Manoura Jagannath Yatra: जहां वचन निभाने साक्षात पुरी से विदिशा के 'मानौरा' आते हैं भगवान जगदीश, बेहद अनोखी है 200 साल पुरानी यह परंपरा
Lord Jagannath Yatra Manoura Vidisha: आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष द्वितीया को जब उड़ीसा के पुरी में 'जय जगन्नाथ' के उद्घोष के साथ महाप्रभु की विश्वप्रसिद्ध रथयात्रा शुरू होती है, ठीक उसी समय मध्य प्रदेश के विदिशा जिले के एक छोटे से गांव मानौरा में भक्त सांसें थामे एक अलौकिक चमत्कार की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं। मानौरा की यह रथयात्रा देश के अन्य सभी जगन्नाथ धामों से बिल्कुल जुदा है। परंपरा के अनुसार, यहाँ भगवान का रथ तब तक एक इंच भी आगे नहीं बढ़ता, जब तक कि पुरी में भगवान जगन्नाथ के रथ के पहिए थम नहीं जाते।
पिछले लगभग 200 वर्षों से चली आ रही यह दिव्य परंपरा आज भी अटूट है। प्राचीन समय में जब संचार के कोई साधन (जैसे फोन या इंटरनेट) नहीं थे, तब भी यहां के पूर्वजों को आध्यात्मिक रूप से यह आभास हो जाता था कि पुरी में रथ रुक चुका है और अब भगवान मानौरा पधार चुके हैं।
स्वयंभू विग्रह और भक्त पद्मावती के वचन की पौराणिक कथा
मानौरा गांव में भगवान जगन्नाथ को अत्यंत लाड-प्यार से 'भगवान जगदीश' पुकारा जाता है। यहाँ स्थापित भगवान जगदीश, भ्राता बलभद्र और बहन सुभद्रा की चंदन से निर्मित मूर्तियां स्वयंभू (स्वयं प्रकट) मानी जाती हैं। पुरी धाम की ही तर्ज पर यहाँ भी महाप्रभु को मीठे भात (अटका) का विशेष भोग लगाया जाता है।
इस अनूठी परंपरा के पीछे एक परम भक्त की अटूट आस्था की कहानी छिपी है:वर्षों पहले मानौरा के तरफदार मानिकचंद रघुवंशी और उनकी धर्मपत्नी पद्मावती निसंतान थे। संतान प्राप्ति की मन्नत और भगवान के प्रति अगाध श्रद्धा के कारण दोनों ने मानौरा से पुरी तक की अत्यंत कठिन दंडवत यात्रा शुरू की।
घने जंगलों, पत्थरों और कांटों भरे रास्तों पर रेंगते हुए जब उनका शरीर पूरी तरह लहूलुहान हो गया, तब उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर महाप्रभु जगन्नाथ ने उन्हें साक्षात दर्शन दिए। भगवान ने उनसे वापस मानौरा लौटने को कहा और वचन दिया कि वे हर वर्ष आषाढ़ दूज पर स्वयं मानौरा आकर उन्हें दर्शन देंगे। उसी समय मानौरा में यह तीनों दिव्य विग्रह प्रकट हुए। मान्यता है कि आज भी भगवान अपना वही वचन निभाने पुरी से मानौरा आते हैं।
चमत्कार: रथयात्रा के दिन अपने आप खुल जाते हैं मंदिर के पट
मानौरा के इस मंदिर से कई चमत्कारिक मान्यताएं जुड़ी हैं। रथयात्रा की पूर्व संध्या पर मंदिर के गर्भगृह के पट पूरी तरह बंद कर दिए जाते हैं, लेकिन अगले दिन सुबह बिना किसी मानवीय प्रयास के पट अपने आप खुले मिलते हैं।
इतना ही नहीं, जैसे ही विग्रहों को रथ पर विराजमान किया जाता है, रथ में एक हल्का सा कंपन महसूस होता है या वह स्वयं थोड़ा आगे लुढ़क जाता है। जनश्रुति है कि ठीक इसी समय पुरी धाम में पुजारियों द्वारा यह घोषणा की जाती है कि— "भगवान अब मानौरा पधार चुके हैं।" इस दिव्य दृश्य और चमत्कार के साक्षी बनने के लिए प्रतिवर्ष मानौरा में लाखों श्रद्धालुओं का हुजूम उमड़ता है और पूरा क्षेत्र 'जय जगदीश' के नारों से गुंजायमान हो उठता है। यहाँ आज भी ग्रामीण एक-दूसरे का अभिवादन "राम-राम" के बजाय "जय जगदीश" कहकर करते हैं।
कीचड़ और पत्थरों की परवाह किए बिना नंगे पैर दौड़ती है श्रद्धा
आषाढ़ के महीने में जब बारिश के कारण ग्रामीण रास्ते कीचड़, कंकड़ों और पत्थरों से भर जाते हैं, तब भी भक्तों की आस्था में कोई कमी नहीं आती। आसपास के सैकड़ों गाँवों से श्रद्धालु नंगे पैर, नाचते-गाते या भूमि पर दंडवत प्रणाम करते हुए मुख्य मंदिर तक पहुँचते हैं। मन्नत पूरी होने पर भगवान को मीठे भात (अटका) का महाभोग लगाया जाता है।
पुरी के बाद विदिशा के मानौरा में निकलने वाली यह रथयात्रा महज एक धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह सदियों पुराने एक ईश्वरीय वचन की निरंतरता और अटूट मानवीय विश्वास की जीवंत गवाही है, जहाँ आस्था के सामने समय, दूरी और विज्ञान सब छोटे पड़ जाते हैं।
