इसका उद्देश्य पीवीटीजी समुदायों तक स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास, पेयजल, सड़क, बिजली, आजीविका और अन्य बुनियादी सुविधाएं पहुंचाना है। बालाघाट भी इस अभियान के दायरे में आने वाले जिलों में शामिल है।
लेकिन बालाघाट की स्थिति यह सवाल उठाती है कि क्या इन योजनाओं का वास्तविक लाभ दूरस्थ बैगा बस्तियों तक नियमित और प्रभावी तरीके से पहुंच रहा है।
यदि किसी गांव में बच्चा गंभीर कुपोषण से जूझ रहा हो, परिवार के पास पर्याप्त पौष्टिक भोजन न हो, सुरक्षित पेयजल उपलब्ध न हो, स्वास्थ्य केंद्र दूर हो और बीमारी के समय अस्पताल तक पहुंचने में लंबा समय लगे, तो केवल किसी एक योजना की मौजूदगी समस्या का समाधान नहीं कर सकती।
बाल मृत्यु की स्वतंत्र जांच जरूरी
मौजूदा घटनाओं के बाद केवल स्वास्थ्य शिविर आयोजित करना पर्याप्त नहीं होगा। बैगा बहुल गांवों में पिछले कुछ महीनों के दौरान हुई बाल मृत्यु की स्वतंत्र चिकित्सकीय समीक्षा की जानी चाहिए।
जांच में यह देखा जाना चाहिए कि—
- बच्चों की मृत्यु का वास्तविक चिकित्सकीय कारण क्या था?
- बीमारी कितने समय से थी और उपचार कहां कराया गया?
- अस्पताल तक पहुंचने में कितना समय लगा?
- बच्चों की पोषण एवं एनीमिया की स्थिति क्या थी?
- टीकाकरण पूरा हुआ था या नहीं?
- आंगनवाड़ी और स्वास्थ्य सेवाएं कितनी नियमित थीं?
- परिवारों को पौष्टिक भोजन और सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता कैसी थी?
इसके साथ प्रत्येक बैगा बस्ती में नियमित बाल स्वास्थ्य एवं पोषण निगरानी व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए। इसमें वजन और ऊंचाई के साथ एनीमिया, गंभीर कुपोषण, बुखार, संक्रमण, टीकाकरण, स्वच्छता, भोजन की विविधता और स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंच जैसे पहलुओं की भी निगरानी हो।
योजनाओं का ग्राम स्तर पर सामाजिक ऑडिट हो
सरकार के सामने अब केवल नई योजना या अतिरिक्त बजट की घोषणा से अधिक महत्वपूर्ण सवाल मौजूदा योजनाओं की प्रभावी डिलीवरी का है। सरकार को सार्वजनिक करना चाहिए कि बालाघाट के बैगा परिवारों में आहार अनुदान के कितने पात्र लाभार्थियों को नियमित लाभ मिल रहा है और पीएम-जनमन के तहत किन गांवों में स्वास्थ्य, आवास, सड़क, पेयजल और आजीविका संबंधी काम पूरे हुए हैं।
आंगनवाड़ी केंद्रों पर मिलने वाले पोषण आहार की गुणवत्ता और नियमितता का भी सामाजिक ऑडिट कराया जाना चाहिए। योजनाओं की सफलता का पैमाना केवल खर्च की गई राशि या लाभार्थियों की संख्या नहीं होना चाहिए। असली सवाल यह होना चाहिए कि बैगा बस्ती का बच्चा स्वस्थ है या नहीं।
विभागों के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत
बैगा परिवार की समस्याएं किसी एक विभाग तक सीमित नहीं हैं। एक ही परिवार में मां कुपोषित हो सकती है, बच्चा एनीमिया से पीड़ित हो सकता है, घर में सुरक्षित पानी का अभाव हो सकता है और परिवार मौसमी रोजगार पर निर्भर हो सकता है। इसलिए स्वास्थ्य, महिला एवं बाल विकास, जनजातीय कार्य, खाद्य, पंचायत, ग्रामीण विकास और जल विभागों को मिलकर ग्राम स्तर पर साझा कार्ययोजना तैयार करने की जरूरत है।
हर बैगा बस्ती में परिवारवार स्वास्थ्य-पोषण रिकॉर्ड, गंभीर कुपोषित बच्चों की नियमित निगरानी और जरूरत पड़ने पर मोबाइल मेडिकल यूनिट की व्यवस्था उपयोगी हो सकती है। स्थानीय परिस्थितियों और भाषा को समझने वाले स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की उपलब्धता भी स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बढ़ा सकती है।
योजनाओं से आगे दिखनी चाहिए जमीनी तस्वीर
बालाघाट की बैगा बस्तियों से सामने आई घटनाएं सरकार के लिए एक गंभीर चेतावनी हैं। प्रदेश में योजनाओं और संसाधनों की कमी नहीं है, लेकिन यदि दूरस्थ आदिवासी बस्तियों में बच्चे कुपोषण, संक्रमण और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं तो समस्या योजना के अभाव से ज्यादा उसके जमीनी क्रियान्वयन की है।
फिलहाल मौतों की संख्या और उनके कारणों को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं, इसलिए अंतिम निष्कर्ष स्वतंत्र चिकित्सकीय जांच के बाद ही निकाला जाना चाहिए। साथ ही राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर बाल मृत्यु, कुपोषण और स्वास्थ्य सुविधाओं की वास्तविक स्थिति का तथ्यात्मक मूल्यांकन आवश्यक है।
आदिवासी विकास की वास्तविक सफलता योजनाओं की लंबी सूची में नहीं, बल्कि इस बात में दिखाई देगी कि बैगा बस्तियों के बच्चों को स्वस्थ, सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन मिल रहा है या नहीं। अगस्त 2026 की घटनाएं इसी बुनियादी सवाल को सरकार और प्रशासन के सामने मजबूती से रखती हैं।

