मोहल्ले में बाजार या बाजार में मोहल्ला
(सुधाकर आशावादी - विभूति फीचर्स)
जब किसी के घर में आग की लपटें उठती हैं तो पड़ोसी अक्सर तब तक तमाशबीन बने रहते हैं, जब तक उसकी आंच उनके अपने घर की चौखट तक नहीं पहुंच जाती। जमाने का दस्तूर कुछ ऐसा ही है। दूसरों के संकट को देखकर हम आश्वस्त रहते हैं कि खतरा फिलहाल हमारे हिस्से में नहीं है। लेकिन जब वही संकट दरवाजे पर दस्तक देता है, तब समझ में आता है कि आग की दिशा केवल एक घर तक सीमित नहीं रहती।
करीब चार दशक पहले किसी व्यक्ति ने अपने मकान के एक हिस्से में दुकान खोल ली। सोच यही रही होगी कि घर बैठे छोटा-मोटा कारोबार कर लिया जाए और परिवार की रोजी-रोटी चलती रहे। पड़ोसियों ने भी देखा तो उन्होंने अपने-अपने मकानों में दुकानें खोलनी शुरू कर दीं। धीरे-धीरे एक-दो दुकानों से शुरू हुआ सिलसिला बढ़ता गया और देखते ही देखते आवासीय मोहल्ला बाजार का रूप लेने लगा।
अपनी जमीन, अपना घर, अपना मकान और अपनी दुकान—जीवन की जद्दोजहद में आदमी अपनी आजीविका के लिए न जाने कितने रास्ते तलाशता है। हर व्यक्ति अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत करने का प्रयास करता है। इस कोशिश में कई बार उसे न कानून का पूरा ज्ञान होता है और न ही कानून की परवाह। भूख किसी नियम-कायदे की भाषा नहीं समझती। वह परिवार के लिए दो वक्त की रोटी जुटाने की चिंता में लगी रहती है।
लेकिन रोटी की जरूरत और अधिक जुटाने की चाह के बीच की दूरी कब बढ़ जाती है, पता ही नहीं चलता। पेट भरने के बाद भी खाने की इच्छा बढ़ती जाए तो नतीजा अफारे और बदहजमी के रूप में सामने आता है। कुछ ऐसा ही शहरों के आवासीय इलाकों के साथ भी हुआ।
छोटी दुकानों से बड़े प्रतिष्ठानों तक का सफर
पेट पालने के लिए शुरू हुई छोटी-छोटी दुकानें कब बड़े व्यापारिक प्रतिष्ठानों और शोरूम में बदल गईं, इसका पता ही नहीं चला। पता तब चला जब व्यवस्था के चौकीदारों ने आवासीय क्षेत्रों में व्यावसायिक गतिविधियों के संचालन पर सवाल उठाने शुरू किए।
जिम्मेदार अधिकारी भी जैसे अचानक नींद से जागे। वर्षों से चली आ रही गतिविधियां उन्हें एकाएक नजर आने लगीं। कुछ नोटिस जारी हुए, कुछ फाइलें खुलीं और व्यवस्था ने अपनी सक्रियता दिखानी शुरू कर दी।
लेकिन वर्षों से कारोबार में जमे व्यापारियों को भी सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली का पर्याप्त अनुभव था। उन्हें भरोसा था कि व्यवस्था के गलियारों में हर मुश्किल का कोई न कोई रास्ता निकल आता है। सरकारी दफ्तरों की धूल खाती फाइलों से लेकर उन फाइलों की गति बढ़ाने के तौर-तरीकों तक, सबका अपना एक अनुभव संसार होता है।
व्यंग्य यही है कि जहां नियम-कायदे अपनी जगह होते हैं, वहीं उन्हें लागू करने की प्रक्रिया भी अपने अलग रास्ते तलाश लेती है।
मामला जब न्याय की चौखट तक पहुंचा
सब कुछ अपनी गति से चल रहा था। फिर न जाने कौन न्याय की चौखट तक पहुंच गया। उद्देश्य व्यवस्था में सुधार लाना था या किसी को सबक सिखाना, यह कहना मुश्किल है। लेकिन मामला जब न्याय के बड़े दरवाजे तक पहुंचा तो निर्णय की घड़ी आनी ही थी।
बड़ा दरवाजा खटखटाना आसान नहीं होता। लेकिन जब दरवाजा खटखटाया गया तो वहां से निकला निर्णय कई लोगों की जिंदगी बदलने वाला था।
बुलडोजर गरजे। करीने से सजाए गए प्रतिष्ठान देखते ही देखते जमींदोज हो गए। जिन दुकानों से वर्षों से परिवारों की रोजी-रोटी चल रही थी, उनके सामने फिर वही पुराना सवाल खड़ा था—अब घर कैसे चलेगा?
निर्माण मनुष्य की सृजनशीलता का प्रतीक है। किसी इमारत को बनते देखने में वर्षों लग जाते हैं, लेकिन उसे गिरने में कुछ घंटे भी नहीं लगते। कानून का अपना पक्ष है, लेकिन ध्वस्तीकरण के पीछे छिपा मानवीय पक्ष भी अपनी जगह मौजूद रहता है। यही वह पक्ष है, जिसे आंकड़ों और आदेशों के बीच अक्सर देख पाना कठिन होता है।
कुछ उजड़े, कुछ तमाशबीन बने रहे
कुछ प्रतिष्ठान ध्वस्त हुए और कुछ बच गए। जिन पर कार्रवाई हुई, वे दुखी थे। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी थे जो दूसरों की बर्बादी को दूर खड़े होकर तमाशे की तरह देख रहे थे।
उन्हें शायद यह एहसास नहीं था कि समस्या किसी एक गली, मोहल्ले या बाजार तक सीमित नहीं है। शहर के न जाने कितने छोटे-छोटे मोहल्लों के मुख्य मार्ग इसी तरह धीरे-धीरे संकरे होते गए हैं। जहां कभी आवासीय क्षेत्र था, वहां दुकानें, गोदाम और व्यावसायिक गतिविधियां फैलती चली गईं।
नतीजा यह हुआ कि उन्हीं मोहल्लों में रहने वाले लोगों का जीवन भी मुश्किल होता गया। पार्किंग की समस्या, आवागमन में बाधा, भीड़ और लगातार बढ़ती व्यावसायिक गतिविधियों ने आवासीय इलाकों की मूल प्रकृति को ही बदल दिया।
पड़ोसी के घर की आग अपनी चौखट तक भी पहुंच सकती है
जो लोग दूसरे के घर पर चल रहे बुलडोजर को देखकर यह सोच रहे थे कि उनके घर की बारी नहीं आएगी, वे शायद यह भूल गए थे कि समस्या व्यक्तिगत नहीं, बल्कि व्यापक है।
बड़ा दरवाजा सब देख रहा था।
न्याय का हंटर जब फिर चला तो उन लोगों ने भी उसकी आहट महसूस की, जिन्हें लगता था कि पड़ोसी के घर में लगी आग उनकी चौखट तक नहीं पहुंचेगी।
सवाल सिर्फ यह नहीं है कि किसका निर्माण वैध था और किसका अवैध। सवाल यह भी है कि व्यवस्था को समय रहते क्यों नहीं जगाया गया? यदि वर्षों तक आवासीय मोहल्लों में व्यावसायिक गतिविधियां चलती रहीं तो जिम्मेदारी केवल उन लोगों की है जिन्होंने दुकानें बनाईं, या उन संस्थाओं की भी है जिन्हें समय रहते नियमों का पालन सुनिश्चित करना था?
किसी मोहल्ले में बाजार का फैलाव केवल ईंट-पत्थरों का विस्तार नहीं होता। यह शहर की नियोजन व्यवस्था, नागरिक सुविधा, रोजी-रोटी और कानून—इन सभी के बीच संतुलन का सवाल है। और जब यह संतुलन बिगड़ता है, तो आग की लपटें आखिरकार किसी न किसी दिन पड़ोसी की चौखट तक पहुंच ही जाती हैं।

