उत्तर प्रदेश में ‘चारा विकास’ हेतु महाअभियान: 75 जिलों के मास्टर ट्रेनर्स और किसानों को मिला विशेष प्रशिक्षण, बढ़ेगी पशुधन उत्पादकता

Mega-Campaign for ‘Fodder Development’ in Uttar Pradesh: Master Trainers and Farmers Across 75 Districts Receive Specialized Training; Livestock Productivity Set to Rise
 
उत्तर प्रदेश में ‘चारा विकास’ हेतु महाअभियान: 75 जिलों के मास्टर ट्रेनर्स और किसानों को मिला विशेष प्रशिक्षण, बढ़ेगी पशुधन उत्पादकता

झाँसी/लखनऊ: उत्तर प्रदेश में पशुओं के लिए हरे चारे की उपलब्धता को बढ़ाने और डेयरी क्षेत्र को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ी पहल की गई है। प्रदेश में हरे चारे की कमी को दूर करने के उद्देश्य से, उत्तर प्रदेश पशुपालन विभाग के तत्वावधान में भा.कृ.अनु.प.- भारतीय चरागाह एवं चारा अनुसंधान संस्थान (IGFRI), झाँसी द्वारा एक व्यापक ‘चारा विकास’ प्रशिक्षण कार्यक्रम का सफलतापूर्वक आयोजन किया गया। यह विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम 27 अप्रैल से 14 मई 2026 तक विभिन्न चरणों में आयोजित किया गया, जिसका मुख्य उद्देश्य उन्नत चारा तकनीकों को जमीनी स्तर तक पहुंचाना है।

6 बैचों में प्रशिक्षित हुए सभी 75 जिलों के मास्टर ट्रेनर्स

इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के तहत उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों को कवर किया गया। पशुपालन एवं कृषि विभाग के कुल 125 अधिकारियों को 'मास्टर ट्रेनर्स' के रूप में तैयार किया गया है। दो-दिवसीय इस सघन प्रशिक्षण कार्यक्रम को कुल 6 अलग-अलग बैचों में विभाजित करके बेहद सुव्यवस्थित तरीके से संपन्न कराया गया, जिसमें सैद्धांतिक जानकारी के साथ-साथ प्रक्षेत्र भ्रमण (Field Visit) भी कराया गया।

प्रशिक्षण के 5 मुख्य बिंदु और तकनीकी पहलू:

मास्टर ट्रेनर्स को चारा विकास और उन्नत प्रबंधन के निम्नलिखित महत्वपूर्ण पहलुओं पर विस्तृत ट्रेनिंग दी गई:

  • क्षेत्रवार चारा योजना: उत्तर प्रदेश में पशुधन की वर्तमान स्थिति और चारे की उपलब्धता को देखते हुए क्षेत्रवार चारा विकास योजना तैयार करना।

  • वर्षभर चारा उत्पादन: राज्य के विभिन्न जलवायु क्षेत्रों (Agro-climatic zones) के अनुकूल उपयुक्त चारा उत्पादन तकनीकियाँ और साल के बारह महीने हरा चारा प्राप्त करने की प्रणालियाँ।

  • चरागाह विकास प्रणालियाँ: बारानी (वर्षा आधारित) क्षेत्रों, गोचर भूमियों और स्थानीय गौशालाओं के लिए विशेष चरागाह, वन-चरागाह (Silvipasture) एवं उद्यान चरागाह प्रणालियों का विकास।

  • गैर-परंपरागत स्रोत: समस्याग्रस्त दशाओं (जैसे ऊसर या सूखा प्रभावित क्षेत्र) में और गैर-परंपरागत स्रोतों से चारा उत्पादन की उन्नत तकनीकियाँ।

  • संरक्षण और आहार प्रबंधन: पशुधन के लिए सही पोषण आहार प्रबंधन और विषम परिस्थितियों के लिए चारे को सुरक्षित रखने (साइलेज और हे मेकिंग) की विधियाँ।

जमीनी स्तर पर क्षमता विकास की कार्ययोजना

प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों ने उन्नत तकनीकों के व्यापक प्रसार के लिए संस्थान के वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों के साथ गहन विचार-मंथन किया। प्रशिक्षण के उपरांत इन मास्टर ट्रेनर्स को एक विशेष कार्ययोजना सौंपी गई है, जिसके तहत वे अब अपने-अपने जनपदों में जाकर पशुपालक किसानों, कृषि उद्यमियों और गौशाला संचालकों को प्रशिक्षित करेंगे और उनका क्षमता विकास (Capacity Building) करेंगे।

चारा उत्पादकों और गौशाला संचालकों के लिए विशेष भ्रमण

मास्टर ट्रेनर्स के अलावा, सीधे किसानों को जोड़ने के लिए ‘एकदिवसीय भ्रमण एवं प्रशिक्षण’ कार्यक्रम भी चलाया जा रहा है।

  • अब तक की प्रगति: इसके तहत अब तक 7 जनपदों के कुल 106 चारा उत्पादक किसानों और गौशाला संचालकों को ‘चारा उत्पादन, संरक्षण एवं उपयोग’ की बारीकियां सिखाई जा चुकी हैं।

  • भविष्य का लक्ष्य: इस अभियान के माध्यम से प्रदेश के कुल 1125 चारा उत्पादक किसानों को प्रशिक्षित करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

पशुपालकों और किसानों के लिए दूरगामी लाभ

'चारा विकास' के संकल्प के साथ आयोजित इस राज्यव्यापी प्रशिक्षण और भ्रमण कार्यक्रम से आधुनिक चारा तकनीकों का तेजी से प्रसार होगा। इससे न केवल उत्तर प्रदेश में हरे चारे का उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि चारे की लागत कम होने से पशुधन उत्पादकता में सुधार होगा, जो अंततः किसानों की आजीविका को सुदृढ़ करने में मील का पत्थर साबित होगा।

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