हाशिये के शब्द’ में समाज और जीवन के अनकहे पहलुओं का संवेदनशील चित्रण
विवेक रंजन श्रीवास्तव का ललित निबंध संग्रह समकालीन जीवन, संस्कृति और मानवीय अंतर्विरोधों पर करता है सार्थक विमर्श
(अंजनी सक्सेना – विभूति फीचर्स)
विवेक रंजन श्रीवास्तव की सद्यः प्रकाशित कृति ‘हाशिये के शब्द’ समकालीन जीवन, समाज, संस्कृति और मानवीय अंतर्विरोधों पर केंद्रित एक महत्वपूर्ण ललित निबंध संग्रह है। पुस्तक का शीर्षक ही इसकी वैचारिक दिशा स्पष्ट करता है। लेखक उन विषयों, विचारों और संवेदनाओं को विमर्श के केंद्र में लाने का प्रयास करते हैं, जिन्हें अक्सर हमारी सामाजिक दृष्टि हाशिये पर छोड़ देती है।
लेखक ने इस संग्रह में शब्दों की बुनावट को एक विशिष्ट शिल्प के रूप में साधने का प्रयास किया है। उनकी दृष्टि में ललित निबंध महज साहित्यिक विधा नहीं, बल्कि पाठक के साथ आत्मीय और मौन संवाद का माध्यम है। यही वजह है कि इन निबंधों में दार्शनिक प्रश्नों से लेकर चाय की प्याली और पुरानी स्मृतियों तक के बहाने विचारों की नई दुनिया खुलती है। अतीत की गलियों को वर्तमान के नजरिये से देखने का उनका अंदाज पाठक को सोचने के लिए प्रेरित करता है।
विषयों की विविधता है पुस्तक की खासियत
पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता इसकी विषय-विविधता है। धर्म के निहितार्थ, लोकतंत्र और भारतीय ज्ञान-परंपरा, इरादे बनाम बहाने, स्व का बोध, सर्वनाम से संज्ञा की यात्रा, नाक, कविता, भाषा, प्रकृति और पर्यावरण सहित पच्चीस से अधिक विषयों पर लेखक ने अपने विचार प्रस्तुत किए हैं।
धर्म पर चिंतन करते हुए लेखक मंदिर की घंटियों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि भूखे बच्चे, श्रमिक और वंचित मनुष्य की पीड़ा को धर्म की वास्तविक कसौटी के रूप में देखते हैं। ‘इरादे बनाम बहाने’ जैसे निबंध में नए वर्ष के संकल्पों के बहाने मनुष्य की आत्म-प्रवंचना की प्रवृत्ति को उजागर किया गया है। वहीं ‘लोकतंत्र और भारतीय ज्ञान-परंपरा’ में सभा, समिति और बौद्ध संघ की चर्चा के माध्यम से लेखक लोकतांत्रिक मूल्यों की ऐतिहासिक जड़ों तक पहुंचते हैं।
रोजमर्रा के शब्दों में छिपे गहरे अर्थ
भाषा और दैनिक जीवन से जुड़े निबंध संग्रह के विशेष आकर्षण हैं। ‘मैं, तुम, वह, हम’ जैसे सामान्य सर्वनामों के माध्यम से संबंधों के सूक्ष्म अर्थों को खोलना और ‘नाक’ जैसे साधारण विषय को सामाजिक प्रतिष्ठा तथा आत्मसम्मान के प्रतीक के रूप में देखना लेखक की सूक्ष्म दृष्टि को दर्शाता है।
प्रकृति और पर्यावरण से जुड़े निबंधों में रासायनिक खाद, गिरते भूजल स्तर और नदियों के प्रदूषण को लेकर व्यक्त चिंता केवल जानकारी देने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पाठक में एक जागरूक नागरिक के रूप में अपनी जिम्मेदारी समझने का भाव भी पैदा करती है।
सहज भाषा और विचारोत्तेजक शैली
विवेक रंजन श्रीवास्तव की भाषा सहज, प्रवाहपूर्ण और विचारोत्तेजक है। उनकी लेखन शैली में हजारी प्रसाद द्विवेदी की सांस्कृतिक वैभव वाली परंपरा और विद्यानिवास मिश्र के लोक-स्पर्श के बीच संतुलन दिखाई देता है। जटिल विषयों को सामान्य पाठक तक सरलता से पहुंचाने का उनका प्रयास सफल रहा है।
हालांकि, कुछ स्थानों पर विचारों का विस्तार अपेक्षाकृत अधिक महसूस होता है, जहां लेखन में और कसाव की गुंजाइश थी। इसके बावजूद पुस्तक की समग्र पठनीयता प्रभावित नहीं होती।
ललित निबंध विधा में सार्थक हस्तक्षेप
आज के समय में जब ललित निबंध अपेक्षाकृत कम लिखे जा रहे हैं, ‘हाशिये के शब्द’ एक सजग और सार्थक साहित्यिक हस्तक्षेप के रूप में सामने आती है। यह कृति शोर मचाने के बजाय विचारों के माध्यम से पाठक के भीतर संवाद शुरू करती है। यह उन पाठकों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जो साहित्य में केवल फूलों की सुगंध नहीं, बल्कि उस फूल के नीचे की मिट्टी में सने हाथों को भी देखना चाहते हैं।
कृति हाशिये पर खड़े मनुष्य और उसकी संवेदनाओं को केंद्र में लाने का ईमानदार प्रयास करती है। पठनीयता, वैचारिक स्पष्टता और भाषा-माधुर्य के कारण यह पुस्तक सुधी पाठकों की साहित्यिक मेज पर एक आत्मीय मित्र की तरह स्थान बना सकती है। हिंदी साहित्य जगत में यह कृति स्वागत योग्य है।
(विभूति फीचर्स)
