शहादत दिवस 13 जनवरी : भारत के स्वतंत्रता संग्राम का प्रथम सेनानी: तिलका मांझी
(कुमार कृष्णन — विभूति फीचर्स) भारत के स्वतंत्रता संग्राम का आरंभ सामान्यतः 1857 के विद्रोह से माना जाता है, लेकिन अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध आज़ादी का बिगुल इससे लगभग एक शताब्दी पहले ही फूंक दिया गया था। 1780 से 1784 के बीच बिहार के संथाल परगना क्षेत्र में तिलका मांझी के नेतृत्व में हुआ आदिवासी उलगुलान भारत का पहला संगठित सशस्त्र प्रतिरोध माना जाता है। इसी कारण तिलका मांझी को भारत का प्रथम स्वतंत्रता सेनानी कहा जाता है।
इतिहास में उपेक्षित प्रथम विद्रोह
1857 की क्रांति से लगभग सौ वर्ष पूर्व अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष छेड़ने वाले तिलका मांझी को इतिहास में वह स्थान नहीं मिल सका, जिसके वे वास्तविक हकदार थे। अंग्रेजी दस्तावेजों में उन्हें ‘आदिविद्रोही’ या ‘डकैत’ के रूप में चित्रित किया गया, जबकि वे ईस्ट इंडिया कंपनी की शोषणकारी नीतियों के विरुद्ध पहाड़िया आदिवासियों के जनआंदोलन के नायक थे।
आदिवासी जीवन और अंग्रेजी हस्तक्षेप
18वीं सदी के उत्तरार्ध में संथाल परगना, राजमहल पहाड़ियाँ, भागलपुर, मुंगेर और हजारीबाग क्षेत्र में पहाड़िया आदिवासी आखेट, झूम खेती और वन उत्पादों पर निर्भर थे। जंगल, जमीन और संसाधनों पर उनका पारंपरिक अधिकार था। बदले में मैदानी जमींदार उन्हें नजराना देते और सुरक्षा प्राप्त करते थे।
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने जमींदारों के साथ मिलकर इस व्यवस्था को ध्वस्त किया। राजस्व वसूली, जमींदारी बंदोबस्त, जंगल कटाई और स्थायी खेती ने आदिवासियों की जीवन प्रणाली को तोड़ दिया। 1769-70 के भीषण अकाल ने स्थिति और भयावह बना दी।
उलगुलान का नायक: तिलका मांझी
तिलका मांझी का जन्म 11 फरवरी 1750 को राजमहल पहाड़ियों के सेंगारसी (सिंगारसी) पहाड़ गांव में हुआ। उनके पिता सुगना मुर्मू गांव के ‘मांझी’ (मुखिया) थे। पहाड़िया भाषा में ‘तिलका’ का अर्थ होता है उग्र और तेजस्वी स्वभाव वाला व्यक्ति।
उन्होंने 1780-85 के बीच अंग्रेजी सत्ता पर लगातार हमले किए, अंग्रेजी खजाने और गोदाम लूटकर सामग्री आदिवासियों में बांटी। शाल वृक्ष की छाल में गांठ बांधकर गांव-गांव संदेश भेजे जाते थे—यह आदिवासी एकता का प्रतीक था।
क्लीवलैंड पर हमला और अंग्रेजों में खलबली
13 जनवरी 1784 को तिलका मांझी के नेतृत्व में आदिवासियों ने भागलपुर स्थित हिल रेंजर्स मुख्यालय पर हमला किया। जहरीले तीर से कलेक्टर ऑगस्टस क्लीवलैंड घायल हुआ, जिसकी बाद में कलकत्ता में मृत्यु हो गई। यह घटना अंग्रेजी सत्ता के लिए गहरा आघात थी। इसके बाद दमन और तेज हुआ—गांव जलाए गए, हत्याएं हुईं, लेकिन तिलका मांझी लंबे समय तक अंग्रेजों की पकड़ से बाहर रहे।
गिरफ्तारी और बलिदान
1785 में विश्वासघात के बाद तिलका मांझी को गिरफ्तार कर घोड़ों से बांधकर घसीटते हुए भागलपुर लाया गया और एक बरगद के पेड़ के नीचे फांसी दे दी गई। उनका उद्घोष था—“यह धरती सिंगबोंगा (सूर्य) की देन है, इस पर किसी का निजी अधिकार नहीं हो सकता।”
इतिहास, साहित्य और विरासत
महाश्वेता देवी, धीरेन्द्रनाथ बास्की, राकेश कुमार सिंह, राजेन्द्र प्रसाद सिंह और घनश्याम जैसे लेखकों ने अपने साहित्य में तिलका मांझी के संघर्ष को जीवित रखा। 1992 में भागलपुर विश्वविद्यालय का नाम ‘तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय’ रखा गया—यह उनके सम्मान की ऐतिहासिक स्वीकृति है।
अमर प्रेरणा
तिलका मांझी की शहादत के बाद भी आदिवासी विद्रोह थमे नहीं—भूमिज, कोल, संथाल, मुंडा आंदोलनों में उनकी प्रेरणा जीवित रही। आज भी जल-जंगल-जमीन की लड़ाई में उनका नाम संघर्ष का प्रतीक है। तिलका मांझी केवल इतिहास नहीं, बल्कि प्रतिरोध की जीवित चेतना हैं।
