मानस पुत्र’ संजीव द्विवेदी ने अटल विचारधारा और विश्व बंधुत्व को साहित्य से दिया नया आयाम
चित्रकूट/लखनऊ। भारतीय दर्शन और वेदांत की परंपरा सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों, नीतियों और जीवन-दृष्टि से समृद्ध रही है। भारत की धरती सदियों से ऋषियों, मनीषियों और वैदिक चिंतकों के ज्ञान एवं अनुसंधान की भूमि रही है। इसी परंपरा में ‘मानस पुत्र’ जैसी अवधारणाएं भारतीय सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चिंतन में विशेष महत्व रखती हैं।
इसी वैचारिक परंपरा से जुड़े संजीव द्विवेदी अपने साहित्यिक और सामाजिक कार्यों के माध्यम से पूर्व प्रधानमंत्री एवं प्रखर राजनेता अटल बिहारी वाजपेयी के विचारों, आदर्शों और विश्व बंधुत्व की भावना को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। पेशे से अधिवक्ता श्री द्विवेदी माननीय उच्च न्यायालय, लखनऊ में विधि व्यवसाय से जुड़े हैं।
संजीव द्विवेदी की पहचान ‘मानस पुत्र’ की अवधारणा से भी जुड़ी हुई है। वे अटल बिहारी वाजपेयी के विचारों में निहित राष्ट्रवाद, मानवीय संवेदना, लोकतांत्रिक मूल्यों, त्याग और विश्व बंधुत्व को भारतीय वैदिक परंपरा के संदर्भ में देखते हैं। इसी विचारधारा को मूर्त रूप देने के उद्देश्य से वे चित्रकूट के कामदगिरि क्षेत्र में ‘अटल विश्व बंधुत्वेश्वरम् धाम’ की संकल्पना से भी जुड़े हैं। इस अवधारणा का भाव ‘दक्षिण में रामेश्वरम् और उत्तर में बंधुत्वेश्वरम्’ के माध्यम से विश्व बंधुत्व और मानवीय एकता के संदेश को स्थापित करना है।
श्री द्विवेदी का मानना है कि प्रत्येक प्रतिभा और सामर्थ्य मनुष्य को किसी बड़े उद्देश्य के लिए प्राप्त होता है। इसी सोच के साथ वे साहित्य, संस्कृति और वैचारिक कार्यों के माध्यम से अटल बिहारी वाजपेयी की विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए प्रयासरत हैं।
उनकी साहित्यिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव अटल बिहारी वाजपेयी के व्यक्तित्व और विचारों पर आधारित अंतरराष्ट्रीय प्रबंध काव्य ‘दृष्टि अटल’ है। यह कृति वर्चुअस प्रकाशन से प्रकाशित हो चुकी है और ऑनलाइन मंच पर पाठकों के लिए उपलब्ध है। इस काव्य-कृति के माध्यम से अटल जी के व्यक्तित्व, उनकी राजनीतिक दृष्टि, राष्ट्र के प्रति समर्पण तथा विश्व बंधुत्व की भावना को साहित्यिक स्वर देने का प्रयास किया गया है।
संजीव द्विवेदी की अवधारणा में भारतीय वैदिक और पौराणिक परंपराएं केवल अतीत की स्मृतियां नहीं हैं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए भी मार्गदर्शक सिद्धांत हैं। वे इन परंपराओं को आधुनिक सामाजिक सरोकारों और मानव कल्याण की भावना से जोड़ने पर बल देते हैं।
‘मानस पुत्र’ की अवधारणा को व्यापक साहित्यिक और सांस्कृतिक संदर्भ देने का उनका प्रयास भी इसी दिशा का हिस्सा है। उनके अनुसार भारतीय चिंतन की मूल भावना मानव मात्र के कल्याण, सह-अस्तित्व, त्याग और विश्व बंधुत्व में निहित है। अटल बिहारी वाजपेयी का सार्वजनिक जीवन भी इसी मानवीय दृष्टि, संवाद और राष्ट्रीय प्रतिबद्धता का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है।
श्री द्विवेदी अपने लेखन और सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से अटल जी के अधूरे सपनों को भारतीय वैदिक मूल्यों और मानवीय दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ाने के संकल्प पर कार्य कर रहे हैं। उनका प्रयास है कि साहित्य और संस्कृति के माध्यम से राष्ट्रवाद के साथ विश्व बंधुत्व, भारतीय ज्ञान परंपरा और मानव कल्याण का संदेश व्यापक स्तर तक पहुंचे।
उनकी यह वैचारिक और साहित्यिक पहल भारतीय परंपरा, आधुनिक चिंतन तथा अटल बिहारी वाजपेयी की विचार विरासत के बीच संवाद स्थापित करने का प्रयास है।
