Medical Milestone: मेदांता लखनऊ में चिकित्सा का चमत्कार; 'होल लंग लवेज' तकनीक से धोए गए मरीज के फेफड़े, मिली नई जिंदगी

Medical Milestone: A Medical Miracle at Medanta Lucknow; Patient's Lungs Washed Using 'Whole Lung Lavage' Technique, Granted a New Lease on Life.
 
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लखनऊ डेस्क (आर एल पाण्डेय): राजधानी के प्रतिष्ठित मेदांता हॉस्पिटल ने चिकित्सा के क्षेत्र में एक और बड़ी और ऐतिहासिक सफलता हासिल की है। अस्पताल के 'रेस्पिरेटरी एंड स्लीप मेडिसिन विभाग' ने 'एनेस्थीसियोलॉजी विभाग' के साथ मिलकर फेफड़ों की एक बेहद दुर्लभ व जानलेवा बीमारी से पीड़ित मरीज का सफल इलाज किया है। डॉक्टरों की टीम ने अत्यधिक जटिल ‘बाइलेटरल होल लंग लवेज’ (Bilateral Whole Lung Lavage) प्रक्रिया को सफलतापूर्वक अंजाम देकर मरीज को नया जीवन दिया है।

यह जटिल ऑपरेशन मेदांता संस्थान की उन्नत तकनीक और मल्टी-डिसिप्लिनरी (बहु-विषयक) स्वास्थ्य सेवाओं की उत्कृष्ट प्रतिबद्धता को प्रमाणित करता है।

क्या है यह दुर्लभ बीमारी: पल्मोनरी एल्वियोलर प्रोटीनोसिस?

मरीज 'पल्मोनरी एल्वियोलर प्रोटीनोसिस' (PAP) नाम की एक अत्यंत दुर्लभ बीमारी से ग्रसित था।

  • फेफड़ों में रुकावट: इस बीमारी में फेफड़ों के भीतर मौजूद एल्वियोलाई (छोटी-छोटी वायु थैलियों) में प्रोटीन और वसा (फैट) से निर्मित 'सर्फैक्टेंट' नामक पदार्थ असामान्य रूप से इकट्ठा हो जाता है।

  • सांस लेने में गंभीर तकलीफ: फेफड़ों की थैलियों में इस गाढ़े पदार्थ के जमाव के कारण शुद्ध हवा का प्रवेश पूरी तरह रुक जाता है। इसके परिणामस्वरूप मरीज को सांस लेने में असहनीय तकलीफ होती है और वह लगातार गंभीर खांसी से पीड़ित रहता है।

दूधिया रंग के द्रव से होती है इस बीमारी की पुष्टि

इस दुर्लभ बीमारी का पता लगाना और इसकी सटीक पहचान करना चिकित्सा जगत में काफी चुनौतीपूर्ण माना जाता है:

  1. रेडियोलॉजिकल जांच: सबसे पहले हाई-रिजोल्यूशन सीटी स्कैन (HRCT Scan) के जरिए फेफड़ों में बनने वाले विशिष्ट पैटर्न को देखकर इस बीमारी का संदेह होता है।

  2. साइटोलॉजी टेस्ट: बीमारी की पुख्ता पुष्टि 'ब्रोंकोएल्वियोलर लवेज साइटोलॉजी' के जरिए की जाती है। जांच के दौरान जब फेफड़ों से तरल पदार्थ (द्रव) निकाला जाता है, तो उसका रंग दूधिया (Milky) दिखाई देता है।

  3. विशेष स्टेनिंग: इस दूधिया द्रव पर प्रयोगशाला में 'पीएएस स्टेनिंग' (PAS Staining) की जाती है, जो प्रोटीन युक्त गाढ़े मलबे की मौजूदगी को स्पष्ट रूप से दर्शाकर बीमारी पर अंतिम मुहर लगाती है।

उपचार की विधि: गर्म सलाइन के घोल से साफ किए गए फेफड़े

गंभीर लक्षणों वाले मरीजों के लिए चिकित्सा विज्ञान में ‘होल लंग लवेज’ (WLL) को ही सबसे प्रामाणिक और मानक उपचार माना जाता है।

कैसे की गई प्रक्रिया: इस बेहद संवेदनशील ऑपरेशन को 'जनरल एनेस्थीसिया' (मरीज को पूरी तरह बेहोश करके) के तहत अंजाम दिया गया। इसमें विशेष चिकित्सा उपकरणों की मदद से मरीज के फेफड़ों को गर्म सलाइन (नमक के पानी के विशेष घोल) से बार-बार धोया (Washed) गया। इस निरंतर फ्लशिंग से फेफड़ों में जमा सारा प्रोटीनयुक्त मलबा बाहर निकल गया और मरीज के वायु मार्ग पूरी तरह साफ हो गए, जिससे उसकी सांस लेने की क्षमता में चमत्कारी सुधार आया है।

इन डॉक्टरों के टीमवर्क से सफल हुआ जीवनरक्षक ऑपरेशन

इस बेहद जोखिम भरे और जीवनरक्षक ऑपरेशन की सफलता डॉक्टरों और तकनीकी स्टाफ के आपसी तालमेल (टीमवर्क) का बेहतरीन उदाहरण है:

  • रेस्पिरेटरी टीम: रेस्पिरेटरी एंड स्लीप मेडिसिन विभाग के निदेशक डॉ. दिलीप दुबे के कुशल नेतृत्व में इस पूरी प्रक्रिया को डॉ. अभिषेक टंडन और डॉ. विपुल प्रकाश ने सटीक ढंग से पूरा किया।

  • एनेस्थीसियोलॉजी टीम: इस जटिल ऑपरेशन के दौरान मरीज की सांसों और एयरवे को नियंत्रित रखना सबसे बड़ी चुनौती थी। एनेस्थीसियोलॉजी टीम के डॉ. आशीष खन्ना और डॉ. निशांत चौधरी ने 'बाइलेटरल एयरवे मैनेजमेंट' को बेहद कुशलता और बारीकी से संभाला।

  • पैरामेडिकल स्टाफ की भूमिका: मेडिकल टीम ने ऑपरेशन को सफल बनाने में फिजियोथेरेपिस्ट्स और ओटी (Operation Theatre) तकनीशियनों की सूक्ष्म तैयारी, तकनीकी सहयोग और ऑपरेशन के बाद दी गई बेहतरीन क्रिटिकल केयर (देखभाल) की विशेष सराहना की।

इस शानदार चिकित्सा उपलब्धि के साथ ही मेदांता लखनऊ ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उनके पास जटिल, असाध्य और दुर्लभ से दुर्लभ बीमारियों के इलाज के लिए विश्वस्तरीय विशेषज्ञता और बुनियादी ढांचा उपलब्ध है।

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