मक्का समझौता, BRICS और भारत की रणनीतिक स्वायत्तता: बदलती दुनिया में नई दिल्ली की चुनौती
(डॉ. दीपक गोस्वामी-विनायक फीचर्स)
भू-राजनीति में धुआं कभी सिर्फ धुआं नहीं होता। उसके पीछे कहीं संघर्ष की आग होती है, कहीं बदलते शक्ति-संतुलन के संकेत होते हैं और कहीं भविष्य की विश्व व्यवस्था का नया खाका तैयार हो रहा होता है। पश्चिम एशिया से उठता तनाव भी केवल क्षेत्रीय सुरक्षा का प्रश्न नहीं है। इसके प्रभाव ऊर्जा, समुद्री व्यापार, निवेश और वैश्विक कूटनीति तक पहुंच रहे हैं।
ऐसे समय में 7 अगस्त 2026 को सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान के बीच हुआ मक्का संयुक्त रक्षा समझौता विशेष महत्व रखता है। समझौते के मुताबिक तीनों में से किसी एक देश पर सशस्त्र हमला होने की स्थिति को तीनों पर हमला माना जाएगा और रक्षा सहयोग को मजबूत किया जाएगा। हालांकि इसे तत्काल NATO जैसा पूर्ण सैन्य गठबंधन मानना जल्दबाजी होगी। आधिकारिक दस्तावेज इसे सामूहिक सुरक्षा और प्रतिरोध क्षमता मजबूत करने वाला समझौता बताते हैं।
मक्का समझौते के पीछे क्या है रणनीतिक गणित?
इस समझौते को केवल धार्मिक एकजुटता के नजरिए से देखना इसकी व्यापक रणनीतिक पृष्ठभूमि को नजरअंदाज करना होगा।
सऊदी अरब के लिए सबसे बड़ी चिंता अपनी ऊर्जा संपदा, महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों और आर्थिक परिवर्तन की सुरक्षा है। तुर्किये क्षेत्रीय शक्ति के रूप में अपनी भूमिका मजबूत करना चाहता है और पाकिस्तान के साथ उसके रक्षा संबंध भी लगातार विकसित हुए हैं। पाकिस्तान के लिए सऊदी अरब के साथ सुरक्षा संबंध लंबे समय से महत्वपूर्ण रहे हैं।
तीनों देशों के हितों का यह मेल समझौते को एक व्यापक सामरिक आयाम देता है। पाकिस्तान ने स्वयं इसे रक्षात्मक प्रकृति का बताया है और कहा है कि यह किसी विशेष देश के खिलाफ निर्देशित नहीं है।
संकट की घड़ी में पहली परीक्षा
किसी भी रक्षा समझौते की असली परीक्षा उसके दस्तावेज में नहीं, बल्कि संकट के समय होती है। मक्का समझौते के लिए यह परीक्षा उम्मीद से जल्दी सामने आ गई है।
यमन के हूती हमलों के बीच 9 सितंबर को पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने संकेत दिया था कि यदि संघर्ष सऊदी क्षेत्र तक फैलता है तो समझौते के प्रावधान सक्रिय हो सकते हैं। लेकिन अगले ही दिन पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि फिलहाल समझौते के तहत किसी सैन्य प्रतिक्रिया पर चर्चा नहीं हुई है। पाकिस्तान ने सऊदी अरब पर हुए हमलों की निंदा करते हुए समझौते के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है।
यही घटनाक्रम एक महत्वपूर्ण अंतर समझाता है—सामूहिक सुरक्षा की प्रतिबद्धता और तत्काल सैन्य हस्तक्षेप, दोनों एक ही बात नहीं हैं।
सऊदी अरब के लिए सुरक्षा क्यों महत्वपूर्ण है?
सऊदी अरब अपनी अर्थव्यवस्था को तेल पर निर्भरता से बाहर निकालने के लिए Vision 2030 के तहत पर्यटन, तकनीक, निवेश और नए उद्योगों को बढ़ावा दे रहा है। लेकिन बड़े आर्थिक बदलाव के लिए स्थिर सुरक्षा वातावरण जरूरी है।
लाल सागर, बाब-अल-मंदेब और फारस की खाड़ी जैसे समुद्री मार्गों में अस्थिरता केवल सऊदी अरब को नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और व्यापार को भी प्रभावित कर सकती है।
हाल के हूती हमलों ने इस खतरे को फिर सामने ला दिया है। क्षेत्रीय तनाव के बीच तेल और समुद्री परिवहन पर पड़ने वाला असर दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं के लिए चिंता का विषय बन गया है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह घटनाक्रम?
भारत पश्चिम एशिया की घटनाओं से भौगोलिक रूप से दूर जरूर है, लेकिन आर्थिक और रणनीतिक रूप से नहीं।
सऊदी अरब भारत का महत्वपूर्ण ऊर्जा और व्यापारिक साझेदार है। वहां बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासी रहते हैं। भारत की कच्चे तेल की जरूरत, समुद्री व्यापार, पश्चिम एशिया में भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और निवेश—सभी क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़े हुए हैं।
यदि लाल सागर या खाड़ी क्षेत्र में लंबे समय तक तनाव रहता है तो इसका असर जहाजों की आवाजाही, बीमा लागत, ऊर्जा कीमतों और अंततः भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
इसलिए मक्का समझौते को भारत के लिए किसी नए विरोधी गठबंधन के रूप में देखने के बजाय उसके क्षेत्रीय प्रभावों का आकलन करना अधिक उचित होगा।
दूसरी तरफ BRICS का बदलता स्वरूप
इसी समय भारत 2026 में BRICS की अध्यक्षता कर रहा है और 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में 18वें BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है। भारत ने इस वर्ष की अध्यक्षता के लिए “Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability” को थीम बनाया है।
BRICS अब मूल पांच देशों के समूह तक सीमित नहीं है। 2026 में इसके 11 सदस्य हैं—ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, इंडोनेशिया, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात।
इस विस्तार ने BRICS का आर्थिक और भू-राजनीतिक महत्व बढ़ाया है, लेकिन साथ ही समूह के भीतर हितों की विविधता भी बढ़ी है।
ईरान और यूएई जैसे देशों के अलग-अलग क्षेत्रीय हित हैं। भारत के रूस और अमेरिका दोनों के साथ महत्वपूर्ण संबंध हैं। चीन के साथ भारत का सीमा और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का अपना आयाम है। ऐसे में BRICS को एक समान विचारधारा वाले सैन्य या राजनीतिक गठबंधन के रूप में देखना सही नहीं होगा।
भारत की ताकत—एक से अधिक मंचों पर सक्रियता
यहीं भारत की रणनीतिक स्वायत्तता महत्वपूर्ण हो जाती है।
भारत सऊदी अरब के साथ ऊर्जा और निवेश संबंध मजबूत कर सकता है, रूस के साथ रक्षा सहयोग जारी रख सकता है, अमेरिका और यूरोप के साथ तकनीक एवं व्यापारिक साझेदारी बढ़ा सकता है और साथ ही BRICS तथा SCO जैसे बहुपक्षीय मंचों पर सक्रिय रह सकता है।
यह विरोधाभास नहीं, बल्कि बदलती बहुध्रुवीय दुनिया में कूटनीति का नया तरीका है।
रणनीतिक स्वायत्तता का अर्थ यह नहीं कि भारत हर मुद्दे पर तटस्थ रहे। इसका अर्थ है कि भारत अपने फैसले अपने राष्ट्रीय हितों और परिस्थितियों के आधार पर स्वतंत्र रूप से ले।
क्या मक्का समझौता भारत के लिए खतरा है?
फिलहाल ऐसा निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
मक्का समझौते के आधिकारिक बयानों में इसे रक्षात्मक समझौता बताया गया है और किसी देश को लक्ष्य बनाने की बात नहीं कही गई है।
लेकिन भारत को इसके संभावित दीर्घकालीन प्रभावों पर नजर रखनी होगी। पश्चिम एशिया में यदि यह सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होती है तो इसका असर हथियारों के सहयोग, समुद्री सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पर पड़ सकता है।
भारत के लिए महत्वपूर्ण बात यह होगी कि वह इस नए समीकरण को समझे, लेकिन अपनी विदेश नीति को किसी एक प्रतिक्रिया के आधार पर तय न करे।
BRICS भी आसान मंच नहीं
BRICS का विस्तार भारत को वैश्विक दक्षिण के साथ जुड़ने के अधिक अवसर देता है, लेकिन इसके भीतर मतभेद भी कम नहीं हैं।
नई दिल्ली में होने वाला शिखर सम्मेलन ऐसे समय हो रहा है जब पश्चिम एशिया का संघर्ष BRICS देशों के अलग-अलग हितों की परीक्षा ले रहा है। ईरान और यूएई के बीच तनाव, रूस-यूक्रेन संघर्ष और अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा जैसे मुद्दे समूह के भीतर साझा रुख बनाना कठिन बनाते हैं।
इसलिए BRICS की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होगी कि सदस्य कितने बड़े हैं, बल्कि इससे होगी कि वे व्यापार, वित्त, ऊर्जा, तकनीक और वैश्विक दक्षिण के मुद्दों पर कितनी व्यावहारिक साझेदारी कर पाते हैं।
दुनिया दो ध्रुवों में नहीं, कई शक्ति-केंद्रों में बंट रही है
मक्का समझौता, BRICS का विस्तार और SCO की सक्रियता एक बड़े बदलाव की ओर संकेत करते हैं।
दुनिया अब पुराने शीतयुद्ध की तरह केवल दो स्पष्ट खेमों में बंटी हुई दिखाई नहीं देती। एक देश एक मंच पर साझेदार हो सकता है और दूसरे मंच पर उसके हित अलग हो सकते हैं।
यही कारण है कि आने वाले समय में देशों की विदेश नीति अधिक issue-based और interest-based होती जाएगी।
भारत के लिए यह स्थिति चुनौती भी है और अवसर भी।
भारत को क्या करना चाहिए?
भारत को पश्चिम एशिया में अपने ऊर्जा हितों की सुरक्षा के साथ-साथ समुद्री मार्गों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान देना होगा। खाड़ी देशों के साथ आर्थिक संबंधों को और मजबूत करना होगा। साथ ही रूस, अमेरिका, यूरोप और एशिया के अन्य प्रमुख देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने होंगे।
BRICS में भारत को वैश्विक दक्षिण की आवाज मजबूत करने के साथ-साथ व्यावहारिक आर्थिक सहयोग पर जोर देना चाहिए। डिजिटल भुगतान, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, आपूर्ति श्रृंखला, ऊर्जा सुरक्षा और तकनीकी सहयोग जैसे विषय भारत के लिए अधिक उपयोगी हो सकते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत किसी नए गठबंधन को केवल मित्र या विरोधी के चश्मे से न देखे। हर नए समीकरण का मूल्यांकन उसके भारत पर वास्तविक प्रभाव के आधार पर होना चाहिए।
असली शक्ति स्वतंत्र निर्णय में है
मक्का समझौता यह बताता है कि पश्चिम एशिया अपनी सुरक्षा के लिए नए विकल्प तलाश रहा है। हूती संकट यह दिखा रहा है कि किसी भी रक्षा समझौते की वास्तविक शक्ति संकट के समय सामने आती है। वहीं BRICS यह संकेत दे रहा है कि उभरती अर्थव्यवस्थाएं वैश्विक शासन व्यवस्था में अपनी भूमिका बढ़ाना चाहती हैं।
भारत के सामने इसलिए सवाल यह नहीं है कि वह किस खेमे में जाएगा।
सवाल यह है कि क्या भारत बदलती विश्व व्यवस्था में अपनी स्वतंत्र निर्णय क्षमता को और मजबूत कर सकता है?
भारत को न किसी गठबंधन से अनावश्यक भयभीत होने की जरूरत है और न किसी शक्ति-केंद्र से बिना कारण दूरी बनाने की। उसकी वास्तविक ताकत यही है कि वह अलग-अलग शक्ति-केंद्रों के साथ अपने संबंध बनाए रखते हुए अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दे।
भू-राजनीति में धुआं भविष्य के संकेत देता है। मक्का समझौता भी ऐसा ही एक संकेत है। BRICS का विस्तार दूसरा संकेत है। और भारत की रणनीतिक स्वायत्तता इस बदलती दुनिया में उसका सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक औजार।
भारत को दूसरों द्वारा बनाए गए खेमों में अपना भविष्य तलाशने के बजाय बदलती विश्व व्यवस्था में अपना रास्ता खुद तय करना होगा।

